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हैदराबाद विलय इतिहास पर बीएल संतोष के दावे को प्रियंक खरगे ने नकारा, कहा नेहरू, पटेल और सेना ने की थी रक्षाराजनीति
15 अग॰ 2026, 8:20 pm (72 दिन पहले)· 1

हैदराबाद विलय इतिहास पर बीएल संतोष के दावे को प्रियंक खरगे ने नकारा, कहा नेहरू, पटेल और सेना ने की थी रक्षा

कर्नाटक में हैदराबाद रियासत के भारत में विलय को लेकर भाजपा नेता बीएल संतोष और गृह मंत्री प्रियंक खरगे के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। संतोष के आरएसएस सुरक्षा दावे के जवाब में प्रियंक ने सरदार पटेल, जवाहरलाल नेहरू और भारतीय सेना के योगदान को रेखांकित किया।

कर्नाटक के राजनीतिक गलियारों में हैदराबाद रियासत के भारत संघ में विलय के ऐतिहासिक घटनाक्रम को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। भारतीय जनता पार्टी के संगठन महामंत्री बीएल संतोष द्वारा दिए गए एक बयान के बाद राज्य के गृह मंत्री प्रियंक खरगे ने कड़ा ऐतराज जताया है। बीएल संतोष ने दावा किया था कि विभाजन और विलय के उस दौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के परिवार को रजाकारों के अत्याचारों से बचाया था। इस दावे का पूरी तरह से खंडन करते हुए प्रियंक खरगे ने स्पष्ट किया कि उनके परिवार तथा हैदराबाद क्षेत्र की जनता की हिफाजत आरएसएस ने नहीं, बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और भारतीय सशस्त्र बलों ने की थी। उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए सवाल दागा कि अगर सुरक्षा का जिम्मा आरएसएस के हाथों में था, तो हैदराबाद को भारत में मिलाने के लिए भारतीय सेना को 'ऑपरेशन पोलो' चलाने की आवश्यकता क्यों पड़ी थी।

हैदराबाद रियासत के इतिहास पर छिड़ा नया सियासी घमासान

यह पूरा राजनीतिक घटनाक्रम 'अखंड भारत संकल्प दिवस' के अवसर पर आयोजित एक सार्वजनिक मंच से शुरू हुआ। हिंदू जागरण वेदिके द्वारा आयोजित इस विशेष कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भाजपा नेता बीएल संतोष ने 1940 के दशक के उत्तरार्ध में हैदराबाद रियासत के भारत में विलय के दौरान पैदा हुई परिस्थितियों का जिक्र किया था। अपने भाषण में उन्होंने तर्क दिया कि जब रजाकारों के सशस्त्र दस्ते स्थानीय नागरिकों पर अत्याचार कर रहे थे, उस वक्त संघ के स्वयंसेवकों ने अपनी जान जोखिम में डालकर हिंदू समाज और पीड़ित परिवारों की सुरक्षा की थी। अपने इस वक्तव्य को मजबूती देने के लिए संतोष ने विशेष रूप से मल्लिकार्जुन खरगे के बचपन की घटना का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस दौर में हिंसा के कारण खरगे परिवार को अपना पैतृक गांव छोड़कर गुलबर्गा, जिसे वर्तमान में कलबुर्गी के नाम से जाना जाता है, की ओर पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। बीएल संतोष के अनुसार, मल्लिकार्जुन खरगे के पिता को केवल अपने पहने हुए कपड़ों में वहां से भागना पड़ा था और उस कठिन समय में संघ कार्यकर्ता ही आम जनता की ढाल बने हुए थे।

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प्रियंक खरगे का तीखा पलटवार और भारतीय सेना का श्रेय

बीएल संतोष द्वारा प्रस्तुत किए गए ऐतिहासिक घटनाक्रम के विवरण पर कलबुर्गी में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खरगे ने बेहद सख्त रुख अपनाया। उन्होंने भाजपा नेता के आरोपों और दावों को खारिज करते हुए कहा कि इतिहास को गलत तरीके से पेश करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रियंक खरगे ने सीधे शब्दों में कहा कि संकट की उस घड़ी में आरएसएस का कोई भी कार्यकर्ता उनके परिवार अथवा क्षेत्रीय नागरिकों की रक्षा के लिए मैदान में मौजूद नहीं था। उन्होंने कहा कि उनके परिवार को सांप्रदायिक हिंसा का भयानक दंश झेलना पड़ा था और परिस्थितियों के दबाव में उन्हें अपना घर-बार छोड़ना पड़ा था। प्रियंक ने इस बात पर जोर दिया कि उस क्षेत्र में शांति बहाली और नागरिकों की जानमाल की सुरक्षा का संपूर्ण श्रेय तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और भारतीय सेना की आधिकारिक कार्रवाई को जाता है। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना की समय पर हुई मौजूदगी से ही वहां के लोगों का जीवन सुरक्षित हो सका था।

