मवेशियों में फैलने वाली खुरपका-मुंहपका बीमारी एक अत्यंत संक्रामक विषाणुजनित रोग है, जो गाय, भैंस सहित अनेक दुधारू और कामकाजी पशुओं को अपनी चपेट में ले लेती है। यह बीमारी किसी विशेष मौसम या महीने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि साल में किसी भी वक्त पशुओं के झुंड में अचानक दस्तक दे सकती है। यदि समय रहते इस बीमारी के लक्षणों की पहचान न की जाए और सही चिकित्सीय देखभाल न मिले, तो पशुओं का स्वास्थ्य बिगड़ने के साथ-साथ उनकी कार्यक्षमता और दूध देने की क्षमता पर बेहद बुरा असर पड़ता है। पशुपालकों के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे अपने मवेशियों के व्यवहार और शरीर में दिखने वाले छोटे से छोटे बदलाव पर नजर रखें और लक्षण उभरते ही तुरंत किसी योग्य पशु चिकित्सक से परामर्श लें।
संक्रमण के शुरुआती संकेत और शारीरिक लक्षण
जब कोई पशु इस संक्रामक बीमारी की गिरफ्त में आता है, तो शुरुआत में उसे एक से दो दिन तक तेज बुखार रह सकता है। बुखार के साथ ही पशु अपने पैरों में तकलीफ महसूस करता है और प्रभावित पैर को बार-बार जमीन पर पटकता या हवा में झाड़ता हुआ दिखाई देता है। खुर के आसपास के हिस्से में सूजन आने लगती है, जिससे पशु को चलने-फिरने में काफी कठिनाई होती है और वह लंगड़ाकर चलने लगता है। समय बीतने के साथ खुरों के बीच और आसपास छोटे-बड़े घाव बन जाते हैं। इन घावों की उचित देखभाल न होने पर उनमें द्वितीयक संक्रमण होने और कीड़े पड़ जाने की गंभीर आशंका बनी रहती है।
खुरों की समस्या के साथ-साथ पशु के मुंह में भी इसके स्पष्ट लक्षण नजर आने लगते हैं। इस रोग से पीड़ित मवेशी के मुंह से लगातार पतली और गाढ़ी लार टपकती रहती है। पशु की जीभ, मसूड़ों, तालू और होंठों के अंदरूनी हिस्से में छोटे-छोटे छाले निकल आते हैं। कुछ समय बाद ये छाले फूट जाते हैं और आपस में मिलकर बड़े घाव का रूप ले लेते हैं। मुंह में घाव और जलन के कारण पशु के लिए चारा चबाना या पानी पीना बेहद पीड़ादायक हो जाता है, जिससे वह खाना-पीना पूरी तरह छोड़ देता है या बहुत कम कर देता है।
दूध उत्पादन, प्रजनन क्षमता और सेहत पर दीर्घकालिक प्रभाव
खुरपका-मुंहपका रोग का प्रकोप केवल कुछ दिनों के बुखार या छालों तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पशु के पूरे शरीर को अंदर से कमजोर कर देता है। बीमारी से ठीक हो जाने के बाद भी मवेशियों की दूध उत्पादन क्षमता में भारी गिरावट आती है और यह कमी लंबे समय तक बनी रह सकती है। इसके अतिरिक्त, खेत में काम करने वाले या बोझ ढोने वाले पशुओं की शारीरिक कार्यक्षमता भी काफी घट जाती है। संक्रमण से उबरने के बाद भी कई पशु लंबे समय तक शारीरिक कमजोरी, सुस्ती और थोड़ा सा चलने पर हांफने जैसी गंभीर समस्याओं से जूझते रहते हैं।
यह बीमारी मादा पशुओं की प्रजनन सेहत के लिए भी एक बड़ा खतरा साबित होती है। यदि कोई गर्भवती गाय या भैंस इस विषाणु की चपेट में आती है, तो उसमें गर्भपात होने की काफी आशंका बनी रहती है। इसके अलावा, बीमारी से प्रभावित पशुओं की प्रजनन क्षमता पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जिससे वे भविष्य में गाभिन होने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं। यही वजह है कि पशुपालकों को इस रोग के किसी भी शुरुआती संकेत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत इलाज शुरू करना चाहिए।
घर पर प्राथमिक उपचार और खुरों की सफाई के तरीके
