पंजाब की राजनीति में इस समय शिरोमणि अकाली दल यानी SAD की भूमिका को लेकर चर्चाएं जोरों पर हैं। लोकसभा में पार्टी के पास इस वक्त केवल एक सांसद होने के बावजूद, पार्टी प्रमुख सुखबीर सिंह बादल का एक अहम राजनीतिक मुद्दे पर बदला हुआ रुख अचानक से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से लेकर पंजाब तक के सियासी गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गया है। परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे गंभीर विषयों पर बादल पहले विपक्षी दलों के साथ खड़े दिखाई दे रहे थे, लेकिन अब उनका समर्थन सीधे तौर पर NDA के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम की सबसे खास बात यह है कि यह बदलाव प्रधानमंत्री नरेंद्र सिंह मोदी के साथ सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात के महज 24 घंटे के भीतर सामने आया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसे केवल एक मुद्दे पर नजरिया बदलने भर की घटना मानना जल्दबाजी होगी, क्योंकि इसके पीछे पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के रिश्तों में जमी बर्फ के पिघलने की गहरी संभावनाएं टटोली जा रही हैं।
संसद में संख्या बल और क्षेत्रीय दलों का महत्व
सुखबीर सिंह बादल का यह नया रुख ऐसे संवेदनशील समय में सामने आया है, जब संसद के भीतर परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे विधेयकों को लेकर नंबर गेम बेहद निर्णायक हो गया है। केंद्र सरकार यानी एनडीए को किसी भी संवैधानिक संशोधन को पारित कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए हमेशा सहयोगी दलों और क्षेत्रीय ताकतों की आवश्यकता पड़ सकती है। ऐसी स्थिति में शिरोमणि अकाली दल की लोकसभा में केवल एक सीट भले ही कुल संख्या में कोई बहुत बड़ा क्रांतिकारी बदलाव न लाती हो, लेकिन इस पार्टी का खुला समर्थन सरकार को एक मजबूत राजनीतिक संदेश देने का काम जरूर करता है। इस घटनाक्रम से विपक्षी दलों की एकजुटता को भी तगड़ा झटका लग सकता है। इसके अलावा, पंजाब के स्थानीय स्तर पर बीजेपी और अकादमिक रूप से पुराने सहयोगी रहे SAD के बीच फिर से गठबंधन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। इसका मतलब साफ है कि मामला केवल संसद में एक वोट का नहीं है, बल्कि आने वाले दिनों के चुनावी समीकरणों को नए सिरे से साधने का है।
परिसीमन और महिला आरक्षण पर रुख बदलने के मायने
सुखबीर सिंह बादल के इस समर्थन के वास्तविक निहितार्थों को गहराई से समझने के लिए परिसीमन और महिला आरक्षण के पूरे मुद्दे की पृष्ठभूमि पर गौर करना आवश्यक है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, शिरोमणि अकाली दल शुरुआती दौर में इन दोनों प्रस्तावों के विरोध में विपक्ष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा था और पंजाब के क्षेत्रीय हितों का हवाला देते हुए कड़ी आपत्ति जता रहा था। अब अचानक पार्टी के स्टैंड में आया यह बदलाव एनडीए खेमे के लिए इसलिए अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि सरकार को देश के बुनियादी संवैधानिक ढांचे से जुड़े बदलावों के लिए व्यापक राजनीतिक सहमति और समर्थन की जरूरत होती है। भले ही शिरोमणि अकाली दल के पास वर्तमान में लोकसभा सीटों के लिहाज से संख्या बल बहुत सीमित हो, लेकिन एक पारंपरिक क्षेत्रीय दल का सत्ता पक्ष के साथ आना सरकार के लिए रणनीतिक रूप से काफी उपयोगी साबित हो सकता है।
प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद गर्माया सियासी माहौल
यही एक मुख्य वजह है कि सुखबीर सिंह बादल के इस यू-टर्न को केवल संसद के सत्र या किसी एक साधारण मुद्दे तक सीमित करके नहीं देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात के तुरंत बाद दोनों दलों के बीच राजनीतिक तालमेल की बहाली की अटकलें तेज हो गई हैं। आपको याद दिला दें कि दोनों दलों का पुराना राजनीतिक रिश्ता दो दशक से भी अधिक लंबा रहा था। हालांकि, कृषि कानूनों के तीखे विवाद के बाद साल 2020 में भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल ने अपनी राहें जुदा कर ली थीं। इसके बाद के चुनावों में पंजाब की राजनीति में दोनों ही दलों की ताकत कमजोर होती चली गई और उनके चुनावी प्रदर्शन पर बुरा असर पड़ा। अब वर्तमान हालात दोनों ही पार्टियों के लिए आसान नहीं रह गए हैं, और शायद यही सियासी मजबूरी उन्हें एक बार फिर पुराने रिश्तों की ओर खींचती नजर आ रही है।
