कांग्रेस पार्टी के भीतर नेपाल संकट को लेकर अलग-अलग सुर सामने आ रहे हैं। एक तरफ जहां पार्टी के बड़े नेता और सांसद अपनी ही पार्टी की लाइन से हटकर सरकार की पीठ थपथपा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने सरकार के कामकाज पर सवाल खड़े करते हुए तेज कार्रवाई की मांग की है। इसी कड़ी में तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने एक बार फिर ऐसा कदम उठाया है, जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। नेपाल में आई भयानक आपदा के बाद राहत और बचाव के मोर्चे पर उनकी ओर से की गई तारीफ ने पार्टी के आधिकारिक रुख के बिल्कुल उलट तस्वीर पेश की है।
विदेश मंत्री को लिखा पत्र और सरकार के प्रयासों की सराहना
शशि थरूर ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर को पत्र लिखकर पड़ोसी देश नेपाल में चलाए जा रहे भारतीय अभियानों की सराहना की है। उन्होंने अपने पत्र में कहा कि इस विनाशकारी आपदा के बाद भारत की प्रतिक्रिया बेहद तेज और व्यापक रही है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा काठमांडू के साथ शुरुआती स्तर पर ही संपर्क साधने और तुरंत राहत सामग्री, मेडिकल टीमों के साथ-साथ सुरंग में फंसे लोगों को निकालने वाले विशेषज्ञों को भेजने के कदमों का विशेष रूप से उल्लेख किया। इसके अलावा उन्होंने त्रिशूली-1 जलविद्युत परियोजना स्थल पर फंसे भारतीय कामगारों को सुरक्षित निकालने के अभियान को एक बड़ी सफलता करार दिया। थरूर ने बताया कि कई प्रभावित परिवारों ने उनकी ओर से उठाए गए कदमों पर आभार जताया है और इस बात को सरकार तक पहुंचाने का अनुरोध किया है।
तारीफ के साथ दिए गए कुछ जरूरी सुझाव
अपनी प्रशंसा के साथ-साथ शशि थरूर ने यह भी स्पष्ट किया कि जमीन पर स्थिति अभी भी बेहद गंभीर बनी हुई है। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में लोग अब भी संकट में फंसे हैं और हर बीतते घंटे के साथ बचाव कार्यों के लिए समय कम होता जा रहा है। स्थिति से निपटने के लिए उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी साझा किए हैं। उन्होंने मांग की है कि नेपाल में राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी एनडीआरएफ की पूरी टीम को जरूरी उपकरणों के साथ तुरंत भेजा जाना चाहिए। इसके अलावा, पासांग ल्हामू हाईवे को जल्द से जल्द यातायात के लिए खोलने के वास्ते सेना की इंजीनियरिंग टास्क फोर्स को भारी मशीनरी के साथ तैनात करने की सलाह दी गई है। दूरदराज के इलाकों तक पहुंचने के लिए भारतीय वायुसेना के भारी हेलीकॉप्टरों के इस्तेमाल और मलबे के नीचे दबे लोगों का पता लगाने के लिए ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग रडार, थर्मल इमेजिंग, खोजी कुत्तों की टीमों और सैटेलाइट इमेजरी के उपयोग को बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
पीड़ित परिवारों का दर्द और आभार
शशि थरूर ने मानवीय पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वह लगातार उन परिवारों के संपर्क में हैं जिनके अपने लोग अब तक लापता हैं। उनके अनुसार, इन शोकाकुल और चिंतित परिवारों की ओर से भारत के राहत प्रयासों को लेकर कोई शिकायत सामने नहीं आई है। परिवार के सदस्यों का कहना है कि वे अपने परिजनों की सलामती को लेकर गहरी चिंता में हैं, लेकिन उससे पहले वे भारत की ओर से अब तक उठाए गए कदमों के लिए धन्यवाद देना चाहते हैं। इसी भावना को ध्यान में रखते हुए उन्होंने सरकार से आग्रह किया है कि आपदा क्षेत्र से नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकालने के काम में किसी प्रकार की कसर बाकी न छोड़ी जाए।
मल्लिकार्जुन खरगे की प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से मांग
दूसरी तरफ, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस संकट पर बिल्कुल अलग रुख अपनाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा था। उन्होंने नेपाल में बाढ़ से मची भारी तबाही पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए वहां फंसे भारतीयों की सुरक्षित और त्वरित वापसी के लिए निकासी अभियान को और तेज करने की मांग उठाई थी। खरगे ने कहा था कि हजारों लोगों को इस वक्त भोजन, दवाइयों, सुरक्षित आश्रय और अन्य जरूरी चीजों की तत्काल आवश्यकता है। उन्होंने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया था कि नेपाल सरकार के साथ समन्वय स्थापित कर प्रभावित नागरिकों के लिए पर्याप्त मानवीय सहायता सुनिश्चित की जाए। इसके साथ ही उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह को भी अलग से पत्र लिखकर एनडीआरएफ की टीमों की तैनाती पर विचार करने को कहा था ताकि विशेषज्ञता का पूरा लाभ मिल सके।
संपर्क से बाहर नागरिकों का मुद्दा और जमीनी हालात
मल्लिकार्जुन खरगे ने विदेश मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया था कि नेपाल में करीब 320 ऐसे भारतीय नागरिक हैं जिनसे अभी तक कोई संपर्क नहीं हो पाया है। उन्होंने प्रशासन से अपील की थी कि इस कठिन घड़ी में भारत को अपने पड़ोसी के साथ पूरी मजबूती से खड़े होना चाहिए क्योंकि दोनों देशों के बीच प्राचीन सामाजिक और मानवीय संबंध रहे हैं। इस बीच, भारत की तरफ से लगातार राहत सामग्री भेजी जा रही है और 27 अगस्त तक कुल 47.5 टन मानवीय सहायता नेपाल पहुंचाई जा चुकी है। हालांकि, भौगोलिक कठिनाइयों और क्षतिग्रस्त सड़कों के कारण बचाव टीमों को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और कई दूरदराज के इलाके अभी भी पहुंच से बाहर हैं।




















