नियंत्रण रेखा पर भारतीय सुरक्षा तंत्र की अभेद्य घेराबंदी ने घुसपैठियों के जमीनी रास्तों को पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया है। इस सख्त जमीनी पहरेदारी के बाद सीमा पार बैठे रणनीतिकारों और खुफिया तंत्र ने अपनी पुरानी कार्यशैली को बदलकर हवा का रास्ता चुना है। इंसानी घुसपैठ में होने वाले भारी नुकसान से बचने के लिए अब सैन्य स्तर के उन्नत ड्रोनों का एक सुनियोजित ढांचा तैयार किया गया है। इसका प्राथमिक मकसद बिना सीमा लांघे कश्मीर घाटी के बारामुला स्थित सघन जंगलों में आधुनिक असॉल्ट हथियार, चिपकने वाले मैग्नेटिक बम और नकदी की खेप सुरक्षित पहुंचाना है, जिससे स्थानीय मददगारों के जरिए हिंसा के तंत्र को जिंदा रखा जा सके। इस रणनीति का मुकाबला करने के लिए थल सेना, सीमा सुरक्षा बल और स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप ने सीमा से लेकर अंदरूनी जंगलों तक एक त्रिस्तरीय सुरक्षा कवच खड़ा कर दिया है।
तुर्की तकनीक और लंबी दूरी के विमानों से टोह लेने का पैंतरा
सीमा पार की सैन्य चौकियां अब केवल खिलौनों या साधारण व्यावसायिक ड्रोनों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आधुनिक युद्ध तकनीक से लैस एयरक्राफ्ट का बेड़ा तैयार कर चुकी हैं। नियंत्रण रेखा के पार मध्यम ऊंचाई पर लंबी दूरी तक उड़ान भरने वाले मानवरहित विमानों के अलावा तुर्की निर्मित बयारक्तार टीबी2 जैसे घातक प्लैटफॉर्म्स को तैनात किया गया है। इन आधुनिक प्रणालियों का मुख्य कार्य सीधे तौर पर हमले करने के बजाय एक जटिल सर्विलांस तंत्र संचालित करना है।
इन निगरानी उड़ानों का पहला लक्ष्य भारतीय सुरक्षा बलों की दैनिक गश्त, जवानों की आवाजाही और संवेदनशील अग्रिम चौकियों के विन्यास पर लगातार नजर रखना है। दूसरी महत्वपूर्ण भूमिका भारतीय वायु रक्षा और निगरानी रडार तंत्र में मौजूद प्राकृतिक या तकनीकी ब्लाइंड स्पॉट्स यानी खाली जगहों की शिनाख्त करना है। इन गैप्स की पहचान होते ही कम ऊंचाई पर उड़ने वाले छोटे रोटरक्राफ्ट को बिना पकड़े सीमा के इस पार धकेलने का गुप्त गलियारा खोजा जाता है। इसके अतिरिक्त, ये उच्च तकनीक वाले विमान सीमा पार सक्रिय आतंकी लॉन्च पैड्स और उनके हैंडलर्स को सीधे लाइव डेटा व सटीक भौगोलिक निर्देशांक मुहैया कराते हैं, ताकि हथियारों की ड्रॉपिंग का सटीक समय और सुरक्षित स्थान तय किया जा सके।
घने जंगलों में कम ऊंचाई वाली ड्रॉपिंग और बारामुला का केंद्र
पारंपरिक रडार और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस से बचने के लिए रणनीतिकारों ने कम ऊंचाई पर उड़ने वाले छोटे मल्टीरोटर ड्रोनों को आगे किया है। ये छोटे उड़न खटोले सीमा से काफी भीतर तक चुपचाप प्रवेश करते हैं और सुरक्षा बलों की सामान्य नजरों से बचते हुए जंगलों के अंदरूनी इलाकों में सामान गिराते हैं। उत्तर कश्मीर के बारामुला जिले में स्थित गोगल दारा का जंगल इस नई हवाई सप्लाई के लिए मुख्य ड्रॉप जोन के रूप में चिन्हित हुआ है। घने पेड़ों और दुर्गम भूभाग का फायदा उठाकर देर रात के सन्नाटे में यहां ड्रॉपिंग की जाती है, ताकि जमीन पर मौजूद स्थानीय गुर्गे बिना किसी खतरे के सामान को उठा सकें।
