केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इन दिनों भारतीय राजनीति के बिल्कुल केंद्र में आ गए हैं, और इसका मुख्य कारण देश भर में आयोजित होने वाली बेहद महत्वपूर्ण मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट-यूजी (NEET-UG) को लेकर छिड़ा भारी और अप्रत्याशित विवाद है। पूरे देश में इस परीक्षा प्रणाली में सामने आई कथित गड़बड़ियों को लेकर हताश और निराश छात्रों का भारी विरोध-प्रदर्शन लगातार जारी है। इस भीषण राजनीतिक गहमागहमी के बीच कई प्रमुख विपक्षी दलों और विभिन्न छात्र संगठनों ने एकजुट होकर धर्मेंद्र प्रधान के तत्काल इस्तीफे की मांग को बहुत तेज कर दिया है। हालांकि, विपक्ष के इस चौतरफा राजनीतिक दबाव और सड़क से लेकर संसद के दोनों सदनों तक हो रहे तीखे हमलों के बावजूद, केंद्र सरकार की तरफ से ऐसा कोई भी संकेत नहीं दिया गया है कि वे अपने इस बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण पद से हटने वाले हैं। वर्तमान संकट ने अचानक से पूरे देश का ध्यान इस बात पर खींच लिया है कि ओडिशा की राज्य स्तरीय राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय पटल पर इतनी मजबूती से छाने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता धर्मेंद्र प्रधान आखिर कौन हैं, उनकी अब तक की राजनीतिक यात्रा कैसी रही है, और उनका पारिवारिक तथा शैक्षणिक बैकग्राउंड क्या है।
तालचेर में जन्म और पिता से मिली राजनीतिक विरासत
धर्मेंद्र प्रधान की जड़ें ओडिशा के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में बहुत गहराई से जुड़ी हुई हैं। उनका जन्म 26 जून 1969 को ओडिशा के मशहूर कोयलांचल क्षेत्र तालचेर में हुआ था। उन्हें जनसेवा और राजनीति एक तरह से विरासत में ही मिली थी, क्योंकि वे एक बेहद सक्रिय राजनीतिक माहौल वाले घर में पले-बढ़े थे। उनके पिता, डॉ. देबेंद्र प्रधान, एक कद्दावर और सम्मानित नेता थे, जिन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री के रूप में एक बहुत ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली थी। घर में हर तरफ होने वाली गंभीर राजनीतिक चर्चाओं और सार्वजनिक जीवन के गहरे प्रभाव ने युवा धर्मेंद्र को बचपन से ही राजनीति की बारीकियों को बहुत करीब से समझने और सार्वजनिक सेवा की तरफ कदम बढ़ाने का एक स्वाभाविक मौका दिया।
उत्कल विश्वविद्यालय से पढ़ाई और छात्र राजनीति की शुरुआत
सक्रिय और चुनावी राजनीति में पूरी तरह से कदम रखने से पहले, धर्मेंद्र प्रधान ने अपनी शिक्षा और बौद्धिक विकास पर विशेष रूप से ध्यान दिया। उन्होंने अपनी प्रारंभिक और स्कूली स्तर की पढ़ाई अपने गृह राज्य ओडिशा में ही रहकर पूरी की। इसके बाद उच्च शिक्षा हासिल करने के उद्देश्य से उन्होंने राज्य के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक, उत्कल विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। इसी विश्वविद्यालय से उन्होंने एंथ्रोपोलॉजी (मानव विज्ञान) विषय में एम.ए. की डिग्री सफलतापूर्वक हासिल की। अपने इन्हीं अहम कॉलेज के दिनों में उनकी दिलचस्पी छात्रों के मुद्दों को प्रखरता से उठाने और उनका नेतृत्व करने में काफी बढ़ने लगी थी। यही वह महत्वपूर्ण समय था जब उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) का दामन थामा और छात्र राजनीति के क्षेत्र में एक बेहद सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी, जिसने भविष्य के लिए उनकी एक मजबूत राजनीतिक नींव तैयार की।
परिवार: पत्नी मृदुला और बच्चों की चर्चा