'ऑपरेशन पोलो' और सितंबर 1948 का सैन्य अभियान

आरएसएस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए प्रियंक खरगे ने हैदराबाद रियासत के विलय हेतु चलाए गए प्रसिद्ध सैन्य अभियान 'ऑपरेशन पोलो' की याद दिलाई। उन्होंने बीएल संतोष से सीधा प्रश्न किया कि क्या 'ऑपरेशन पोलो' जैसे विशाल और निर्णायक सैन्य अभियान का नेतृत्व संघ ने किया था। ऐतिहासिक संदर्भ साझा करते हुए उन्होंने बताया कि सितंबर 1948 में भारतीय सेना ने हैदराबाद रियासत के खिलाफ आधिकारिक रूप से 'ऑपरेशन पोलो' शुरू किया था, जिसके बाद ही निजाम के शासन का अंत हुआ और हैदराबाद भारत का अभिन्न अंग बन सका। प्रियंक खरगे ने आरोप लगाया कि संकट के उस दौर में आम नागरिकों को संरक्षण प्रदान करने के बजाय संघ की विचारधारा ने कई स्थानों पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और तनाव को बढ़ाने का काम किया था। उन्होंने पूछा कि जब उनके इलाके में सांप्रदायिक हिंसा भड़क रही थी, तब संघ के नेता और कार्यकर्ता आम लोगों की सहायता के लिए कहां छिपे हुए थे।

गांधी हत्या, गोडसे और सावरकर विवाद पर जुबानी जंग

ऐतिहासिक बहसों का दायरा बढ़ाते हुए प्रियंक खरगे ने महात्मा गांधी की हत्या और उससे जुड़ी विचारधाराओं पर भी हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की सोच विनायक दामोदर सावरकर के विचारों और संघ के सिद्धांतों से प्रभावित थी। प्रियंक ने कहा कि गांधी जी की हत्या के बाद देश के विभिन्न हिस्सों, विशेष रूप से कोलकाता और दिल्ली में गंभीर सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न हुआ था। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जो संगठन आज खुद को इतिहास में रक्षक के रूप में पेश कर रहा है, उसकी वास्तविक भूमिका इसके बिल्कुल उलट रही है। इसके साथ ही, बीएल संतोष द्वारा सावरकर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के संदर्भों पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रियंक खरगे ने एक और गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस देश की आजादी के लिए आजाद हिंद फौज का गठन कर रहे थे और युवाओं को उसमें शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहे थे, उस समय सावरकर ने भारतीय युवाओं से आजाद हिंद फौज के बजाय ब्रिटिश सेना में भर्ती होने की अपील की थी। प्रियंक ने स्पष्ट किया कि वर्तमान भारत का जो अखंड स्वरूप हम देखते हैं, वह सरदार पटेल द्वारा लगभग 560 रियासतों और राज्यों का भारत संघ में विलय कराने के ऐतिहासिक प्रयासों का परिणाम है, न कि आरएसएस की किसी गतिविधि का।

आरएसएस के पंजीकरण और स्वतंत्रता संग्राम की व्याख्या पर तर्क

दूसरी ओर, बीएल संतोष ने संघ के वैधानिक स्वरूप और पंजीकरण को लेकर प्रियंक खरगे द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब दिया। संतोष ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ न तो अपनी स्थापना के समय एक पंजीकृत संगठन था और न ही आज इसका कोई औपचारिक पंजीकरण है। उन्होंने कहा कि किसी भी सामाजिक या सांस्कृतिक संगठन का अस्तित्व किसी सरकारी कागज या पंजीकरण नंबर से तय नहीं होता, बल्कि यह देश के करोड़ों लोगों के अटूट विश्वास और समर्पण के आधार पर संचालित होता है। विभाजन के समय संघ की भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि बिना किसी औपचारिक ढांचे के भी स्वयंसेवक सदैव समाज की सेवा और रक्षा के लिए तत्पर रहे। इसके अलावा, स्वतंत्रता आंदोलन की व्यापकता पर विचार व्यक्त करते हुए बीएल संतोष ने कहा कि भारत को आजादी केवल नमक सत्याग्रह करने या चरखा चलाने भर से नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि देश की स्वतंत्रता के पीछे हजारों ज्ञात और अज्ञात क्रांतिकारियों, देशभक्त युवाओं और जवानों के बलिदान की लंबी गाथा है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दी थी।

