वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर कांग्रेस पार्टी का मौजूदा रुख राजनीतिक गलियारों में बहस का बड़ा विषय बन गया है। एक तरफ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पार्टी चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर लगातार हमलावर बनी हुई है। पार्टी के तमाम बड़े नेता इस मुद्दे को लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई बताते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी इस पूरे मामले को आर-पार की लड़ाई का रूप दे चुके हैं। वह लगातार दिल्ली में रैलियां निकाल रहे हैं और पूरे देश में ऐसी जनसभाएं करने की योजना बना रहे हैं ताकि इस मुहिम को राष्ट्रव्यापी आंदोलन बनाया जा सके।
दक्षिण भारत से उठ रहे अलग सुर
लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे इस आक्रामक अभियान के बिल्कुल विपरीत तस्वीर दक्षिण भारत से सामने आ रही है। तमिलनाडु में कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने एसआईआर के मुद्दे पर एक अलग ही राजनीतिक वास्तविकता की ओर इशारा किया है। उनके अनुसार एसआईआर का अनुभव हर राज्य में एक जैसा नहीं रहा है। कार्ति चिदंबरम का यह मानना है कि पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों में इस प्रक्रिया का असर बहुत ज्यादा महसूस किया गया, जबकि तमिलनाडु में आम लोगों का अनुभव इसके मुकाबले काफी सीमित रहा है। यहीं से यह बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या कांग्रेस पार्टी एसआईआर के मुद्दे पर भी देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रणनीतिक रास्ते चुन रही है। जिस बात को दिल्ली में लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बताया जा रहा है, उसी मामले पर दक्षिण के नेताओं के सुर इतने अलग क्यों सुनाई दे रहे हैं, यह राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी हैरानी का विषय है।
गठबंधन की मजबूरियां और क्षेत्रीय राजनीति
कांग्रेस पार्टी के सामने असल मुश्किल केवल बयानों में दिख रहे इस विरोधाभास तक सीमित नहीं है। पार्टी एक तरफ राष्ट्रीय स्तर पर बेहद मजबूत और कड़ा राजनीतिक संदेश देना चाहती है, लेकिन देश के अलग-अलग राज्यों की जमीनी और वास्तविक परिस्थितियां उसके सामने अलग तरह की चुनौतियां खड़ी कर रही हैं। तमिलनाडु राज्य में कांग्रेस और डीएमके एक दूसरे के बहुत पुराने और अहम सहयोगी हैं। इसके बावजूद दोनों दलों के बीच राज्य की राजनीति में अपनी राजनीतिक जमीन बचाने और अपने प्रभाव को बढ़ाने को लेकर लगातार खींचतान चलती रहती है। ऐसे पेचीदा और संवेदनशील राजनीतिक माहौल में कांग्रेस पार्टी के लिए हर मुद्दे पर एक सा और आक्रामक रुख अपनाना कतई आसान काम नहीं होता है। कार्ति चिदंबरम ने अपने बयान में इस बात को भी स्पष्ट किया कि राज्य स्तर पर राजनीतिक दल एक दूसरे के कट्टर प्रतिद्वंद्वी हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वे आपसी सहयोग से काम कर सकते हैं। सवाल यही बना हुआ है कि क्या कांग्रेस के इस एसआईआर विरोधी अभियान में भी यही व्यावहारिक राजनीति दिख रही है, या फिर पार्टी की रणनीति राज्यों की अपनी राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से बदल जाती है।
राज्यों के हिसाब से बदलता एसआईआर का असर