आम आदमी पार्टी को मात देने की साझा मजबूरी
मौजूदा समय में पंजाब की राजनीतिक जमीन पर आम आदमी पार्टी की मजबूत मौजूदगी बीजेपी और अकाली दल दोनों के लिए ही एक बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है। ऐसी स्थिति में अगर दोनों दल अलग-अलग रहकर चुनाव मैदान में उतरते हैं, तो उनके पारंपरिक वोटों का सीधा बंटवारा हो जाएगा, जिससे दोनों को भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। यही कारण है कि इस संभावित गठबंधन की चर्चाओं को केवल दिल्ली की केंद्रीय राजनीति के चश्मे से देखना पूरी तरह गलत होगा। पंजाब राज्य में दोनों दलों के पास अपने-अपने अलग और मजबूत सामाजिक व भौगोलिक आधार मौजूद हैं। शिरोमणि अकाली दल का पारंपरिक प्रभाव हमेशा से ग्रामीण इलाकों और सिख मतदाताओं के बीच गहरा रहा है, जबकि भारतीय जनता पार्टी का मुख्य जनाधार शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच मजबूत माना जाता है। इन दोनों का साथ आना दरअसल इसी बंटे हुए सामाजिक समीकरण को दोबारा मजबूती से जोड़ने की एक सुनियोजित कोशिश साबित हो सकता है।
बदले हालात में पुराने फॉर्मूले से अलग होगा नया समीकरण
यदि आने वाले दिनों में दोनों दल वाकई दोबारा हाथ मिलाते हैं, तो यह साल 1997 से लेकर 2020 तक चले पुराने गठबंधन की कोई हूबहू या वैसी ही वापसी नहीं होगी जैसी पहले हुआ करती थी। उस पुराने दौर में शिरोमणि अकाली दल पंजाब का एक बड़ा और प्रमुख साझेदार हुआ करता था, जबकि बीजेपी को तुलनात्मक रूप से कम सीटों पर ही चुनाव लड़ने का मौका मिलता था। लेकिन बीते कुछ वर्षों के दौरान दोनों पार्टियों की जमीनी हकीकत और राजनीतिक ताकत में बड़ा बदलाव आया है। शिरोमणि अकाली दल के भीतर भी टूट फूट और आंतरिक उठापटक देखी गई है, जबकि दूसरी तरफ बीजेपी ने पंजाब के अंदर अपना वोट आधार और जनाधार बढ़ाने के लिए खासी मेहनत की है। इसलिए अगर भविष्य में कोई नया गठबंधन आकार लेता है, तो सीटों के बंटवारे और नेतृत्व को तय करने की शर्तें पुराने फॉर्मूले से काफी अलग हो सकती हैं।
महज एक सांसद वाले दल की एनडीए को क्यों है दरकार
यदि संसद के अंदर केवल सीटों की संख्या के हिसाब से आंकलन किया जाए, तो शिरोमणि अकाली दल के इकलौते सांसद का समर्थन कोई बहुत बड़ा जादुई फेरबदल पैदा नहीं करता है। लेकिन जैसा कि सर्वविदित है, राजनीति केवल अंकों का खेल मात्र नहीं होती है। सुखबीर सिंह बादल का यह बदला हुआ रुख विपक्षी दलों के इंडी गठबंधन के लिए भी एक कड़ा संदेश है कि क्षेत्रीय दल अपनी राजनीतिक सुविधानुसार और चुनावी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कभी भी अपनी रणनीति बदल सकते हैं। एनडीए के लिए यह समर्थन इसलिए भी विशेष मायने रखता है क्योंकि देश में संवैधानिक बदलावों से जुड़े गंभीर मुद्दों पर हर एक अतिरिक्त समर्थन गठबंधन की समग्र राजनीतिक ताकत को और ज्यादा पुख्ता करता है। इसके साथ ही, पंजाब की सियासत में एक नए और मजबूत संभावित गठबंधन के लिए जमीन तैयार करने में भी यह ताजा घटनाक्रम बेहद मददगार साबित हो सकता है।
चुनावी रण से पहले क्या फिर से एक होंगे दोनों दल
फिलहाल की स्थिति को देखें तो भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल की तरफ से किसी भी प्रकार के औपचारिक गठबंधन का आधिकारिक ऐलान नहीं किया गया है। इसलिए इस संभावित मेल-मिलाप को अभी से कोई पक्की और अंतिम वापसी करार देना जल्दबाजी होगी। फिर भी, परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे अहम मामलों पर सुखबीर सिंह बादल का रुख बदलना, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी उच्चस्तरीय मुलाकात और आगामी पंजाब चुनावों को लेकर गरमाती चर्चाएं आपस में गहराई से जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं। यदि ये दोनों पुराने दल भविष्य में एक बार फिर साथ आते हैं, तो उनका सबसे प्राथमिक लक्ष्य आम आदमी पार्टी के खिलाफ एक बेहद मजबूत और ठोस मुकाबला खड़ा करना होगा। इसके साथ ही, दोनों ही पार्टियों के सामने अपने-अपने खिसके हुए पुराने मतदाताओं को दोबारा एक साझा मंच पर लाने की बड़ी चुनौती भी रहेगी। ऐसे में, लोकसभा में भले ही एक सांसद वाला अकाली दल संसद के गणित में छोटा खिलाड़ी नजर आए, लेकिन पंजाब की आगामी चुनावी बिसात पर उसकी भूमिका आने वाले समय में बेहद निर्णायक साबित हो सकती है।


















