आमतौर पर स्वास्थ्य और फिटनेस को सिर्फ वजन मापने वाले पैमाने या कमर के नाप से जोड़कर देखा जाता है। शरीर का भारीपन या पेट पर दिखने वाली सिलवटें लोगों को कसरत या भोजन की आदतों में बदलाव के लिए प्रेरित तो करती हैं, लेकिन देह के भीतर महत्त्वपूर्ण अंगों की असली हालत की अनदेखी हो जाती है। आंतरिक अंगों की सुरक्षा सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि बाहर से शरीर कितना सुगठित दिखाई दे रहा है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली के शोधकर्ताओं ने एक चिकित्सीय पड़ताल में स्पष्ट किया है कि केवल देह का भारीपन ही नहीं, बल्कि आंतरिक मेटाबॉलिक संतुलन इस बात का मुख्य निर्धारक है कि गुर्दे के आसपास कितना खतरनाक वसा जमा हो रहा है।
चिकित्सीय अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष और आंकड़े
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के सहयोग से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में आयोजित इस पड़ताल में उन 44 मोटे मरीजों को शामिल किया गया जो उपचार के लिए अस्पताल आए थे। चिकित्सकों ने यह परखने की कोशिश की कि अतिरिक्त वजन और बिगड़ा हुआ मेटाबॉलिज्म गुर्दे की बनावट और उसके कार्यों को कैसे प्रभावित करता है।
इस जांच में सामने आया कि जो मोटे मरीज मेटाबॉलिक रूप से अस्वस्थ थे, उनमें से 77 प्रतिशत व्यक्तियों के गुर्दे के चारों ओर अतिरिक्त वसा जमा थी, जिसे चिकित्सीय भाषा में रीनल साइनस फैट कहा जाता है। इसके विपरीत, जो मरीज मोटे थे परंतु जिनका मेटाबॉलिक स्वास्थ्य तुलनात्मक रूप से स्थिर और बेहतर था, उनमें यह अनुपात केवल 55 प्रतिशत दर्ज हुआ। इन दोनों आंकड़ों का अंतर यह साबित करता है कि अतिरिक्त शारीरिक भार के साथ यदि आंतरिक रासायनिक संतुलन भी बिगड़ जाए, तो अंगों पर पड़ने वाला जैविक दबाव बहुत तेजी से बढ़ जाता है।
वजन की तुलना में मेटाबॉलिक सेहत का अधिक प्रभाव
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के मेडिसिन विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अमनदीप सिंह ने समझाया कि गुर्दे के समीप वसा के जमाव में कुल वजन की अपेक्षा मेटाबॉलिक स्थिति अधिक निर्णायक साबित होती है। यदि दो अलग-अलग व्यक्तियों का बॉडी मास इंडेक्स बिल्कुल बराबर हो, तब भी दोनों के आंतरिक अंगों का स्वास्थ्य एक जैसा होना आवश्यक नहीं है।
जिस व्यक्ति का रक्तचाप अथवा रक्त शर्करा अनियंत्रित हो, उसके गुर्दे के चारों तरफ अधिक वसा एकत्र होने की संभावना रहती है, भले ही उसका वजन दूसरे व्यक्ति के ठीक बराबर हो। वहीं दूसरी तरफ, नियंत्रित शुगर और बीपी वाले व्यक्ति के अंग इस आंतरिक फैट के भारी घेराव से अपेक्षाकृत बचे रह सकते हैं। इसी अंतर के कारण विशेषज्ञ अब यह रेखांकित कर रहे हैं कि सिर्फ तराजू पर नजर रखने के बजाय आंतरिक स्वास्थ्य मापदंडों की समय पर निगरानी करना अधिक आवश्यक है।
अंगों पर निरंतर दबाव और धीमी क्षति की प्रक्रिया
