भारतीय संसदीय इतिहास में कूटनीति और राजनीतिक शिष्टाचार को लेकर कई यादगार बहसें हुई हैं। ऐसा ही एक चर्चित वाकया 1990 के दशक का है, जब विदेश नीति के महत्वपूर्ण मोड़ पर तत्कालीन सरकार और विपक्ष के बीच तीखे सवाल-जवाब देखने को मिले थे। सितंबर 1993 में भारतीय प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने ईरान का दौरा किया था। इसके जवाब में अप्रैल 1995 में ईरान के राष्ट्रपति अकबर हाशमी रफसंजानी भारत की यात्रा पर आए। इस आधिकारिक यात्रा के दौरान जब वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ पहुंचे, तो वहां आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम को लेकर संसद में भारी हंगामा हुआ। लखनऊ से सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ने इस पूरे मामले को लेकर सरकार की कार्यशैली पर गंभीर आपत्ति जताई और प्रधानमंत्री से जवाब तलब किया।
1990 के दशक में भारत-ईरान संबंध और कूटनीतिक पृष्ठभूमि
साल 1991 में जब पी.वी. नरसिम्हा राव ने प्रधानमंत्री पद की कमान संभाली, तब देश गंभीर आर्थिक संकट और चुनौतीपूर्ण कूटनीतिक परिस्थितियों से गुजर रहा था। ऐसे कठिन समय में भारत को अपनी विदेश नीति को नए सिरे से संतुलित करने की जरूरत थी। इसी सिलसिले में मध्य पूर्व के देशों के साथ संबंधों को मजबूती देने की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। इसी कूटनीतिक प्रयास के तहत सितंबर 1993 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने ईरान का दौरा किया था। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को गहरा बनाना और आर्थिक तथा राजनीतिक मोर्चे पर नए अवसर तलाशना था।
इस यात्रा के जवाब में अप्रैल 1995 में ईरान के राष्ट्रपति अकबर हाशमी रफसंजानी भारत के राजकीय दौरे पर आए। रफसंजानी का यह दौरा केवल नई दिल्ली तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ भी गए। लखनऊ के अमौसी हवाई अड्डे पर उनका भव्य स्वागत किया गया, जिसके बाद वह शहर के प्रसिद्ध इमामबाड़े में आयोजित एक विशेष सभा को संबोधित करने पहुंचे। हालांकि, इस धार्मिक और सामाजिक मंच पर दिए गए वक्तव्यों और वहां के राजनीतिक माहौल ने देश के भीतर एक नया विवाद खड़ा कर दिया, जिसकी गूंज देश की संसद तक पहुंची।
प्रतिनिधिमंडल से नाम हटने और संवाद की कमी पर जताया विरोध
ईरान यात्रा से जुड़े शुरुआती घटनाक्रम में अटल बिहारी वाजपेयी के नाम को लेकर भी प्रशासनिक स्तर पर उथल-पुथल हुई थी। वाजपेयी की विदेश मामलों पर गहरी पकड़ और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी व्यापक स्वीकार्यता को देखते हुए, उन्हें शुरुआत में ईरान जाने वाले भारतीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया गया था। वह उस समय विपक्ष के प्रमुख नेताओं में से एक थे और वैश्विक कूटनीति की बारीकियों को भली-भांति समझते थे।
हालांकि, अंतिम समय में कुछ प्रशासनिक या राजनीतिक कारणों के चलते प्रतिनिधिमंडल की अंतिम सूची से उनका नाम हटा दिया गया। इस फैसले की पूर्व सूचना न दिए जाने पर वाजपेयी बेहद आहत हुए। जब यह विषय संसद में चर्चा के लिए आया, तो उन्होंने अपनी निराशा साफ शब्दों में व्यक्त की। वाजपेयी का स्पष्ट कहना था कि यदि प्रतिनिधिमंडल की संरचना में कोई बदलाव किया जाना था, तो शिष्टाचार के नाते उन्हें पहले सूचित किया जाना चाहिए था। उनकी आपत्ति केवल दौरे में शामिल न होने तक सीमित नहीं थी, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और उचित संवाद की कमी को लेकर भी थी।
संसद में गूंजी वाजपेयी की आवाज, तिरंगे की अनुपस्थिति पर दागे सवाल
ईरान के राष्ट्रपति की लखनऊ यात्रा के दौरान हुए घटनाक्रम पर अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद के पटल पर सरकार को जमकर घेरा। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान के राष्ट्रपति भारत के सम्मानित अतिथि थे और ईरान के साथ मजबूत और मैत्रीपूर्ण संबंध बनाना भारत के दीर्घकालिक हित में है। लेकिन लखनऊ में जिस प्रकार इस राजकीय यात्रा का इस्तेमाल एक राजनीतिक दल द्वारा संकुचित लाभ उठाने के लिए किया गया, वह अत्यंत चिंताजनक था।
वाजपेयी ने संसद में अपने वक्तव्य में कहा, "मैंने अपने भाषण में ईरान के राष्ट्रपति की लखनऊ यात्रा का उल्लेख किया था।" इसके बाद उन्होंने वहां के घटनाक्रम का ब्योरा देते हुए बताया कि अमौसी हवाई अड्डे से इमामबाड़े तक के रास्ते में भारत का राष्ट्रीय ध्वज तक नहीं लगाया गया था। इसके अलावा, मंच पर मौजूद स्थानीय नेताओं को अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिया गया और विदेशी मेहमान के सामने यह दावा किया गया कि देश में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं। वाजपेयी ने सवाल उठाया कि लखनऊ का निर्वाचित जनप्रतिनिधि होने के नाते उन्हें उस कार्यक्रम में आमंत्रित क्यों नहीं किया गया, और क्या विदेशी राष्ट्राध्यक्षों की यात्रा का उपयोग इस तरह के संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए किया जाना उचित है।
प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव का जवाब और संसद की ऐतिहासिक बहस
अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा उठाए गए गंभीर सवालों के जवाब में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने संसद में सरकार का पक्ष रखा। नरसिम्हा राव ने वाजपेयी की चिंताओं को खारिज करते हुए कहा कि विदेशी मेहमान ने भारत के आंतरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि ईरानी राष्ट्रपति को किसी ऐसी बात कहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सका जो वह स्वयं न कहना चाहते हों, और उनके वक्तव्य से भारत की स्थापित नीतियों की ही पुष्टि हुई है।
प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने वाजपेयी के वक्तव्य का जवाब देते हुए कहा, "उन्होंने हमारे घरेलू मामलों में बिल्कुल दखल नहीं दिया।" हालांकि, वाजपेयी ने प्रधानमंत्री की इस दलील से असहमति जताते हुए दोहराया कि विदेशी मेहमानों को देश के आंतरिक मतभेदों में खींचना अनुचित था। उन्होंने पूछा, "क्या विदेशी मेहमानों का इस तरह से दुरुपयोग किया जाएगा?" इस पर नरसिम्हा राव ने दोबारा प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "हम उस बात से बिल्कुल सहमत नहीं हैं।" उन्होंने तर्क दिया कि किसी भी राजनीतिक दल के नेताओं को अपनी पार्टी का पक्ष रखने से रोकना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। यह ऐतिहासिक बहस आज भी भारतीय संसदीय लोकतंत्र में कूटनीति, राष्ट्रीय मर्यादा और राजनीतिक मतभेदों के संतुलन की एक अनूठी मिसाल मानी जाती है।



