बीमारी की स्थिति में पशुओं के खुरों और पैरों की स्वच्छता का विशेष रूप से ख्याल रखना अनिवार्य है। पैरों में घाव बनने की स्थिति में उन्हें सबसे पहले साफ और स्वच्छ पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए। सफाई के पश्चात पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही उपयुक्त एंटीसेप्टिक दवाओं या मलहम का लेप लगाना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से नीम और पीपल की छाल को पानी में उबालकर बनाए गए काढ़े से पशुओं के पैर धोने की सलाह दी जाती रही है, जो प्राकृतिक रोगाणुरोधक के रूप में काम करता है।
पैरों के साथ-साथ मुंह और खुरों की रोजाना सफाई के लिए एक बाल्टी साफ पानी में थोड़ा खाने का सोडा मिलाकर घोल तैयार करने की सलाह दी जाती है। इस सोडायुक्त पानी से प्रभावित हिस्सों की नरमी से सफाई करनी चाहिए। सफाई प्रक्रिया पूरी होने के बाद डॉक्टर द्वारा सुझाई गई दवा या लेप को घाव पर लगाना चाहिए। इसके साथ ही यह ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि खुले घावों पर मक्खियां न बैठें। मक्खियों के कारण घाव में और ज्यादा संक्रमण फैलने तथा कीड़े पड़ने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
विशेषज्ञ मार्गदर्शन और फिटकरी व फिनाइल का सही इस्तेमाल
मुंह के छालों से पीड़ित पशुओं के खानपान में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। ऐसे मवेशियों को सख्त चारे की जगह बिल्कुल मुलायम और आसानी से पचने वाला आहार ही देना चाहिए। इलाज के मामले में पशुपालकों को स्वयं कोई दवा देने के बजाय हमेशा योग्य डॉक्टर की सलाह पर ही निर्भर रहना चाहिए। घावों की नियमित और सही तरीके से सफाई ही पशु को जल्द राहत दिला सकती है।
शिवपुरी के पशुपालन विभाग के संचालक एलआर शर्मा के अनुसार, बीमारी से प्रभावित पशुओं के खुरों और पैरों को फिनाइल मिले पानी से दिन में दो से तीन बार धोना चाहिए। फिनाइल के पानी से धोने के बाद पैरों पर मक्खियों को दूर भगाने वाली विशेष मलहम का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि संक्रमण न बढ़े। इसके अलावा, पशु के मुंह के अंदर हुए छालों और घावों की सफाई के लिए एक प्रतिशत फिटकरी के घोल का उपयोग करने की सलाह दी जाती है। हालांकि, फिटकरी के घोल का प्रयोग करते समय और दवा लगाते वक्त पशु चिकित्सक से सही मार्गदर्शन लेना बेहद आवश्यक है।
सामूहिक संक्रमण रोकने के उपाय और खानपान के नियम
यदि किसी डेयरी फार्म या गांव में एक साथ कई पशु इस विषाणु की चपेट में आ जाते हैं, तो पूरे क्षेत्र में सामूहिक सफाई और संक्रमण नियंत्रण के उपाय तुरंत लागू करने चाहिए। मवेशियों के खुरों की सामूहिक सफाई के लिए फार्म के प्रवेश द्वार या उपयुक्त स्थान पर कीटाणुनाशक घोल से भरा गड्ढा या टब तैयार किया जा सकता है, जिससे होकर गुजरने पर पशुओं के खुर खुद साफ हो जाएं। सबसे महत्वपूर्ण कदम यह है कि बीमार पड़ चुके पशुओं को तुरंत स्वस्थ मवेशियों के झुंड से अलग करके एकांत स्थान पर बांधना चाहिए ताकि हवा या संपर्क से बीमारी आगे न फैले।
बीमारी के दौर से गुजर रहे पशुओं को भोजन में केवल ताजा, हरा और कोमल घास तथा सुपाच्य पौष्टिक आहार ही दिया जाना चाहिए। सूखा, कड़ा या कठोर चारा देने से मुंह के छालों में रगड़ लगती है, जिससे दर्द और जख्म दोनों बढ़ सकते हैं। पशुपालकों को याद रखना चाहिए कि किसी भी प्रकार की घरेलू या अंग्रेजी दवा देने से पहले पशु डॉक्टर से परामर्श लेना ही सुरक्षा का सबसे सही और वैज्ञानिक तरीका है।



