ड्रोन के जरिए गिराए जाने वाले पैकेटों में खास तौर पर वे उपकरण शामिल होते हैं जो शहरी और ग्रामीण इलाकों में तेज गति से हमले करने के लिए तैयार किए गए हों। इनमें आसानी से छुपाकर ले जाई जा सकने वाली छोटी कॉम्पैक्ट असॉल्ट राइफलें शामिल हैं, जिन्हें भीड़भाड़ वाली जगहों पर ले जाना आसान होता है। इसके साथ ही वाहनों को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किए गए मैग्नेटिक स्टिकी बम भेजे जा रहे हैं, जिन्हें किसी भी गाड़ी के निचले हिस्से पर धातु से चिपकाकर दूर से या टाइमर के जरिए विस्फोटित किया जा सकता है। खेप में विशिष्ट त्रिकोणीय आकार वाले चीनी हथगोले और स्थानीय स्तर पर लॉजिस्टिक्स, सुरक्षित पनाहगाह और नए युवकों को जोड़ने के लिए भारतीय मुद्रा के बंडल भी लगातार भेजे जा रहे हैं। इस पद्धति से सीमा पार के आकाओं को अपने आतंकियों को सीधे सीमा पार भेजने का जानलेवा जोखिम नहीं उठाना पड़ता और अंदरूनी मॉड्यूल को हर जरूरी सामान घर बैठे मिल जाता है।
जम्मू संभाग की सीमाओं पर बरामदगी और जमीनी कार्रवाई
हवाई मार्ग से हथियार गिराने के इस नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए भारतीय सेना, बीएसएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप ने पूरे क्षेत्र में एक एकीकृत सुरक्षा ग्रिड सक्रिय किया है। हालिया महीनों में जवानों ने त्वरित जवाबी कार्रवाई करते हुए सीमावर्ती जिलों में कई ड्रोनों को मार गिराया है और उनसे लटकी भारी घातक सामग्री जब्त की है।
घगवाल सेक्टर के पलूरा गांव में बीएसएफ और एसओजी के संयुक्त अभियान के दौरान एक संदिग्ध पाकिस्तानी ड्रोन की हलचल को तुरंत भांप लिया गया। तकनीकी हस्तक्षेप के जरिए ड्रोन को इंटरसेप्ट किया गया, जिससे पीले रंग के मजबूत टेप में बंधा एक संदिग्ध पैकेट बरामद हुआ। इस पैकेट को खोलने पर उसमें से आधुनिक पिस्तौलें, भारी मात्रा में जिंदा गोलियां और कई हैंड ग्रेनेड बरामद किए गए। इसी क्रम में अखनूर अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सतर्क जवानों ने आसमान में मंडरा रहे एक विशाल हेक्साकोप्टर ड्रोन को सटीक गोलीबारी से मार गिराया। इस छह पंखों वाले भारी ड्रोन के साथ अत्याधुनिक असॉल्ट राइफलें, एम4 कार्बाइन की अतिरिक्त मैगजीन और वाहनों को उड़ाने वाले चुंबकीय स्टिकी बम कसकर बांधे गए थे। इसके अलावा कठुआ सीमा क्षेत्र में सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने अंधेरे में भारतीय सीमा में घुस रहे एक भारी-भरकम ड्रोन पर लगातार फायरिंग की, जिसके बाद की गई गहन तलाशी में चीनी पिस्तौलों और उच्च क्षमता वाले विस्फोटक पदार्थों का जखीरा बरामद कर लिया गया।
पूंछ के पहाड़ों से लेकर आरएस पुरा और सांबा तक साजिशें पस्त
