नन्हे बच्चों की गतिविधियां जितनी मासूम होती हैं, कई बार वे माता-पिता के लिए उतनी ही बड़ी पहेली बन जाती हैं। पालने में खेलता कोई शिशु जब अपनी नन्हीं उंगलियों को लगातार चूसने लगे या पूरी मुट्ठी मुंह के भीतर डालने की कोशिश करे, तो अधिकांश माता-पिता तुरंत घबरा जाते हैं। उन्हें लगता है कि शायद बच्चे का पेट खाली है और उसे दूध या भोजन की जरूरत है। विशेष रूप से जब बच्चा रो नहीं रहा होता और शांत रहकर भी हाथ मुंह में दिए रहता है, तो परिजनों के मन में यह संशय और गहरा हो जाता है कि यह भोजन की मांग है या केवल एक सहज स्वाभाविक आदत। वास्तविकता यह है कि शिशु अपने हाथों के जरिए दुनिया को टटोलने की शुरुआत करते हैं और हर बार उनका हाथ मुंह तक जाना भूख का पैगाम नहीं होता।
शारीरिक विकास और दुनिया को जानने का एक जरिया
शुरुआती महीनों में बच्चों की संवेदी इंद्रियों का विकास बहुत तेजी से होता है। अपने शरीर और आसपास के परिवेश को महसूस करने के लिए शिशु सबसे ज्यादा अपने मुंह का ही सहारा लेते हैं। उनके होंठ और जीभ किसी भी वस्तु की बनावट, तापमान और आकार को समझने के लिए सबसे संवेदनशील अंग होते हैं। जब वे अपने हाथों, उंगलियों या किसी सुरक्षित खिलौने को मुंह में डालते हैं, तो वे असल में यह जानने का प्रयास कर रहे होते हैं कि उनके शरीर के अंग कैसे काम करते हैं। यदि बच्चा पूरी तरह सहज है, खेलकूद में व्यस्त है और उसका व्यवहार सामान्य नजर आ रहा है, तो केवल उसके हाथ मुंह में डालने के आधार पर उसे जबरन दूध पिलाने की जरूरत नहीं होती।
भूख लगने पर बच्चे किस तरह के संकेत देते हैं
यह मानना पूरी तरह सही नहीं है कि बच्चा अपनी भूख केवल रोकर ही जाहिर करेगा। रोना असल में भूख का काफी देर बाद आने वाला लक्षण होता है। इससे पहले शिशु कई सूक्ष्म शारीरिक इशारे करते हैं, जिन्हें पहचानना बेहद अहम है। भूखा होने पर बच्चे अक्सर असहज होकर करवटें बदलते हैं, बार-बार अपना मुंह खोलते हैं और अपनी जीभ से होंठों को चाटते हैं। वे दूध की खोज में अपना सिर दाईं या बाईं दिशा में घुमाने लगते हैं, जिसे रूटिंग रिफ्लेक्स कहा जाता है। इस प्रक्रिया में कई बार वे अपने हाथ भी मुंह तक ले जाते हैं। इसलिए यदि हाथ मुंह में डालने के साथ-साथ शिशु बेचैन दिखे और दूध पीने के प्रति सक्रिय रुचि दिखाए, तभी इसे भूख का संकेत माना जाना चाहिए।
दांत निकलने के चरण में बढ़ती है उंगलियां चबाने की आदत
जब शिशु के मसूड़ों से नन्हे दांत बाहर आने की तैयारी में होते हैं, तब उनके मसूड़ों में भारी खुजली, कसावट और हल्का दर्द महसूस होता है। इस असहजता से राहत पाने के लिए बच्चे स्वाभाविक रूप से अपनी उंगलियों को मसूड़ों पर जोर-जोर से दबाते हैं ताकि उन्हें दबाव से सुकून मिल सके। इस दौर में वे न केवल अपने हाथ बल्कि हाथ में आने वाले किसी भी सुरक्षित खिलौने या कपड़े को भी मसूड़ों के बीच दबाने का प्रयास करते हैं। ऐसे संवेदनशील समय में बच्चे के मुंह से बार-बार उसका हाथ जबरन खींचने के बजाय यह देखना ज्यादा अहम है कि उसके हाथ साफ-सुथरे रहें और उसके नाखून समय पर कटे हों, ताकि मसूड़ों में किसी प्रकार का जख्म न बने।
हर बार बच्चे का हाथ मुंह से हटाना क्यों सही नहीं
अनेक माता-पिता बच्चे के हाथ मुंह में जाते ही तुरंत डांटने लगते हैं या उसका हाथ झटके से बाहर खींच लेते हैं। यदि शिशु के हाथ पूरी तरह धुले हुए हैं और वह किसी हानिकारक वस्तु के संपर्क में नहीं है, तो बार-बार दखल देने से बच्चा चिड़चिड़ा और कुंठित महसूस कर सकता है। अपने हाथों को चूसना कई बार बच्चों के लिए खुद को शांत करने का एक कुदरती तरीका भी होता है। परिजनों को समझदारी से स्थिति का आकलन करना चाहिए। यदि हाथ में धूल लगी है तो उसे धोएं, लेकिन यदि बच्चा सामान्य रूप से उंगली चूस रहा है तो हर कुछ सेकंड में उसे टोकना और रोकना बिल्कुल आवश्यक नहीं है।
सफाई और सुरक्षा से जुड़े जरूरी नियम
घर के भीतर स्वच्छता बनाए रखना माता-पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। फर्श या किसी धूल भरी सतह से उठाई गई चीजों को शिशु के मुंह तक जाने से तुरंत रोकना चाहिए। इसके अलावा घर में मौजूद छोटी वस्तुएं जैसे सिक्के, शर्ट के बटन, छोटे मोती, सेफ्टी पिन या ऐसी कोई भी बारीक चीज जिसे बच्चा निगल सकता है, उसे उसकी पहुंच से काफी दूर रखना अनिवार्य है ताकि सांस की नली में कुछ फंसने का जोखिम न रहे।
चिकित्सक से कब संपर्क करना जरूरी हो जाता है
यद्यपि हाथ मुंह में डालना सामान्य विकास का हिस्सा है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में डॉक्टरी सलाह लेना आवश्यक हो जाता है। यदि बच्चा लगातार हाथ मुंह में डाले रहने के साथ-साथ सामान्य रूप से दूध पीना या ठोस आहार लेना छोड़ दे, अत्यधिक रोए, बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा नजर आए या उसके स्वास्थ्य में कोई अन्य असामान्य बदलाव दिखाई दे, तो तुरंत किसी बाल रोग विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए ताकि किसी भी अंतर्निहित समस्या की सही समय पर पहचान हो सके।



















