लाल किले से दिए गए एक भाषण के एक शब्द ने पूरी विपक्षी राजनीति में हलचल मचा दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में देश को 'दिमागी नक्सल' से सतर्क रहने को कहा था, और इसके बाद दो दिन से कांग्रेस से लेकर आम आदमी पार्टी तक के बड़े नेता खुद को यही तमगा देने में जुट गए हैं.
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में किसी का नाम नहीं लिया था. उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि हथियार उठाने वाले नक्सलियों को तो देश ने काफी हद तक खत्म कर दिया, लेकिन अब उन लोगों पर भी नजर रखनी होगी जो दिमाग से देश में अराजकता फैलाने के मौके तलाशते रहते हैं. लेकिन विपक्ष के खेमे में यह मान लिया गया कि यह टिप्पणी सीधे उन्हीं पर है, और यहीं से एक अजीब होड़ शुरू हो गई जिसमें विपक्षी नेता खुद को गर्व से 'दिमागी नक्सल' घोषित करने लगे.
महबूबा से लेकर चिदंबरम तक की होड़
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने सोशल मीडिया पर लिखा कि वे अनुच्छेद 370 का समर्थन करती हैं और खुद को दिमागी नक्सल मानती हैं. इसके तुरंत बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम भी इस लिस्ट में शामिल हो गए. उन्होंने कहा कि उन्हें दिमागी नक्सल कहलाने पर गर्व महसूस होता है.
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल भी इस दौड़ में पीछे नहीं रहे. उन्होंने खुद को दिमागी नक्सल बताते हुए यह भी जोड़ा कि उन्हें इस पर गर्व है. दिलचस्प बात यह है कि यही केजरीवाल पहले 'अर्बन नक्सल' कहे जाने पर भड़क उठते थे और पलटकर पूछते थे कि क्या वे नक्सली दिखते हैं. लेकिन अब वही नेता इस लेबल को खुद अपनाते नजर आए.
केजरीवाल का आरोप, पीएम के भाषण का हिस्सा शेयर किया
केजरीवाल ने प्रधानमंत्री के भाषण के एक छोटे हिस्से को जोड़कर एक वीडियो भी शेयर किया. उनका दावा था कि मोदी सरकार की नजर में जो भी सवाल पूछता है या मौजूदा व्यवस्था में बदलाव चाहता है, वही दिमागी नक्सली है. उन्होंने अच्छे सरकारी स्कूल, अस्पताल, बिजली-पानी और भ्रष्टाचार मुक्त भारत की मांग करने वालों को भी इसी श्रेणी में गिना. केजरीवाल ने यहां तक कह डाला, 'आज अगर भगत सिंह और बाबा साहेब आंबेडकर जिंदा होते, तो प्रधानमंत्री जी उन्हें भी दिमागी नक्सली बोलते.'
हिमंत बिश्व सरमा का चिदंबरम पर सीधा हमला
चिदंबरम के 'गर्व' वाले बयान पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिश्व सरमा ने तीखी प्रतिक्रिया दी. उनका कहना था कि चिदंबरम को दिमागी नक्सल नहीं बल्कि पूरी तरह से नक्सल मानना चाहिए. हिमंत ने यह भी मांग की कि जब चिदंबरम खुद स्वीकार कर रहे हैं तो इस बात की जांच होनी चाहिए कि गृह मंत्री रहते हुए उन्होंने नक्सल विरोधी कार्रवाई में जानबूझकर ढिलाई तो नहीं बरती थी.
बीजेपी इस पूरे विवाद को चिदंबरम के गृह मंत्री कार्यकाल से जोड़कर देख रही है. पार्टी का आरोप है कि उस दौर में देश का बड़ा हिस्सा नक्सल प्रभावित था, और चिदंबरम खुद नक्सलियों से यह कहते नजर आते थे कि सरकार बातचीत करेगी लेकिन हथियार डालने के लिए नहीं कहेगी, क्योंकि नक्सली वैसे भी हथियार नहीं छोड़ेंगे. दिलचस्प यह भी है कि खुद कांग्रेस की छत्तीसगढ़ इकाई की पूरी लीडरशिप कभी नक्सली हमले में खत्म कर दी गई थी, जिसमें कई बड़े नेता मारे गए थे. बावजूद इसके पार्टी के मौजूदा नेता आज खुद को नक्सल कहलाने में गर्व महसूस कर रहे हैं.
कॉकरोच जनता पार्टी भी होड़ में शामिल
यह होड़ सिर्फ बड़े राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रही. कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास ने भी खुद को दिमागी नक्सल बताते हुए इस बहस में एंट्री ली, जिससे यह साफ हो गया कि विपक्षी खेमे के छोटे-बड़े लगभग सभी नेता इस टैग को अपनाने की कोशिश में जुटे हैं.
उसी दिन बीजेपी की नई टीम का ऐलान
इसी बीच बीजेपी ने अपने संगठन की नई टीम का ऐलान कर दिया, जिसमें कुछ ऐसे नाम शामिल हैं जिन्होंने विपक्षी खेमे में हलचल बढ़ा दी है. विपक्ष हर साल 15 अगस्त पर यह माहौल बनाने की कोशिश करता है कि यह प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी का आखिरी स्वतंत्रता दिवस भाषण है, लेकिन नई संगठनात्मक टीम के गठन से यह संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी आगे के वर्षों के लिए भी अपनी रणनीति तैयार कर रही है. यह भी चर्चा है कि आने वाले समय में प्रधानमंत्री मोदी की मंत्रिपरिषद में भी बदलाव देखने को मिल सकता है.





















