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बच्चों के साथ बेरहमी की बेंगलुरु घटना ने खोली डेकेयर की पोल, पेरेंट्स के लिए 5 जरूरी सावधानियांपेरेंटिंग
2 घंटे पहले· 2

बच्चों के साथ बेरहमी की बेंगलुरु घटना ने खोली डेकेयर की पोल, पेरेंट्स के लिए 5 जरूरी सावधानियां

बेंगलुरु के एक IT कैंपस के भीतर चल रहे डेकेयर सेंटर में टॉडलर बच्चों के साथ क्रूरता का मामला सामने आने के बाद 5 महिला केयरगिवर्स के खिलाफ FIR दर्ज हुई है। जानें अपने बच्चे को डेकेयर में छोड़ते वक्त किन 5 बातों की जांच जरूर करनी चाहिए।

पूजा भट्टपूजा भट्टहेल्थ संवाददाता 4 मिनट पढ़ें AI के लिए
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बेंगलुरु से सामने आई एक दिल दहला देने वाली घटना ने हर उस कामकाजी माता-पिता को हिला कर रख दिया है, जो अपने छोटे बच्चों को दिनभर डेकेयर या क्रेच के भरोसे छोड़कर जाते हैं। किसी नामी संस्थान के डेकेयर में बच्चा छोड़ते वक्त पेरेंट्स मान लेते हैं कि उनका बच्चा सुरक्षित हाथों में है, लेकिन बेंगलुरु की यह घटना बताती है कि यह भरोसा कितना खोखला साबित हो सकता है।

बेंगलुरु में आखिर हुआ क्या

मामला बेंगलुरु के एक प्रतिष्ठित IT कैंपस, कैपजेमिनी के HAL कैंपस के भीतर चल रहे डेकेयर सेंटर से जुड़ा है। यहां 2 से 3 साल के मासूम टॉडलर्स के साथ बर्बरता और क्रूरता किए जाने का खौफनाक मामला सामने आया। एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पूरे मामले का खुलासा हुआ, जिसके बाद 5 महिला केयरगिवर्स मंजुला, विजयलक्ष्मी, सिंधु, भवानी और बिंदु के खिलाफ FIR दर्ज कर ली गई।

दर्ज FIR के मुताबिक, जब भी ये नन्हे बच्चे रोते थे, तो केयरटेकर्स उन्हें चुप कराने के बजाय बाथरूम में बंद कर देती थीं। मामला यहीं नहीं रुका, बच्चों को सजा देने के नाम पर उन्हें फ्रंट-लोडिंग वॉशिंग मशीन के ड्रम के अंदर तक जबरन बिठा दिया गया। इसके अलावा बच्चों को वेस्टर्न टॉयलेट सीट पर बैठाकर रखा जाता था और जब वे रोते थे, तो टॉयलेट के जेट स्प्रे से सीधे उनके मुंह पर पानी की तेज धार मारी जाती थी। यह पूरी घटना उन सभी माता-पिता के लिए एक खतरे की घंटी है, जो अपने बच्चों को क्रेच या डेकेयर में भेजते हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर एक माता-पिता के तौर पर हम अपने बच्चे को डेकेयर में छोड़ते वक्त किन बातों का ध्यान रखें, ताकि ऐसी घटनाओं से बचा जा सके। बेंगलुरु की इस दर्दनाक घटना से सबक लेते हुए हर पेरेंट को ये 5 बेहद जरूरी बातें तुरंत जांचनी चाहिए।

1. मोबाइल पर लाइव सीसीटीवी एक्सेस जरूर मांगें

आजकल ज्यादातर बड़े डेकेयर सेंटर्स में सीसीटीवी कैमरे लगे तो होते हैं, लेकिन पेरेंट्स को उनका लाइव एक्सेस कभी नहीं दिया जाता। ऐसे में डेकेयर मैनेजमेंट से साफ शब्दों में कहें कि आपको अपने मोबाइल पर लाइव सीसीटीवी फीड चाहिए, ताकि आप काम के बीच-बीच में भी यह देख सकें कि आपके बच्चे के साथ वहां कैसा बर्ताव हो रहा है। अगर कोई सेंटर लाइव फीड देने में आनाकानी करता है या इनकार करता है, तो वहां अपना बच्चा छोड़ने से बचना ही समझदारी है।