दिल्ली के अंदर कांग्रेस पार्टी ने एसआईआर के खिलाफ पूरी ताकत के साथ मोर्चा संभाल रखा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करने के साथ-साथ पार्टी लगातार चुनाव आयोग की पूरी भूमिका पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर रही है। लेकिन दूसरी तरफ तमिलनाडु में कार्ति चिदंबरम का यह बयान इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि एसआईआर के प्रभाव को लेकर राज्यवार अंतर को स्वीकार करना बेहद जरूरी है। उनका यह कहना कि पश्चिम बंगाल और बिहार के लोगों का अनुभव तमिलनाडु से बिल्कुल अलग रहा है, अपने आप में पूरी तरह से गलत नहीं है क्योंकि देश के हर राज्य की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसके बावजूद कांग्रेस पार्टी को यह बात देश के सामने स्पष्ट करनी चाहिए कि उसकी राष्ट्रीय मांगें आखिर किन ठोस और पुख्ता शिकायतों पर टिकी हुई हैं, और उनका असर अलग-अलग राज्यों में इस तरह से अलग क्यों दिखाई दे रहा है।
डीएमके के साथ रिश्तों की उलझन
तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी की पूरी राजनीति का एक बहुत बड़ा हिस्सा डीएमके के साथ उसके आपसी रिश्तों पर ही निर्भर करता है। कार्ति चिदंबरम ने खुद दोनों दलों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद और टकराव होने की बात को स्वीकार किया है। उन्होंने अपनी बात को समझाने के लिए केरल राज्य का उदाहरण भी दिया, जहां कांग्रेस और सीपीआईएम एक दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरते हैं, लेकिन इसके बावजूद वे राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में आपसी सहयोग कर सकते हैं। यह तर्क गठबंधन की राजनीति के जटिल समीकरणों को तो भली-भांति समझाता है, लेकिन इससे कांग्रेस की एसआईआर रणनीति से जुड़े मूल सवाल खत्म नहीं हो जाते। यदि कोई राजनीतिक दल किसी एक मुद्दे को लेकर पूरे देश में बड़े पैमाने पर आंदोलन चला रहा है, तो उसे देश की जनता को यह भी बताना होगा कि उसके सहयोगी दलों की सरकारों वाले राज्यों में उसका संदेश कितना स्पष्ट और एक समान है।
तथ्यों और प्रमाणों की अनिवार्यता
वोटर लिस्ट के इस विशेष पुनरीक्षण पर पूरी पारदर्शिता बरतने और देश के मतदाताओं के बुनियादी अधिकारों की रक्षा करने की मांग उठाना एक बेहद जरूरी राजनीतिक बहस है। लेकिन किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया का विरोध करने के लिए केवल जुबानी आरोपों के बजाय ठोस उदाहरण और पुख्ता प्रमाण भी जनता के सामने रखने चाहिए। यदि कांग्रेस पार्टी यह दावा करती है कि पश्चिम बंगाल और बिहार में एसआईआर का असर बहुत ज्यादा रहा है, तो उसे उन राज्यों की विशिष्ट समस्याओं को भी पूरी स्पष्टता के साथ देश के सामने रखना चाहिए। तमिलनाडु में सीमित अनुभव का जिक्र करना भी उसी पूरी तस्वीर का एक हिस्सा है। असली दिक्कत तब पैदा होती है जब राष्ट्रीय स्तर पर किसी मुद्दे को अत्यंत गंभीर और खतरनाक बता दिया जाए, लेकिन अलग-अलग राज्यों में उसके राजनीतिक मायने पूरी तरह बदलते हुए नजर आएं।
स्पष्टता की कमी से कैसे निपटेगी पार्टी
कांग्रेस पार्टी के सामने आज के समय में असली चुनौती एसआईआर का विरोध करना भर नहीं है, बल्कि अपनी बात और अपनी नीति में पूरी स्पष्टता बनाए रखना है। यदि पार्टी यह मानती है कि देश के हर राज्य का अनुभव एक दूसरे से अलग है, तो उसे अपनी पूरी राजनीतिक रणनीति भी ठोस तथ्यों के आधार पर जनता को समझानी चाहिए। दिल्ली में ज्ञानेश कुमार पर तीखे हमले करने और दक्षिण भारत में नरम रुख अपनाने के बीच के इस बड़े अंतर को तभी दूर किया जा सकता है जब कांग्रेस पार्टी अपनी सभी मांगों का आधार बिल्कुल साफ करे। यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो विरोधी राजनीतिक दलों को हमेशा यह मौका मिलता रहेगा कि वे यह आरोप लगाएं कि कांग्रेस पार्टी किसी भी मुद्दे को सैद्धांतिक प्रतिबद्धता से ज्यादा अपनी राजनीतिक सुविधा और नफा-नुकसान के हिसाब से उठाती है।





















