संसद के भीतर परीक्षा सुधार संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की संरचना और जवाबदेही को लेकर तीखे सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने इस दौरान केंद्र सरकार से तीखे सवाल पूछते हुए कहा कि केवल चेहरे बदलने से व्यवस्था में सुधार नहीं आ सकता है। उन्होंने सदन में यह मुख्य मुद्दा उठाया कि यदि एजेंसी के महानिदेशक पद पर बदलाव किया जा सकता है, तो फिर इसके अध्यक्ष को उनके पद से क्यों नहीं हटाया गया।
संसदीय चर्चा के दौरान अपनी बात रखते हुए गौरव गोगोई ने स्पष्ट किया कि सरकार को केवल सतही फेरबदल करने के बजाय परीक्षा प्रणाली की मूल समस्याओं पर गहराई से विचार करना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि असली सुधार तब तक संभव नहीं है जब तक कि पेपर लीक की घटनाओं को रोकने, परीक्षा माफिया के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने, प्रिंटिंग और सुरक्षा प्रणालियों को अपग्रेड करने तथा पूरे परीक्षा प्रबंधन को पारदर्शी बनाने के लिए गंभीर कदम नहीं उठाए जाते हैं।
एजेंसी के भीतर प्रशासनिक ढांचे की बात करें तो वर्ष 2024 में नीट परीक्षा के दौरान उपजे विवाद के बाद तत्कालीन महानिदेशक सुबोध कुमार सिंह को उनके पद से हटा दिया गया था। इसके पश्चात कुछ समय के लिए प्रदीप सिंह खरौला को इस पद का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था। आगे चलकर अप्रैल 2026 में आईएएस अधिकारी अभिषेक सिंह को नेशनल टेस्टिंग एजेंसी का नया महानिदेशक नियुक्त किया गया, जो वर्तमान में भी इसी पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यदि इस पद के पुराने इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 2018 में विनीत जोशी को इस एजेंसी का पहला महानिदेशक बनाया गया था, जिन्होंने वर्ष 2021 तक इस जिम्मेदारी को संभाला था।
एजेंसी के अंतर्गत महानिदेशक का पद सबसे प्रमुख कार्यकारी पद माना जाता है। इस पद पर आसीन अधिकारी परीक्षाओं के सुरक्षित और समयबद्ध संचालन, कर्मचारियों की दैनिक गतिविधियों की निगरानी, परीक्षा केंद्रों के प्रबंधन, सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम, तकनीकी निर्णयों और संपूर्ण प्रशासनिक कामकाज का सीधे तौर पर नेतृत्व करता है। हालिया प्रशासनिक बदलावों के बीच सरकार की ओर से यह भी संकेत दिए गए हैं कि एजेंसी में बड़े पैमाने पर सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है ताकि भविष्य में ऐसी गड़बड़ियों को रोका जा सके।
दूसरी तरफ, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की गवर्निंग बॉडी के चेयरमैन प्रो. (सेवानिवृत्त) प्रदीप कुमार जोशी हैं, जो संघ लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं। संस्था की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार गवर्निंग बॉडी की अध्यक्षता चेयरपर्सन द्वारा की जाती है, जबकि महानिदेशक इसी गवर्निंग बॉडी के सदस्य सचिव के रूप में कार्य करते हैं। शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले उच्च शिक्षा विभाग ने अगस्त 2023 में प्रो. जोशी को इस पद की जिम्मेदारी सौंपी थी। वर्ष 2024 में नीट पेपर लीक जैसी गंभीर घटनाओं के बाद भी जब महानिदेशक को बदला गया लेकिन चेयरमैन को उनके पद पर बरकरार रखा गया, तो इसी को आधार बनाकर अब विपक्षी सांसदों ने संसद के पटल पर सवाल खड़े किए हैं।
एजेंसी के भीतर महानिदेशक और चेयरमैन की भूमिकाओं में स्पष्ट अंतर होता है। महानिदेशक नेशनल टेस्टिंग एजेंसी का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है, जिसकी प्राथमिक जवाबदेही परीक्षाओं को पूरी तरह सुरक्षित और नियत समय पर संपन्न कराने की होती है। परीक्षा की पूरी रूपरेखा तैयार करना, प्रशासनिक अमले का प्रबंधन करना, विभिन्न तकनीकी एजेंसियों के साथ बेहतर तालमेल बिठाना और परीक्षा केंद्रों की सुरक्षा का जिम्मा महानिदेशक के पास होता है। आसान शब्दों में समझें तो एजेंसी का दैनिक संचालन पूरी तरह इसी पद के इर्द-गिर्द घूमता है।
इसके विपरीत, चेयरमैन गवर्निंग बॉडी के प्रमुख होते हैं। उनका मुख्य सरोकार संस्था की दीर्घकालिक नीतियों, बड़े संस्थागत फैसलों और प्रशासनिक स्तर की निगरानी से जुड़ा होता है। वे रोजमर्रा की परीक्षा गतिविधियों या केंद्रों के संचालन में सीधे तौर पर दखल नहीं देते हैं, बल्कि नीतिगत दिशा तय करने और गवर्निंग बॉडी की बैठकों की अध्यक्षता करने का कार्य संभालते हैं। यानी चेयरमैन नीति निर्माण का काम देखते हैं जबकि महानिदेशक उन तय नीतियों को जमीन पर लागू कराते हैं।
प्राधिकार और शक्तियों की तुलना करें तो दोनों की जिम्मेदारियों का दायरा पूरी तरह अलग है। चेयरमैन संस्थागत और नीतिगत मामलों में सर्वोच्च पद पर आसीन होते हैं, जबकि महानिदेशक एजेंसी के क्रियान्वयन और संचालन के प्रमुख अधिकारी होते हैं। परीक्षाओं के आयोजन से जुड़े तमाम फैसले और प्रशासनिक कामकाज सीधे तौर पर महानिदेशक के नियंत्रण में आते हैं, जबकि गवर्निंग बॉडी के जरिए पूरी व्यवस्था की निगरानी का मुख्य अधिकार चेयरमैन के पास सुरक्षित रहता है।
विपक्ष के भीतर इस बात को लेकर लगातार बहस छिड़ी हुई है कि आखिर सर्वोच्च स्तर पर जवाबदेही क्यों नहीं तय की जा रही है। कांग्रेस पार्टी का मुख्य तर्क यह है कि यदि परीक्षा प्रणाली में लगातार गंभीर खामियां सामने आ रही हैं, तो केवल कार्यकारी अधिकारियों को बदलने से समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सकता है। विपक्ष का साफ मानना है कि जवाबदेही का दायरा केवल नीचे तक सीमित न रहकर गवर्निंग स्तर तक तय किया जाना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी त्रुटियों की पुनरावृत्ति न हो सके।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के अपने पद से हटने के बाद से सरकार ने इस स्वायत्त निकाय में कई बड़े प्रशासनिक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एजेंसी के भीतर अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए 47 अधिकारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं और कुछ मामलों में कानूनी कदम उठाने की भी पूरी तैयारी की जा रही है। सरकार का यह दावा है कि परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने के लिए व्यापक स्तर पर सुधार किए जा रहे हैं। हालांकि, इन तमाम कदमों के बीच अब NTA की संपूर्ण जवाबदेही देश का एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है, जहां विपक्ष लगातार यह सवाल पूछ रहा है कि क्या केवल महानिदेशक को बदलना काफी है या फिर गवर्निंग स्तर पर भी बुनियादी बदलाव करने की आवश्यकता है।



















