बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर की बांकीपुर उपचुनाव में जीत ने एक नए अध्याय की शुरुआत कर दी है। पिछले एक महीने से अधिक समय से इस एक सीट के चुनाव पर न केवल बिहार बल्कि पूरे देश की राजनीतिक निगाहें टिकी हुई थीं। जनसुराज के प्रत्याशी प्रशांत किशोर ने जब इस बहुचर्चित मुकाबले में जीत दर्ज की, तो सियासी पंडितों ने तुरंत इसकी तुलना 1994 के वैशाली लोकसभा उपचुनाव से करनी शुरू कर दी। इस पुरानी तुलना के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर तीन दशक पुराने राजनीतिक घटनाक्रम की गूंज आज के दौर में क्यों सुनाई दे रही है और दोनों परिणामों में क्या समानताएं हैं।
क्यों खास रहा बांकीपुर उपचुनाव का माहौल
राजनीतिक इतिहास और चुनावी समीकरणों को देखने वाले यही मान रहे थे कि आखिर महज एक विधानसभा सीट के उपचुनाव पर इतनी गहमागहमी क्यों मची हुई थी। इस सीट के बेहद खास होने की पहली बड़ी वजह यह थी कि यहां के विधायक रहे नितिन नवीन के भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य बनने के बाद यह सीट खाली हुई थी। यानी पार्टी के पदानुक्रम के हिसाब से यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के भी सर्वोच्च नेता की सीट थी। दूसरी बड़ी वजह यह थी कि इस निर्वाचन क्षेत्र पर पिछले इकतीस साल से पहले नवीन किशोर प्रसाद और फिर उनके बेटे नितिन नवीन का लगातार कब्जा रहा था। पूरे बिहार में इसे भारतीय जनता पार्टी की सबसे सुरक्षित सीट माना जाता रहा था। तीसरी और सबसे अहम वजह यह थी कि राजनीतिक रणनीतिकार से राजनेता बने जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर खुद इस चुनाव के जरिए पहली बार चुनावी मैदान में उतरे थे।
भाजपा की तमाम कोशिशें हुई नाकाम
भारतीय जनता पार्टी की ओर से अपने शीर्ष नेतृत्व की प्रतिष्ठा बचाने के लिए हर संभव प्रयास किए गए, लेकिन वे सभी दांव फेल साबित हुए। जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने उन्नीस हजार से अधिक वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल कर सभी सियासी विश्लेषकों को चौंका दिया। प्रशांत किशोर की इस ऐतिहासिक जीत की गूंज अब सीधे तौर पर साल 1994 के वैशाली लोकसभा उपचुनाव के उस बड़े उलटफेर से जोड़ी जा रही है, जिसने बिहार की राजनीति का रुख बदल दिया था।
कैसे तैयार हुई थी 1994 की राजनीतिक जमीन
वर्ष 1990 में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद से लालू प्रसाद यादव अपने खास अंदाज में बिहार की राजनीति चला रहे थे। उस समय पूरे संयुक्त बिहार में ऐसा राजनीतिक माहौल बन चुका था कि लालू यादव जो भी दांव चलते थे, वह उन्हीं के पक्ष में जाता हुआ प्रतीत होता था। अन्य पिछड़ा वर्ग और दलितों का समर्थन हासिल करने के लिए वे अपनी ठेठ भाषा में सवर्ण जातियों को लेकर खुलकर टिप्पणियां करते थे, लेकिन राजनीतिक रूप से उनका बाल भी बांका नहीं हो पाता था। उसी दौर में तत्कालीन लालू मंत्रिमंडल में सड़क मंत्रालय संभाल रहे इलियास हुसैन के विशेष प्रयासों से डेहरी ऑन सोन में एक नया ब्लॉक बनाया गया था। इसके उद्घाटन समारोह में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव खुद वहां पहुंचे थे। वहां मंच से भाषण देने के दौरान उन्होंने जनेऊधारियों को लेकर कई आपत्तिजनक बातें कहीं। उन्होंने खुले तौर पर यह ऐलान किया कि वह समाज के गरीब तबके और पिछड़ों को सम्मान दिलाने के लिए जनेऊधारियों को हर मोर्चे पर सबक सिखाएंगे। उन्होंने मंच से यह भी कहा कि वह जनेऊ वगैरह को कोई अहमियत नहीं देते हैं।
उस दौर के तीखे सियासी नारे और जातीय संघर्ष
