पड़ोसी मुल्क अफगानिस्तान में अपनी पुरानी पकड़ ढीली पड़ती देख पाकिस्तानी हुक्मरानों ने एक बार फिर अपनी पुरानी और कुटिल रणनीतियों की तरफ रुख करना शुरू कर दिया है। सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान क्षेत्र में अपना प्रभाव और दबदबा बरकरार रखने के लिए कुछ खास आतंकवादी संगठनों के प्रति नरम रवैया अपना सकता है। इस पूरी कूटनीति का सबसे बड़ा केंद्र इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रोविंस यानी आईएसकेपी बना हुआ है, जिसके तार कई जगह पाकिस्तान की आंतरिक व्यवस्था से जुड़ते नजर आ रहे हैं।
पाकिस्तानी सरजमीं पर सक्रियता और तालिबान के गंभीर आरोप
विश्लेषकों का मानना है कि आईएसकेपी का नेटवर्क आज भी पाकिस्तान के बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा प्रांतों में सक्रिय बना हुआ है। इस पूरे तंत्र को बनाए रखने में कई बार पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र के भीतर छिपे तत्वों की मदद मिलने के दावे भी सामने आए हैं। पिछले कुछ समय में तालिबान और पाकिस्तान के बीच के द्विपक्षीय संबंधों में भारी खटास आई है। तालिबान का साफ तौर पर आरोप है कि पाकिस्तानी हुकूमत अपनी ही जमीन पर आईएसकेपी को फलने-फूलने और पनपने की पूरी छूट दे रही है।
इस पूरे मामले में आईएसकेपी के प्रमुख नेता सनाउल्लाह गफारी का नाम प्रमुखता से लिया जाता रहा है। तालिबान की तरफ से यह दावा भी किया गया है कि गफारी पाकिस्तान के भीतर स्थित आईएसकेपी से जुड़े विभिन्न ठिकानों पर लगातार आता-जाता रहा है। इसी स्थिति से निपटने के लिए बीते जून महीने में तालिबान ने बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के इलाकों में आईएसकेपी से जुड़े बताए जाने वाले कई ठिकानों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करने का दावा किया था।
सामरिक गहराई की नीति और तालिबान के साथ बढ़ता टकराव
ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो पाकिस्तानी रणनीतिकार लंबे समय तक स्ट्रैटेजिक डेप्थ यानी रणनीतिक गहराई के सिद्धांत पर काम करते आए हैं। इस पुरानी नीति का मूल उद्देश्य काबुल में ऐसी सरकार को सत्तासीन देखना था जो पूरी तरह से रावलपिंडी के हितों के अनुकूल काम करे। पाकिस्तान को हमेशा से यह उम्मीद रही थी कि अफगानिस्तान में अपनी पसंद की हुकूमत होने से उसे भारत के खिलाफ एक बड़ा सामरिक लाभ मिलेगा और उसकी पश्चिमी सीमाएं भी पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी।
लेकिन अगस्त 2021 में जैसे ही तालिबान ने काबुल की सत्ता पर दोबारा कब्जा जमाया, वैसे ही क्षेत्रीय समीकरण पूरी तरह से पलट गए। पाकिस्तान को यह उम्मीद थी कि नया तालिबान प्रशासन डूरंड लाइन को मान्यता देगा और टीटीपी के खिलाफ सख्त कदम उठाएगा। इसके विपरीत, तालिबान ने अपनी स्वतंत्र विदेश और सुरक्षा नीति को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप, दोनों देशों के बीच सीमा पर खूनी झड़पों, हवाई हमलों और आर्थिक दबाव के नए दौर शुरू हो गए और दूरियां लगातार बढ़ती चली गईं।
टीटीपी के बाद आईएसकेपी का नया समीकरण और वाखान कॉरिडोर का महत्व
मौजूदा दौर में सुरक्षा का यह ताना-बाना और अधिक उलझ चुका है। तालिबान के लिए तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और आईएसकेपी दोनों ही बहुत बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां हैं। वैचारिक स्तर पर आईएसकेपी तालिबान का कट्टूर विरोधी है और दोनों गुटों के बीच खूनी संघर्ष भी जगजाहिर है। जहां तालिबान का मुख्य ध्यान अफगानिस्तान के भीतर अपनी शासन व्यवस्था को स्थिरता देना है, वहीं आईएसकेपी वैश्विक इस्लामिक स्टेट की कट्टरपंथी विचारधारा का समर्थन करते हुए तालिबान की सत्ता की वैधता को ही सिरे से खारिज करता है।
साल 2021 के बाद से तालिबान ने इस संगठन के खिलाफ लगातार कड़े सैन्य अभियान चलाए हैं। ऐसे में रिपोर्ट बताती है कि अगर पाकिस्तान इस आतंकवादी संगठन के प्रति नरमी का रुख अपनाता है, तो इससे उसे तालिबान पर दबाव बढ़ाने का एक नया हथियार मिल जाएगा और क्षेत्र में एक खतरनाक आतंकवादी नेटवर्क को फिर से संजीवनी मिल सकती है। इस पूरी बिसात पर वाखान कॉरिडोर सबसे संवेदनशील और अहम कड़ी के रूप में उभरकर सामने आया है।
अफगानिस्तान भूभाग का यह बेहद संकरा हिस्सा सीधे तौर पर चीन के शिनजियांग प्रांत की सीमा से जुड़ता है। उपलब्ध जानकारियों के मुताबिक, अफगान प्रशासन इस दिशा में चीन की तरफ जाने वाली एक सड़क का निर्माण तेजी से करवा रहा है। मई 2026 तक इस परियोजना का करीब 70 फीसदी काम पूरा हो जाने का दावा अफगान अधिकारियों द्वारा किया जा चुका है।
यदि यह नया व्यापारिक और सामरिक मार्ग पूरी तरह से सुचारू हो जाता है, तो अफगानिस्तान को आयात-निर्यात और सामानों की आवाजाही के लिए पाकिस्तान के ऊपर अपनी पारंपरिक निर्भरता को काफी हद तक कम करने का मौका मिल जाएगा। यही एक संभावित बदलाव पाकिस्तान की नींद उड़ाने के लिए काफी है क्योंकि आज की तारीख में अफगानिस्तान के अधिकांश व्यापारिक रास्ते पाकिस्तानी भूभाग से होकर गुजरते हैं। यदि चीन के साथ सीधा सड़क संपर्क स्थापित होता है, तो क्षेत्रीय राजनीति में पाकिस्तान का रसूख तेजी से घट सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में चीन के लिए पाकिस्तान की उपयोगिता का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है। रिपोर्ट में यह तार्किक आशंका भी जताई गई है कि यदि किसी वजह से वाखान कॉरिडोर की इस कनेक्टिविटी में कोई व्यवधान या अस्थिरता पैदा होती है, तो बीजिंग और काबुल के बीच का सीधा संपर्क बाधित हो सकता है। ऐसी किसी भी विकट परिस्थिति में पाकिस्तान के पास चीन के सामने अपनी रणनीतिक प्रासंगिकता और उपयोगिता को साबित करने का एक और मौका बच जाएगा। साफ है कि यह पूरा भू-राजनीतिक खेल सिर्फ दो पड़ोसी देशों की आपसी रंजिश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे चीन की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी, ट्रेड रूट्स और एशिया के बदलते सामरिक समीकरणों का बहुत बड़ा जाल बिछा हुआ है।



