गुर्दे के समीप जब वसा की परत मोटी होने लगती है, तो उसका दुष्प्रभाव अचानक सामने नहीं आता। यह एक धीमी और निरंतर चलने वाली जैविक प्रक्रिया है। शुरुआत में जब फैट बढ़ता है, तो गुर्दे की खून साफ करने की दर अस्थायी रूप से बढ़ सकती है, जिसे चिकित्सीय शब्दों में जीएफआर में वृद्धि कहा जाता है। यह बढ़ा हुआ दबाव लंबे समय तक बना रहे तो स्थिति ओबीस किडनी में बदल जाती है।
ओबीस किडनी की यह अवस्था दर्शाती है कि अंग लगातार असामान्य तनाव और खिंचाव में काम कर रहा है। निरंतर बना रहने वाला यह दबाव धीरे-धीरे अंग की प्राकृतिक कार्यप्रणाली को कमजोर करने लगता है, जिसका समय रहते पता न चलने पर भविष्य में गंभीर दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
पारंपरिक जांच की सीमाएं और नए बायोमार्कर की जरूरत
इस चिकित्सीय जांच से जुड़े अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के प्रोफेसर डॉ. एन.के. विक्रम ने परीक्षणों के तकनीकी पहलू पर विस्तार से बात की। उन्होंने स्पष्ट किया कि सामान्य ब्लड टेस्ट या रूटीन किडनी फंक्शन टेस्ट से शुरुआती चरण की अंदरूनी क्षति की पहचान कर पाना कठिन होता है। पारंपरिक जांचों की रिपोर्ट में जब तक कोई गड़बड़ी या असमानता दिखाई देती है, तब तक अंग की आंतरिक संरचना काफी हद तक प्रभावित हो चुकी होती है।
इस निदान संबंधी कठिनाई को दूर करने के उद्देश्य से शोधकर्ताओं ने एनजीएएल नामक एक विशिष्ट बायोमार्कर के उपयोग की ओर संकेत किया है। यह एक ऐसा प्रोटीन है जो गुर्दे में किसी प्रकार की सूजन या चोट उत्पन्न होने पर तुरंत सक्रिय हो जाता है। अध्ययन के दौरान पाया गया कि जिन मरीजों में मोटापे की मात्रा ज्यादा थी, उनके शरीर में इस विशेष प्रोटीन का स्तर भी काफी ऊंचा दर्ज हुआ। हालांकि चिकित्सकों का मानना है कि इसे नियमित स्वास्थ्य जांच का स्थायी हिस्सा बनाने से पहले व्यापक स्तर पर और अधिक शोध कार्य किए जाने जरूरी हैं।
गैर-मधुमेही व्यक्तियों पर भी मोटापे का सीधा असर
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के शोधकर्ताओं के एक अन्य पियर-रिव्यू अध्ययन में डायबिटीज से मुक्त मोटे वयस्कों का परीक्षण किया गया था। उस पड़ताल में भी उच्च बॉडी मास इंडेक्स और एनजीएएल के बढ़ते स्तर के बीच सीधा संबंध प्रमाणित हुआ था। इसका अर्थ यह निकलता है कि यदि किसी व्यक्ति को डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर की समस्या न भी हो, तब भी अतिरिक्त मोटापा अपने आप में गुर्दे पर दबाव बनाने के लिए पर्याप्त है।
यदि इस मोटापे के साथ अनियंत्रित ब्लड शुगर या उच्च रक्तचाप जैसी व्याधियां भी जुड़ जाएं, तो आंतरिक अंगों के लिए जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। केवल बाहरी रूप से खुद को चुस्त दिखाना या कुछ किलोग्राम वजन कम कर लेना संपूर्ण सुरक्षा की गारंटी नहीं है। गुर्दे और हृदय जैसे नाजुक अंगों को दीर्घकालिक सुरक्षा देने के लिए अपने खान-पान, जीवनशैली, रक्तचाप और रक्त शर्करा को संतुलित रखना अनिवार्य है, ताकि आंतरिक अंगों पर चर्बी का जानलेवा बोझ न बढ़ सके।



