उस दौर में लालू प्रसाद यादव लगातार ऐसे विवादास्पद नारे दे रहे थे जो सामाजिक ताने-बाने को झकझोर रहे थे। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के कारण पूरे बिहार में अगड़ा और पिछड़ा के नाम पर समाज गहरे जातीय संघर्ष की आग में झुलस रहा था। इन तमाम परिस्थितियों के चलते राज्य भर के सवर्ण, विशेषकर ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत वर्ग बेहद नाराज चल रहे थे। उसी समय ओबीसी वर्ग के बाहुबली नेता के रूप में पहचाने जाने वाले राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव को जब राजपूत समुदाय से ताल्लुक रखने वाले आनंद मोहन कड़ी चुनौती दे रहे थे, तो सवर्णों के बीच आनंद मोहन की लोकप्रियता काफी तेजी से ऊपर उठ रही थी। यह बढ़ती लोकप्रियता लालू प्रसाद यादव को अंदर ही अंदर काफी अखर रही थी।
क्या था 1994 का वैशाली लोकसभा उपचुनाव
लालू प्रसाद यादव की पार्टी जनता दल के सांसद शिवशरण सिंह का अचानक निधन हो गया, जिसके चलते वैशाली लोकसभा सीट पर वर्ष 1994 में उपचुनाव कराना अनिवार्य हो गया। पिछड़ी जातियों के बाहुबली नेताओं के सामने आनंद मोहन सवर्णों की एकजुटता और ताकत बनकर उभरे थे। तभी अपने समर्थकों की सलाह पर उन्होंने बिहार पीपुल्स पार्टी का गठन किया। उस दौर में इस नई पार्टी के साथ समूचे बिहार के सवर्ण तेजी से जुड़ते चले गए। जब वैशाली लोकसभा सीट पर उपचुनाव का ऐलान हुआ, तो लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती देने के लिए आनंद मोहन ने अपनी पार्टी के बैनर तले अपनी पत्नी लवली आनंद को चुनावी मैदान में उतार दिया। वहीं दूसरी ओर, पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा की पत्नी किशोरी सिन्हा कांग्रेस पार्टी के टिकट पर अपनी किस्मत आजमा रही थीं। किशोरी सिन्हा को सीधे तौर पर लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक आशीर्वाद प्राप्त था।
वर्चस्व की लड़ाई और चुनाव प्रचार का दौर
वर्ष 1994 का वह वैशाली उपचुनाव किसी स्थानीय विकास के मुद्दों पर नहीं, बल्कि सीधे तौर पर लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक वर्चस्व को नेस्तनाबूद करने के मुख्य मुद्दे पर लड़ा गया था। पूरे चुनाव प्रचार अभियान के दौरान आनंद मोहन और उनकी पत्नी तथा उम्मीदवार लवली आनंद सवर्ण समाज को पूरी तरह से एकजुट होने का निरंतर आह्वान करते रहे। दूसरी तरफ, लालू यादव की पूरी कोशिश यह थी कि किसी तरह आनंद मोहन के बढ़ते राजनीतिक कद को थामा जाए और कांग्रेस उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित कराई जाए। मतदान संपन्न होने के बाद वोटों की गिनती मुजफ्फरपुर के एलएस कॉलेज में शुरू हुई। उन दिनों बैलेट पेपर यानी मतपत्रों के जरिए चुनाव होने के कारण मतगणना में काफी समय लगता था। यही वजह थी कि आनंद मोहन और लवली आनंद कॉलेज के पास ही स्थित एक मकान में बैठकर वोटों की गिनती का पूरा हिसाब-किताब लगा रहे थे। शाम करीब साढ़े पांच बजे लवली आनंद की जीत की आधिकारिक घोषणा कर दी गई।
परिणाम के बाद का जश्न और आनंद मोहन का दावा
जीत की खबर मिलते ही आनंद मोहन अपनी विशिष्ट रौबीली मूंछों पर ताव देते हुए और काला चश्मा लगाए हुए सीधे मतगणना केंद्र पर जा पहुंचे। उनके साथ पार्टी की उम्मीदवार और उनकी धर्मपत्नी लवली आनंद भी मौजूद थीं। दोनों ने अपनी आंखों पर काले गॉगल्स पहन रखे थे। जैसे ही समर्थकों की नजर उन पर पड़ी, वहां मौजूद भीड़ ने गुलाल उड़ाना शुरू कर दिया और आनंद मोहन जिंदाबाद तथा लवली आनंद जिंदाबाद के नारे इतनी तेज आवाज में लगाए कि पूरा इलाका गूंज उठा। उसी दौरान आनंद मोहन मीडिया के सामने आए और पूरे आत्मविश्वास के साथ यह बड़ा बयान दिया कि वह आगामी छह महीने के भीतर बिहार के अगले मुख्यमंत्री बनने वाले हैं। उनके इतना कहते ही समर्थकों का उत्साह और भी ज्यादा चरम पर पहुंच गया। बिहार के सवर्णों को उस समय ऐसा महसूस होने लगा कि आनंद मोहन ही वह एकमात्र ऐसे नेता हैं जो उन्हें लालू प्रसाद यादव के शासन से मुक्ति दिला सकते हैं। पूरे बिहार में जिस रफ्तार से बिहार पीपुल्स पार्टी का सदस्यता अभियान आगे बढ़ा, उससे सवर्णों की उम्मीदें और भी परवान चढ़ने लगीं। हालांकि, इस ऐतिहासिक चुनावी परिणाम के कुछ ही महीनों बाद भूमिहार समाज के बड़े बाहुबली नेता छोटन शुक्ला की हत्या कर दी गई, जिसके बाद राजनीतिक समीकरण एक बार फिर तेजी से बदल गए।



