पारिवारिक मोर्चे पर अगर बात करें, तो धर्मेंद्र प्रधान का विवाह 9 दिसंबर 1998 को मृदुला ठाकुर प्रधान के साथ संपन्न हुआ था। इस दंपत्ति के दो बच्चे हैं, जिनमें उनके बेटे का नाम निशांत प्रधान और बेटी का नाम नैमिषा प्रधान है। वैसे तो उनका परिवार आमतौर पर सार्वजनिक चकाचौंध और मीडिया की नजरों से दूर ही रहना पसंद करता है, लेकिन हाल के दिनों में शिक्षा मंत्रालय पर उठे भारी विवादों का सीधा असर उनके परिवार पर भी देखने को मिला। उनकी बेटी नैमिषा प्रधान अचानक से सोशल मीडिया पर तब भारी चर्चा का विषय बन गईं, जब देश में चल रहे इन अभूतपूर्व परीक्षा विवादों के बीच उन्होंने अपना सोशल मीडिया अकाउंट पूरी तरह से बंद (डीएक्टिवेट) कर दिया।
ओडिशा विधानसभा से लेकर संबलपुर लोकसभा तक का सफर
एक प्रखर छात्र नेता के तौर पर अपनी ठोस पहचान बनाने के बाद, धर्मेंद्र प्रधान ने मुख्यधारा की चुनावी राजनीति में भी बहुत तेजी से अपनी सीढ़ियां चढ़ीं। एबीवीपी में शानदार काम करने के बाद, उन्होंने भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) में भी कई बड़ी और अहम जिम्मेदारियां बखूबी निभाईं और अपने कौशल के दम पर अंततः इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद तक भी पहुंचे। चुनावी राजनीति में उनका पहला बड़ा और सफल कदम नए दशक की शुरुआत में वर्ष 2000 में पड़ा, जब वे पहली बार ओडिशा विधानसभा के लिए एक विधायक के तौर पर चुनकर आए। इसके ठीक चार साल बाद, यानी 2004 में, उन्होंने पहली बार लोकसभा का बड़ा चुनाव जीता और राष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में अपनी एक मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। बाद के वर्षों में वे राज्यसभा के सम्मानित सदस्य भी रहे और राष्ट्रीय राजनीति में लगातार एक सक्रिय भूमिका निभाते रहे। आज के समय में, वे ओडिशा के संबलपुर लोकसभा क्षेत्र से एक निर्वाचित सांसद के तौर पर वहां की जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
पेट्रोलियम से लेकर शिक्षा मंत्रालय तक की अहम जिम्मेदारियां
केंद्र सरकार के प्रशासनिक कामकाज में धर्मेंद्र प्रधान को हमेशा से ही वरिष्ठ नेताओं में सबसे भरोसेमंद चेहरों में गिना जाता रहा है। जुलाई 2021 में देश के शिक्षा मंत्री के तौर पर अपना पदभार ग्रहण करने से पहले भी वे कई भारी-भरकम और अहम मंत्रालयों का सफलतापूर्वक संचालन कर चुके हैं। उनके पास देश के विशाल ऊर्जा क्षेत्र को नई दिशा देने वाले पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय का बहुत ही व्यापक अनुभव मौजूद है। इसके अलावा, उन्होंने इस्पात मंत्रालय और देश के युवाओं को रोजगार से जोड़ने वाले कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभागों की भी जिम्मेदारी बहुत ही कुशलता के साथ संभाली है।
नीट-यूजी विवाद और इस्तीफे का बढ़ता दबाव
इस समय धर्मेंद्र प्रधान के तत्काल इस्तीफे की जो चौतरफा और तीखी मांग उठ रही है, उसकी पूरी जड़ नीट-यूजी मेडिकल प्रवेश परीक्षा प्रणाली में सामने आई बेहद गंभीर खामियों और आरोपों में छिपी है। विपक्षी दलों और आक्रोशित छात्र संगठनों का स्पष्ट रूप से यह आरोप है कि परीक्षा में जो भी बड़े पैमाने पर धांधली, पेपर लीक की आशंकाएं और व्यवस्थागत गड़बड़ियां हुई हैं, उसकी पूरी नैतिक जिम्मेदारी सीधे तौर पर देश के शिक्षा मंत्री को अपने कंधों पर लेनी चाहिए। संसद के दोनों सदनों से लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स तक, यह मुद्दा लगातार आग पकड़ रहा है और देशव्यापी चर्चा का विषय बना हुआ है। इन तमाम गंभीर आरोपों और विपक्षी दलों के राजनीतिक हमलों के जवाब में धर्मेंद्र प्रधान ने सार्वजनिक मंचों से अपना कड़ा बचाव किया है। उनका दो टूक कहना है कि सरकार छात्रों की हर एक समस्या के उचित और निष्पक्ष समाधान के लिए पूरी गंभीरता के साथ काम कर रही है, लेकिन विपक्ष इस नाजुक और संवेदनशील शैक्षणिक मुद्दे का केवल अपने चुनावी फायदे के लिए राजनीतिकरण कर रहा है।



















