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जयपुर में ग्रेटर और हेरिटेज का विलय: 150 वार्डों के नए परिसीमन पर भाजपा और कांग्रेस के बीच बिछी चुनावी बिसातराजनीति
27 अग॰ 2026, 6:12 pm (60 दिन पहले)· 3

जयपुर में ग्रेटर और हेरिटेज का विलय: 150 वार्डों के नए परिसीमन पर भाजपा और कांग्रेस के बीच बिछी चुनावी बिसात

जयपुर नगर निगम में ग्रेटर और हेरिटेज के एकीकरण के बाद 150 वार्डों में चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। वार्डों की संख्या घटने और आरक्षण का नया ढांचा लागू होने से भाजपा और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दलों के पारंपरिक समीकरण बदल चुके हैं।

राजस्थान की राजधानी जयपुर में नगर निगम चुनाव को लेकर राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। पूरे शहर में चुनावी सरगर्मियाँ तेज हो चुकी हैं। भले ही शहर का सियासी मैदान वही है, लेकिन इस बार का चुनावी नक्शा पूरी तरह बदल चुका है। दो अलग नगर निगमों को फिर से एक करके 150 वार्डों में समेटने का फैसला भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दोनों के लिए बड़ी रणनीतिक परीक्षा और अवसर लेकर आया है। जयपुर नगर निगम के पिछले प्रशासनिक और राजनीतिक इतिहास को देखें तो 2020 का चुनाव काफी अहम रहा था। उस दौरान जयपुर को प्रशासनिक सुविधा और राजनीतिक दृष्टि से दो भागों यानी जयपुर ग्रेटर और जयपुर हेरिटेज में बाँटा गया था। 2020 के उस बहुचर्चित चुनाव में जयपुर ग्रेटर के कुल 150 वार्डों में से भाजपा ने 88 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी, जबकि कांग्रेस केवल 49 सीटों पर सिमट गई थी। इसके उलट जयपुर हेरिटेज के क्षेत्र में कांग्रेस 47 सीटें हासिल करके सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी और भाजपा को वहाँ 42 सीटों से संतोष करना पड़ा था। इस प्रकार एक ही शहर में दो अलग-अलग निकायों के तहत दो भिन्न राजनीतिक परिणाम सामने आए थे। अब राज्य में सत्ता परिवर्तन और नए परिसीमन के साथ ही इन दोनों निकायों की अलग-अलग व्यवस्था समाप्त हो चुकी है और इनका पुनरुत्थान कर एकीकृत जयपुर नगर निगम बना दिया गया है।

दो निगमों का एकीकरण: राजनीतिक वर्चस्व बचाने की नई जंग

जयपुर के दोनों नगर निगमों के विलय के बाद अब राजनीतिक दलों की रणनीति पूरी तरह बदल गई है। पिछले निकाय चुनाव में भाजपा ने ग्रेटर क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ का परिचय दिया था, लेकिन अब उसके सामने चुनौती केवल अपने इस पुराने किले को सुरक्षित रखने की ही नहीं है, बल्कि पुराने हेरिटेज इलाके में भी अपनी राजनीतिक साख साबित करने की होगी। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के लिए भी नई स्थिति कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। कांग्रेस को अपने मजबूत आधार वाले हेरिटेज क्षेत्र की सीटों को बचाए रखने के साथ-साथ ग्रेटर के उन क्षेत्रों में अपनी पैठ बनानी होगी जहाँ पिछली बार भाजपा का स्पष्ट वर्चस्व देखने को मिला था। दोनों ही दल अब नए प्रशासनिक ढाँचे के तहत अपनी चुनावी गोटियाँ बिछा रहे हैं।

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250 से घटकर 150 हुए वार्ड: नेताओं के बदले समीकरण

जयपुर में वार्डों की कुल संख्या को 250 से घटाकर 150 करना केवल एक संख्यात्मक बदलाव नहीं है, बल्कि इसने पूरे शहर का राजनीतिक भूगोल बदल कर रख दिया है। परिसीमन की इस प्रक्रिया में कई पुराने वार्डों का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो गया है, जबकि कई वार्डों की भौगोलिक सीमाएँ बदल दी गई हैं। इसके कारण कई दिग्गजों और पूर्व पार्षदों के पारंपरिक वोट बैंक एक वार्ड से स्थानांतरित होकर दूसरे नए वार्डों में चले गए हैं। जो नेता कल तक अपने क्षेत्रीय वार्ड का निर्विरोध या निर्विवाद चेहरा माना जाता था, यह आवश्यक नहीं है कि नए परिसीमन के बाद भी उसकी स्थिति वैसी ही बनी रहे। अब दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों को नए सिरे से प्रत्येक वार्ड का सामाजिक और राजनीतिक सर्वेक्षण करना पड़ रहा है, ताकि यह समझा जा सके कि किस नए क्षेत्र में किस प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़ है और किस बूथ पर कौन सा कार्यकर्ता सक्रिय भूमिका निभा सकता है।