सवाल-जवाब

बीएल संतोष ने खरगे परिवार के बारे में क्या दावा किया?
बीएल संतोष ने दावा किया कि हैदराबाद रियासत के विलय के दौरान संघ कार्यकर्ताओं ने मल्लिकार्जुन खरगे के परिवार को रजाकारों के हमलों से बचाया था, जिसके बाद उन्हें गुलबर्गा पलायन करना पड़ा था।
प्रियंक खरगे ने बीएल संतोष के दावों का क्या जवाब दिया?
प्रियंक खरगे ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि उनके परिवार और क्षेत्र की रक्षा आरएसएस ने नहीं, बल्कि पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और भारतीय सेना ने की थी।
हैदराबाद के भारत में विलय के लिए 'ऑपरेशन पोलो' कब चलाया गया था?
भारतीय सेना द्वारा सितंबर 1948 में हैदराबाद रियासत के भारत में विलय हेतु 'ऑपरेशन पोलो' नामक सैन्य अभियान चलाया गया था।
सावरकर और आजाद हिंद फौज को लेकर प्रियंक खरगे ने क्या आरोप लगाया?
प्रियंक खरगे ने आरोप लगाया कि जब सुभाष चंद्र बोस आजाद हिंद फौज के लिए भर्ती कर रहे थे, तब सावरकर ने लोगों से ब्रिटिश सेना में शामिल होने की अपील की थी।
आरएसएस के पंजीकरण को लेकर बीएल संतोष का क्या कहना है?
बीएल संतोष का कहना है कि संघ न तो आजादी के समय रजिस्टर्ड था और न ही आज है; उसका अस्तित्व पंजीकरण पर नहीं, बल्कि लाखों स्वयंसेवकों के विश्वास पर टिका है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Dr. Aditya Sharma@aditya-sharma·72 दिन पहले

इतिहास के कालखंड और राजनीतिक विमर्श का यह संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि अतीत की व्याख्या वर्तमान की सत्ता के लिए कितनी महत्वपूर्ण हो गई है। जब खगोलीय और कालगणना के विपरीत मानवीय स्मृतियों को राजनीतिक दृष्टिकोण से गढ़ा जाता है, तब समाज में वैचारिक ध्रुवीकरण और गहरा होता है। इस तरह के दावों और पलटवारों से यह स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में क्षेत्रीय राजनीति और वैचारिक वर्चस्व की यह लड़ाई और अधिक तीव्र होगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·72 दिन पहले

यह विवाद ऐतिहासिक दावों और राजनीतिक नैरेटिव की जंग को उजागर करता है। जब इस तरह के मामलों में सार्वजनिक सुरक्षा, सेना के 'ऑपरेशन पोलो' और व्यक्तिगत अनुभवों को राजनीतिक मंचों पर आमने-सामने लाया जाता है, तो कानून-व्यवस्था और संवेदनशील विषयों पर ध्रुवीकरण बढ़ने का जोखिम रहता है। इस तरह के बयानबाजी से भविष्य में राज्य के भीतर सामाजिक सौहार्द और राजनीतिक स्थिरता पर क्या असर पड़ेगा, इस पर पैनी नजर रखनी होगी।

Kavya Nair@kavya-nair·72 दिन पहले

ऐतिहासिक घटनाओं और राजनीतिक बयानों के इस टकराव का असर केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उन क्षेत्रों के सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने पर भी प्रभाव डालता है जो पर्यटकों और यात्रियों के लिए संवेदनशील माने जाते हैं। जब ऐसे मुद्दों पर ध्रुवीकरण बढ़ता है, तो पर्यटन स्थलों की स्थानीय आर्थिकी, सांस्कृतिक सद्भाव और जीवनशैली पर गहरा असर पड़ सकता है, जिससे यात्रियों के लिए गंतव्य की सुरक्षा और स्थिरता पर भी सवाल खड़े होने लगते हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·72 दिन पहले

यह विवाद दर्शाता है कि कैसे ऐतिहासिक घटनाओं और व्यक्तिगत प्रसंगों का उपयोग वर्तमान राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए किया जा रहा है। क्षेत्रीय राजनीति में ऐसे वैचारिक टकराव भविष्य के चुनावों में नैरेटिव सेट करने का मुख्य हथियार बनते जा रहे हैं, जहाँ हर दल अपनी सुविधानुसार इतिहास की व्याख्या कर रहा है।

Ravikash Gupta@ravikash·72 दिन पहले

यह वैचारिक संघर्ष केवल चुनावी नैरेटिव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर कॉर्पोरेट और वित्तीय निवेश के सेंटीमेंट पर पड़ सकता है। क्षेत्रीय स्थिरता और लगातार बढ़ते राजनीतिक तनाव से राज्य के आर्थिक गलियारों में अनिश्चितता का माहौल बन सकता है, जिससे आगामी निवेशकों का भरोसा प्रभावित होने की पूरी आशंका है।

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