किसी व्यस्त शॉपिंग मॉल, पार्क, मेले या बाजार में अपने बच्चे का अचानक आंखों से ओझल हो जाना किसी भी अभिभावक के लिए किसी बुरे सपने जैसा होता है। ऐसी परिस्थिति सामने आते ही माता-पिता की दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं और घबराहट में तुरंत कोई निर्णय लेना कठिन हो जाता है। हालांकि, इस तरह की आपात स्थितियों का सामना करने का सबसे कारगर तरीका पूर्व तैयारी ही है। एक पूर्व आर्मी डॉक्टर ने सोशल मीडिया के माध्यम से बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा एक अत्यंत सरल और प्रभावकारी सेफ्टी प्लान प्रस्तुत किया है।
इस सुरक्षा योजना का प्राथमिक उद्देश्य बच्चों के व्यवहार को इस तरह दिशा देना है कि बिछड़ जाने पर वे खुद अपने माता-पिता को तलाशने की हड़बड़ी न करें, बल्कि एक निश्चित स्थान पर ठहरकर सुरक्षित सहायता की प्रतीक्षा करें। यहां उन 5 मूलभूत नियमों का विस्तृत ब्योरा दिया जा रहा है जिन्हें हर माता-पिता को समय रहते अपने बच्चों के मन में बैठा देना चाहिए।
1. रुकना और स्थान न छोड़ना: स्टॉप एंड स्टे का नियम
डॉक्टर के अनुसार, बच्चा जैसे ही इस बात को महसूस करे कि उसके आसपास माता-पिता मौजूद नहीं हैं, उसे तुरंत अपने कदम रोक देने चाहिए। बच्चे का घबराकर इधर-उधर भटकना उसकी खोज प्रक्रिया को और अधिक जटिल बना देता है क्योंकि उसकी लोकेशन लगातार बदलती रहती है। यदि बच्चा उसी स्थान पर स्थिर खड़ा रहता है, तो माता-पिता और सुरक्षा कर्मचारी उसे अंतिम बार देखे गए स्थल के आसपास बहुत आसानी से खोज सकते हैं। बच्चों को यह स्पष्ट रूप से सिखाया जाना चाहिए कि गुम होने का अहसास होते ही उन्हें अपनी जगह पर जम जाना है।
2. शांत रहने के बजाय जोर से आवाज लगाकर शोर मचाएं
अक्सर देखा जाता है कि डर के कारण बच्चे सहम जाते हैं, चुपचाप एक कोने में खड़े हो जाते हैं या छिपने का प्रयास करते हैं। इस वजह से भीड़ के बीच उन्हें पहचान पाना बेहद कठिन हो जाता है। बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि रुकने के तुरंत बाद वे संकोच छोड़ें और जोर से चिल्लाना शुरू करें। वे अपने माता-पिता का पूरा नाम पुकार सकते हैं अथवा यह स्पष्ट बोल सकते हैं कि वे खो गए हैं। ऐसा करने से आसपास मौजूद आम जनता और सुरक्षाकर्मियों का ध्यान तुरंत बच्चे की ओर आकर्षित होता है।
3. केवल विश्वसनीय और सही व्यक्तियों से ही मदद मांगें
भीड़भाड़ वाले वातावरण में हर अजनबी पर भरोसा नहीं किया जा सकता, इसलिए बच्चों को यह पहचान होनी चाहिए कि सहायता के लिए किसके पास जाना है। बच्चों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों के लोगों से संपर्क करने का निर्देश दें
- वर्दीधारी पुलिसकर्मी अथवा मॉल व परिसर के सुरक्षा गार्ड।
- दुकान या स्टोर के काउंटर पर तैनात ऐसे कर्मचारी जिन्होंने नेमटैग पहना हो।
- ऐसी महिलाएं जो अपने स्वयं के बच्चों के साथ उस स्थान पर मौजूद हों।
अभिभावकों को चाहिए कि जब भी वे बच्चों को लेकर किसी सार्वजनिक स्थल पर जाएं, तो व्यावहारिक रूप से इन श्रेणियों के लोगों की पहचान कराएं।
4. फोन नंबर और नाम को लयबद्ध कविता की तरह याद कराएं
प्रत्येक बच्चे को अपने माता-पिता का पूरा नाम और कम से कम एक प्राथमिक मोबाइल नंबर कंठस्थ होना अनिवार्य है। इसे सिखाने का सबसे सुलभ तरीका यह है कि नंबर को किसी कविता या गाने की लय में बार-बार दोहराया जाए। मानसिक दबाव या डर की स्थिति में भी इस प्रकार लयबद्ध ढंग से याद किया गया नंबर बच्चे की स्मृति में तुरंत उभर आता है और वह किसी सहायक को अपना संपर्क नंबर बताने में सक्षम होता है।
5. गुप्त फैमिली कोड वर्ड निर्धारित करें
कई बार अनजान लोग बच्चों को यह कहकर गुमराह करने की कोशिश करते हैं कि उन्हें उनके माता-पिता ने लेने भेजा है। इस प्रकार के जोखिम से बचाव के लिए परिवार के भीतर एक ऐसा गुप्त कोड वर्ड तय करें जो केवल घर के सदस्यों को ही ज्ञात हो। बच्चे को यह सिखाएं कि यदि कोई व्यक्ति ऐसा दावा करे, तो बच्चा उससे तुरंत वह कोड वर्ड पूछे। यदि सामने वाला व्यक्ति सही शब्द बताने में असफल रहता है, तो बच्चा तुरंत वहां से हट जाए और किसी सुरक्षित वयस्क की शरण ले।
6. नियमित अभ्यास और शुरुआती समय की महत्ता
सुरक्षा के इन नियमों को केवल एक बार बता देना पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि संकट के क्षणों में बच्चे अक्सर इन्हें भूल सकते हैं। इसलिए जब भी बाजार या पार्क जाएं, तो खेल-खेल में रोल-प्ले के जरिए अभ्यास कराएं। बच्चे से पूछें कि यदि वह अलग हो जाता है तो गार्ड से क्या कहेगा। शुरुआती कुछ घंटे बच्चे की सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील होते हैं। यदि बच्चा पहले से इन 5 बातों के प्रति सचेत होगा, तो किसी भी अनहोनी की संभावना को टालकर बिछड़े बच्चे को कुछ ही मिनटों में परिवार से सुरक्षित मिलाया जा सकता है।



