2. बिना बताए अचानक डेकेयर पहुंचने की आदत डालें

बच्चे को पिक-अप या ड्रॉप करने के तय समय के अलावा, कभी भी अचानक और बिना बताए डेकेयर सेंटर पहुंच जाएं। खासतौर पर लंच टाइम या दोपहर के उस समय जब बच्चे सोते हैं या रोते हैं, तब अचानक जाकर यह देखें कि वहां का स्टाफ बच्चों को कैसे संभाल रहा है। इस तरह की सरप्राइज विजिट से स्टाफ हमेशा सतर्क रहता है और बच्चों के साथ लापरवाही या बदसलूकी करने से डरता है।

3. बच्चे के व्यवहार में आने वाले संकेतों को पहचानें

2 से 3 साल के मासूम बच्चे अक्सर बोलकर अपनी प्रताड़ना या डर को बयां नहीं कर पाते, लेकिन उनका व्यवहार बहुत कुछ कह देता है। अगर आपका बच्चा अचानक डेकेयर जाने के नाम पर असामान्य रूप से रोने लगे, रात में अचानक चौंककर उठने लगे, बिस्तर गीला करने लगे, बिना किसी वजह के बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो जाए या किसी खास केयरटेकर का नाम सुनते ही सहम जाए, तो इन संकेतों को कभी भी नजरअंदाज न करें। ये सारे लक्षण किसी गहरी परेशानी की तरफ इशारा कर सकते हैं।

4. केयरगिवर्स की पृष्ठभूमि और स्टाफ-टू-चाइल्ड अनुपात जरूर परखें

यह पता करना बेहद जरूरी है कि जो लोग आपके बच्चे की देखभाल कर रहे हैं, उनका पुलिस वेरिफिकेशन यानी बैकग्राउंड चेक हुआ है या नहीं। इसके साथ ही यह भी जांचें कि एक केयरटेकर के जिम्मे कितने बच्चे छोड़े गए हैं। अगर छोटे टॉडलर्स के ग्रुप में बच्चों की संख्या ज्यादा हो और केयरटेकर्स की संख्या कम, तो स्टाफ चिड़चिड़ेपन में आकर बच्चों पर अपना गुस्सा निकाल सकता है, जैसा कि ऐसे मामलों में अक्सर देखा गया है।

5. बच्चे की बॉडी की नियमित जांच करें और उससे बात करें

काम की व्यस्तता के बावजूद रोज शाम को बच्चे के साथ कुछ क्वालिटी टाइम जरूर बिताएं और खेल-खेल में उससे डेकेयर के माहौल के बारे में पूछें। हर रोज बच्चे को नहलाते या कपड़े बदलते वक्त उसके शरीर पर किसी भी तरह के असामान्य निशान, रैशेज या चोट को गौर से देखें। अगर बच्चा कुछ बताने की कोशिश करे, तो उसकी बात को हल्के में न लें और उसे पूरी गंभीरता से सुनें।

बेंगलुरु की यह घटना केवल एक अपराध भर नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे पर सीधी चोट है जो कामकाजी माता-पिता किसी संस्थान और उसके सिस्टम पर करते हैं। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम और माता-पिता की लगातार सतर्कता ही हमारे बच्चों को ऐसे किसी भी खतरनाक माहौल से बचा सकती है। सतर्क रहें, सुरक्षित रहें।

इसका आप पर असर

यह घटना उन सभी माता-पिता के लिए सीधी चेतावनी है, जो अपने छोटे बच्चों को डेकेयर या क्रेच के भरोसे छोड़ते हैं।

  • भारत में: देशभर के कामकाजी माता-पिता को अपने बच्चे के डेकेयर से लाइव सीसीटीवी एक्सेस, केयरगिवर्स का बैकग्राउंड वेरिफिकेशन और स्टाफ-टू-चाइल्ड अनुपात जैसी बुनियादी बातों की मांग अब गंभीरता से करनी होगी।
  • बेंगलुरु में: कैपजेमिनी के HAL कैंपस स्थित डेकेयर से जुड़े इस मामले के बाद बेंगलुरु के पेरेंट्स के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे अपने बच्चों के डेकेयर सेंटर पर सरप्राइज विजिट करें और बच्चों में दिख रहे व्यवहार बदलावों पर तुरंत ध्यान दें।

