इस्लामाबाद की सत्ता के गलियारों में जब भी सेना और चुनी हुई हुकूमत के बीच तनातनी बढ़ती है, तो इतिहास के पन्ने अनायास ही फड़फड़ाने लगते हैं। सन 1958, 1977 और फिर 1999 के फौजी हस्तक्षेपों की लंबी छाया आज भी मुल्क की सियासत पर मंडराती रहती है। अक्टूबर 1999 के उस नाटकीय घटनाक्रम के बाद से, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ के बीच का विवाद खुली बगावत में बदल गया था, करीब 27 वर्षों का लंबा अरसा गुजरने को है। हैरानी की बात यह है कि सेना के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के लिए पहचाने जाने वाले मुल्क में इतने लंबे समय से कोई भी खुला और कामयाब मिलिट्री टेकओवर दर्ज नहीं हुआ।
सवाल उठता है कि क्या इस खामोशी को मुल्क के जम्हूरी ढांचे की पूर्ण बहाली मान लिया जाए। अगर सियासी हकीकत को करीब से देखा जाए तो जवाब इतना सीधा नहीं है। दरअसल, 1999 की उथल-पुथल के बाद पाकिस्तान में एक नया ढांचा पनपा, जिसे रणनीतिक तालमेल या 'स्ट्रैटेजिक अकोमोडेशन' कहा जा सकता है। इसमें फौज को सीधे मुल्क की कमान देने की जगह चुनी हुई सरकारें सेना की प्राथमिकताओं, संस्थागत मांगों और लाल रेखाओं के आगे झुकना पसंद करती हैं। संसद चलती रहती है, आम चुनाव भी होते हैं और प्रधानमंत्री का दफ्तर भी कायम रहता है, मगर टकराव को उस हद तक जाने ही नहीं दिया जाता जहां से टैंक सड़कों पर उतरने की नौबत आ जाए।
साजिशों और प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप का शुरुआती सफर
मुल्क के गठन के कुछ ही वर्षों के भीतर ही हुकूमत बदलने की पहली बड़ी गुप्त योजना सामने आ गई थी। वर्ष 1951 में मेजर जनरल अकबर खान के साथ कुछ अन्य सैन्य व असैन्य चेहरों पर लियाकत अली खान की तत्कालीन सरकार को उखाड़ फेंकने का षड्यंत्र रचने का इल्जाम लगा। इसे रावलपिंडी कॉन्सपिरेसी केस के नाम से जाना गया। हालांकि वक्त रहते गिरफ्तारी हो जाने की वजह से वह कोशिश नाकाम साबित हुई और सरकार बची रह गई। इसके ठीक दो साल बाद एक भिन्न किस्म का प्रशासनिक संकट उभरा। वर्ष 1953 में गवर्नर जनरल गुलाम मोहम्मद ने प्रधानमंत्री ख्वाजा नजीमुद्दीन को बर्खास्त कर दिया और अगले ही साल 1954 में संविधान सभा भी भंग कर दी गई। इस दौर ने साफ संकेत दे दिया था कि नौकरशाही और वर्दीधारी तंत्र के सामने निर्वाचित संस्थान बेहद कमजोर स्थिति में थे।
खुलेआम फौजी शासन की पहली मुकम्मल शुरुआत 7 अक्टूबर 1958 को हुई। तत्कालीन राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा ने संविधान को दरकिनार करते हुए असेंबलियां भंग कर दीं और मार्शल लॉ का ऐलान कर दिया। जनरल अयूब खान को चीफ मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त किया गया। मगर कुछ ही दिनों के भीतर अयूब खान ने खुद मिर्जा को सत्ता से बेदखल कर दिया और 1959 में स्वयं को प्रमोट करते हुए राष्ट्रपति पद पर काबिज हो गए। यह मुल्क का पहला सफल प्रत्यक्ष फौजी कब्जा था।
जुल्फिकार अली भुट्टो से लेकर नवाज शरीफ तक का दौर
