प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से दिए गए भाषण के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ गई है। संबोधन के दौरान इस्तेमाल किए गए दिमागी नक्सल शब्द को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस आमने-सामने आ गए हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम द्वारा खुद को इस शब्द से जोड़े जाने के बाद बीजेपी नेताओं ने उन पर तीखे हमले किए हैं। इस बीच केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया है कि प्रधानमंत्री के इस बयान का वास्तविक संदर्भ क्या था।
लाल किले के भाषण से उपजा राजनीतिक विवाद
80वें स्वतंत्रता दिवस पर देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में नक्सलवाद के खिलाफ जारी अभियान का ब्योरा दिया था। उन्होंने कहा था कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई के कारण जंगलों में हथियार उठाकर हिंसा करने वाले नक्सलियों पर काफी हद तक लगाम लगाई जा चुकी है। इसके साथ ही उन्होंने देश के सामने मौजूद एक नई चुनौती की ओर ध्यान आकर्षित किया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भले ही हथियारबंद नक्सली सांगठनिक रूप से कमजोर हो चुके हैं, लेकिन नक्सली विचारधारा को बढ़ावा देने वाले लोग अब भी देश में सक्रिय हैं। ऐसे लोग मौकों की तलाश में रहते हैं और समाज को भ्रामक दिशा में ले जाने का प्रयास करते हैं। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में ऐसे तत्वों की पहचान करके उन्हें समाज से अलग-थलग किया जाना बेहद जरूरी है। यही टिप्पणी अब राजनीतिक खींचतान का कारण बन गई है।
चिदंबरम की टिप्पणी और बीजेपी की तीखी प्रतिक्रिया
प्रधानमंत्री के संबोधन के ठीक अगले दिन कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें दिमागी नक्सल कहा जाता है तो उन्हें इस पर गर्व महसूस होता है। चिदंबरम के इस वक्तव्य के तुरंत बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर हमला बोला। बीजेपी के नेताओं ने सवाल उठाया कि जब प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद और देशविरोधी प्रवृत्तियों के खिलाफ चेतावनी दी थी, तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने इसे अपने ऊपर क्यों लिया।
बीजेपी का तर्क है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में किसी विशेष राजनीतिक दल या किसी व्यक्तिगत नेता का नाम नहीं लिया था। ऐसे में चिदंबरम द्वारा खुद को इस शब्द से जोड़ना उनकी अपनी व्यक्तिगत प्रतिक्रिया और राजनीतिक रुख को दर्शाता है।
किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया पर दी विस्तृत सफाई
विवाद बढ़ने पर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए स्थिति साफ की। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री ने विपक्षी नेताओं को दिमागी नक्सल नहीं कहा था। रिजिजू ने लिखा कि इस शब्द का प्रयोग उन विशिष्ट प्रवृत्तियों और विचारधाराओं के संदर्भ में किया गया था जो देश के संवैधानिक ढांचे के खिलाफ काम करती हैं।
किरेन रिजिजू के अनुसार, दिमागी नक्सल की श्रेणी में वे लोग आते हैं जो माओवादी गतिविधियों का समर्थन करते हैं और भारतीय संविधान को स्वीकार नहीं करते। इसके अलावा जो लोग अलगाववादी तत्वों के साथ खड़े होते हैं या अनुच्छेद 370 की वापसी की वकालत करते हैं, उन पर भी यह टिप्पणी लागू होती है। मंत्री ने पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्से से जोड़ने वाले पश्चिम बंगाल के रणनीतिक रूप से संवेदनशील चिकन नेक गलियारे का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जो लोग इस महत्वपूर्ण मार्ग को काटकर पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने की मंशा रखते हैं, वे भी इसी विचारधारा का हिस्सा हैं।
बीजेपी प्रवक्ताओं के गंभीर आरोप और वैचारिक लड़ाई
इस पूरे मामले पर बीजेपी के अन्य नेताओं ने भी कांग्रेस को आड़े हाथों लिया। बीजेपी प्रवक्ता आरपी सिंह ने आरोप लगाया कि पी चिदंबरम का बयान दिमागी नक्सल और अर्बन नक्सल की विचारधारा वाले तत्वों को राजनीतिक संरक्षण देने का एक प्रयास है। उन्होंने कहा कि देशविरोधी सोच का समर्थन करना किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं हो सकता।
वहीं बीजेपी नेता सैयद शाहनवाज हुसैन ने कहा कि जंगलों में छिपे हथियारबंद नक्सलियों की चुनौती से निपटना सुरक्षा बलों के लिए संभव है। हालांकि, जब कोई प्रभावशाली व्यक्ति सार्वजनिक रूप से खुद को दिमागी नक्सल बताता है और देश के खिलाफ नकारात्मक धारणाएं फैलाने का काम करता है, तो यह स्थिति देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए अधिक चिंताजनक बन जाती है।
बहस के केंद्र में विचारधारा और राष्ट्रीय सुरक्षा
दूसरी तरफ, कांग्रेस और विपक्ष की ओर से दिमागी नक्सल शब्द की परिभाषा और सरकार की मंशा पर सवाल उठाए जा रहे हैं। विपक्षी खेमे का मानना है कि इस प्रकार के शब्दों का राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
इसके जवाब में बीजेपी का कहना है कि यह बहस किसी एक शब्द तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन विचारों के खिलाफ एक महत्वपूर्ण लड़ाई है जो हिंसा, अलगाववाद और संविधान-विरोधी गतिविधियों का समर्थन करते हैं। स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक मंच से निकला यह शब्द अब भारतीय राजनीति में एक नए वैचारिक संघर्ष का केंद्र बन चुका है।