सवाल-जवाब

बेंगलुरु के किस डेकेयर सेंटर में यह घटना हुई?
यह घटना बेंगलुरु के एक प्रतिष्ठित IT कैंपस, कैपजेमिनी के HAL कैंपस के भीतर चल रहे डेकेयर सेंटर में हुई।
इस मामले में किसके खिलाफ FIR दर्ज हुई है?
मामले में 5 महिला केयरगिवर्स मंजुला, विजयलक्ष्मी, सिंधु, भवानी और बिंदु के खिलाफ FIR दर्ज की गई है।
बच्चों के साथ वहां क्या-क्या किया गया?
FIR के मुताबिक रोने पर बच्चों को बाथरूम में बंद किया जाता था, उन्हें वॉशिंग मशीन के ड्रम में बिठाया जाता था, वेस्टर्न टॉयलेट सीट पर बैठाया जाता था और टॉयलेट जेट स्प्रे से उनके मुंह पर पानी मारा जाता था।
पेरेंट्स को डेकेयर चुनते वक्त सबसे पहले क्या जांचना चाहिए?
पेरेंट्स को मोबाइल पर लाइव सीसीटीवी एक्सेस, केयरगिवर्स का बैकग्राउंड वेरिफिकेशन और स्टाफ-टू-चाइल्ड अनुपात जरूर जांचना चाहिए।
बच्चे में किन संकेतों से पता चलता है कि वह डेकेयर में परेशान है?
अगर बच्चा डेकेयर जाने के नाम पर असामान्य रूप से रोए, रात में चौंककर उठे, बिस्तर गीला करे, बहुत चिड़चिड़ा हो जाए या किसी केयरटेकर का नाम सुनकर सहम जाए, तो ये सभी रेड फ्लैग हो सकते हैं।
सरप्राइज विजिट क्यों जरूरी बताई गई है?
बिना बताए अचानक डेकेयर पहुंचने से स्टाफ हमेशा सतर्क रहता है और बच्चों के साथ लापरवाही करने से डरता है।
पूजा भट्ट
लेखक के बारे मेंपूजा भट्टहेल्थ संवाददाता लखनऊ
विशेषज्ञताहेल्थ समाचार, सार्वजनिक स्वास्थ्य, चिकित्सा रिपोर्टिंग, वेलनेस, फ़िटनेस, पोषण, स्वास्थ्य नीति, रोग जागरूकता, चिकित्सा अनुसंधान, मानसिक स्वास्थ्य

पूजा भट्ट एक हेल्थ संवाददाता हैं जो चिकित्सा ख़बरों, वेलनेस, स्वास्थ्य नीति, फ़िटनेस और सार्वजनिक स्वास्थ्य अपडेट को कवर करती हैं। वे अहम स्वास्थ्य घटनाक्रमों और उभरते चिकित्सा रुझानों पर रिपोर्ट करती हैं।

पूजा भट्ट एक हेल्थ संवाददाता हैं जो हेल्थकेयर पत्रकारिता — चिकित्सा ख़बरों, सार्वजनिक स्वास्थ्य अपडेट, वेलनेस रुझानों, अस्पताल व स्वास्थ्य तंत्र की रिपोर्टिंग और स्वास्थ्य नीति — में विशेषज्ञता रखती हैं। वे ब्रेकिंग हेल्थ स्टोरी, रोग जागरूकता, चिकित्सा अनुसंधान, फ़िटनेस, पोषण और हेल्थकेयर तकनीक की प्रगति कवर करती हैं। सटीकता और स्पष्टता पर मज़बूत ज़ोर के साथ पूजा ऐसी जानकारीपूर्ण रिपोर्टिंग देती हैं जो पाठकों को जटिल चिकित्सा विषयों और उनके वास्तविक असर को समझने में मदद करती है। उनकी कवरेज में सार्वजनिक स्वास्थ्य पहल, हेल्थकेयर तक पहुँच, निवारक देखभाल, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता और चिकित्सा में उभरते नवाचार शामिल हैं।

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