करीब दो दशकों के ठहराव के बाद 5 जुलाई 1977 को एक बार फिर बूटों की थाप संसद की चौखट लांघ गई। चुनाव में कथित हेरफेर के आरोपों को लेकर पाकिस्तान नेशनल अलायंस का आंदोलन जोर पकड़ चुका था। राजनीतिक अनिश्चितता का फायदा उठाते हुए जनरल जिया-उल-हक ने जुल्फिकार अली भुट्टो की चुनी हुई हुकूमत को बर्खास्त कर दिया। इसके बाद देश लंबे समय तक सैन्य शासन, मार्शल लॉ और इस्लामीकरण के सख्त दौर में धकेल दिया गया।
बीस साल बाद 12 अक्टूबर 1999 को एक बार फिर वैसा ही टकराव चरम पर पहुंच गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ को हटाने की कोशिश की, मगर फौज ने उस हुक्म को मानने से इनकार कर दिया। कुछ ही घंटों में सरकारी मशीनरी और अहम इमारतों पर फौज का पहरा बैठ गया, शरीफ सत्ता से बाहर हो गए और मुशर्रफ ने चीफ एग्जीक्यूटिव की हैसियत से देश की बागडोर संभाल ली। यह पाकिस्तान के इतिहास का आखिरी प्रत्यक्ष और मुकम्मल सैन्य तख्तापलट साबित हुआ।
2008 के बाद का सियासी बदलाव और समझौतों का नया दौर
जनरल मुशर्रफ के पद छोड़ने के बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया की वापसी हुई। 2008 में पीपीपी की अगुवाई में सरकार का गठन हुआ। उसी कालखंड में सेना प्रमुख बने जनरल अशफाक परवेज कयानी ने वर्दीधारी अफसरों को सक्रिय सियासत से दूरी बनाए रखने की नसीहत दी। वर्ष 2013 में एक और अहम पड़ाव आया, जब एक निर्वाचित असैनिक सरकार ने शांतिपूर्ण तरीके से दूसरी चुनी हुई सरकार को सत्ता सौंपी। सेना ने सीधे तख्त पर बैठने के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया को जारी रहने की इजाजत दी।
लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं था कि नागरिक और सैन्य नेतृत्व के बीच का अविश्वास पूरी तरह काफूर हो चुका था। कई मौकों पर तनाव 1999 जैसे विस्फोटक बिंदु के बेहद करीब पहुंच गया था। इसका सबसे चर्चित प्रमाण 2011 का मेमोगेट विवाद बना। ऐबटाबाद में ओसामा बिन लादेन पर अमेरिकी कार्रवाई के बाद एक कथित गोपनीय ज्ञापन सामने आया, जिसमें वॉशिंगटन से पाकिस्तानी सेना और खुफिया तंत्र के पर कतरने के लिए असैन्य सरकार की मदद मांगी गई थी। इस मामले में अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक्कानी पर गाज गिरी और उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। सरकार ने टकराव को पालने के बजाय उस पर पर्दा डालते हुए सेना की नाराजगी शांत करना बेहतर समझा।
बदले समीकरण: टकराव टालकर कुर्सी बचाने की रणनीति
अगर 1999 से 2026 तक के पूरे सफर का आकलन करें, तो राजनीतिक दलों ने यह समझ लिया है कि फौज से सीधी टक्कर का अंजाम सत्ता गंवाना ही होता है। यही वजह है कि जब भी सुरक्षा, विदेश नीति या संस्थागत हितों पर मतभेद उभरते हैं, तो असैन्य हुकूमतें रक्षात्मक रुख अपनाते हुए समझौतों का रास्ता चुन लेती हैं। सेना के लिए भी यह व्यवस्था मुफीद साबित होती है, क्योंकि रोजमर्रा के प्रशासनिक संकट, महंगाई और सार्वजनिक असंतोष का ठीकरा राजनीतिक दलों पर फूटता रहता है, जबकि अहम मामलों में उसका असरदार नियंत्रण ज्यों का त्यों बरकरार रहता है।



