यह तकनीकी षड्यंत्र केवल जम्मू के समतल मैदानी इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि पीर पंजाल के दुर्गम पर्वतीय गलियारों तक इसका विस्तार किया गया है। हालांकि भारतीय सुरक्षा तंत्र ने उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्धक तकनीकों की मदद से इस पूरे हवाई गलियारे को निष्प्रभावी बना दिया है।
पूंछ के पथरीले और ऊंचे पहाड़ी रास्तों में सुरक्षा एजेंसियों ने पुख्ता सूचनाओं के आधार पर व्यापक तलाशी अभियान चलाए। यहां घने जंगलों से ड्रोन द्वारा गिराई गई ऐसी खेप बरामद की गई जिसमें छोटी बैरल वाली बंदूकें और भारी मात्रा में भारतीय मुद्रा शामिल थी। यह पैसा और हथियार स्थानीय स्तर पर हिंसा फैलाने वाले स्लीपर सेल को सक्रिय करने के उद्देश्य से भेजा गया था। वहीं आरएस पुरा सेक्टर में भारतीय सेना और सीमा सुरक्षा बल के काउंटर-ड्रोन सिस्टम ने सटीक इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग का प्रदर्शन किया। जैमर्स के जरिए दुश्मन के मल्टीरोटर ड्रोनों के नेविगेशन और रेडियो सिग्नल को हवा में ही जाम कर दिया गया, जिससे उनका संपर्क कट गया और वे जमीन पर आ गिरे। इन ड्रोनों की जांच करने पर एके-47 राइफलों के कारतूस और रिमोट से चलने वाले आईईडी बनाने के संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक घटक बरामद हुए। सांबा सेक्टर में भी जवानों ने एक उड़ते हुए ड्रोन को मार गिराने में सफलता पाई, जो मैग्नेटिक आईईडी लेकर आ रहा था। बाद की विस्तृत जांच से स्पष्ट हुआ कि इन विस्फोटकों का प्रयोग भीड़भाड़ वाले शहरी बाजारों में खड़ी गाड़ियों को निशाना बनाने के लिए किया जाना था।
एंटी-ड्रोन ग्रिड, आधुनिक सेंसर और त्रिस्तरीय रक्षा रणनीति
सीमा पार से उभरती इस गैर-पारंपरिक हवाई चुनौती को पूरी तरह समाप्त करने के लिए भारतीय बलों ने रक्षा की त्रिस्तरीय प्रणाली लागू की है। सीमावर्ती अग्रिम चौकियों पर पारंपरिक हथियारों से पहरा देने के साथ-साथ अब उन्नत तकनीकी उपकरणों का व्यापक जाल बिछा दिया गया है।
इस सुरक्षा व्यवस्था की पहली मजबूत कड़ी अत्याधुनिक एंटी-ड्रोन गन और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक जैमर्स हैं। ये उपकरण सीमा के निकट आने वाले किसी भी संदिग्ध उड़ान यंत्र के रेडियो फ्रीक्वेंसी और जीपीएस सिग्नल को चंद सेकंड के भीतर जाम कर देते हैं, जिससे उसका कंट्रोल रूम से संपर्क टूट जाता है और वह दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है। दूसरी कड़ी के रूप में अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा के संवेदनशील रास्तों पर हाई-डेफिनिशन थर्मल इमेजर्स और नाइट-विज़न कैमरों का नेटवर्क तैयार किया गया है, जो घने कोहरे या अंधेरी रातों में भी बहुत कम ऊंचाई पर उड़ने वाले सूक्ष्म ड्रोनों की थर्मल छवि तुरंत पकड़ लेते हैं। इसके साथ ही, स्थानीय ग्रामीणों और सीमावर्ती बस्तियों के नागरिकों को जागरूक कर एक मजबूत खुफिया तंत्र विकसित किया गया है, जिससे किसी भी असामान्य भिनभिनाहट या रोशनी की जानकारी सुरक्षा बलों को तत्काल मिल जाती है और आसमान से गिरते हथियारों का पूरा खेल जमीन पर पहुंचने से पहले ही नाकाम हो जाता है।



