आरक्षण का नया ढाँचा और 94 सामान्य सीटों का गणित

इस नगर निगम चुनाव में टिकटों का वितरण दोनों दलों के लिए सबसे बड़ी पहेली बना हुआ है। 150 वार्डों में लागू नए आरक्षण रोस्टर ने कई पुराने दावेदारों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। निर्धारित आरक्षण व्यवस्था के अनुसार कुल 150 वार्डों में से 20 वार्ड अनुसूचित जाति के लिए, 6 वार्ड अनुसूचित जनजाति के लिए और 30 वार्ड अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित किए गए हैं। इसके अलावा 94 वार्डों को सामान्य वर्ग के लिए अनारक्षित रखा गया है। साथ ही विभिन्न श्रेणियों में महिला आरक्षण के प्रभावी होने से कई स्थापित नेताओं के लिए चुनावी मैदान के दरवाजे बंद हो गए हैं, जबकि कई नए और युवा चेहरों को आगे आने का अवसर मिला है। स्थानीय चुनावों में केवल जातीय और सामाजिक गणित ही सब कुछ नहीं होता, बल्कि प्रत्याशी की व्यक्तिगत लोकप्रियता, क्षेत्र में उसकी उपस्थिति और चुनाव जीतने की क्षमता सबसे निर्णायक कारक साबित होती है।

मेयर की अनारक्षित सीट और बोर्ड गठन का पहला लक्ष्य

जयपुर नगर निगम में इस बार मेयर का पद अनारक्षित रखा गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि सामान्य वर्ग का कोई भी योग्य प्रतिनिधि मेयर की कुर्सी पर आसीन हो सकता है। मेयर पद के अनारक्षित होने से दोनों ही दलों में आकांक्षी नेताओं के बीच अंदरूनी खींचतान और गतिविधियाँ बढ़ना स्वाभाविक है। हालाँकि, मेयर पद के चेहरे पर अंतिम निर्णय लेने से पहले दोनों दलों का प्राथमिक ध्यान 150 सदस्यीय बोर्ड में स्पष्ट बहुमत यानी कम से कम 76 सीटों का आँकड़ा पार करने पर केंद्रित है। जब तक बोर्ड में पार्षदों का बहुमत हासिल नहीं होता, तब तक मेयर पद का दावा बेमानी रहेगा। इसलिए चुनावी बिसात का पहला चरण वार्ड स्तर पर जीत दर्ज करने का है, जिसके बाद ही पार्टी के भीतर मेयर प्रत्याशी के चयन पर सहमति बनाने की कवायद शुरू होगी।

सत्ताधारी भाजपा के पास मजबूत संगठन लेकिन बगावत की आशंका

राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार होने के कारण पार्टी को नगर निगम चुनाव में कुछ स्वाभाविक लाभ मिलने की उम्मीद है। जयपुर में भाजपा का कैडर और संगठनात्मक ढाँचा हमेशा से मजबूत माना जाता रहा है। इसके अतिरिक्त 2020 के चुनाव में ग्रेटर क्षेत्र में पार्टी का पिछला प्रदर्शन भी उसके पक्ष में जाता है। किंतु सत्ता में होने के साथ ही जनता के प्रति जवाबदेही भी बढ़ जाती है। कांग्रेस इस निकाय चुनाव को केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित न रखकर राज्य की भाजपा सरकार के ढाई साल के कार्यकाल पर एक जनादेश के रूप में पेश करने की रणनीति बना रही है। ऐसे में भाजपा को अपने जमीनी संगठन को वोट में बदलने के साथ जनता को यह भी विश्वास दिलाना होगा कि राज्य सरकार की योजनाओं का सीधा लाभ जयपुर की हर गली और मोहल्ले तक पहुँचा है।

भाजपा में 2500 से अधिक दावेदार और पैनल निर्माण की कसरत

टिकट पाने की होड़ में भाजपा के पास आवेदकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है। जयपुर भाजपा कार्यालय को 150 सीटों के लिए 2500 से भी अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं। स्थिति यह है कि कई वार्डों में एक-एक सीट पर कई मजबूत दावेदार आमने-सामने हैं। पार्टी संगठन अब प्रत्येक वार्ड से तीन-तीन संभावित प्रत्याशियों का पैनल तैयार कर रहा है, जिसके लिए स्वतंत्र सर्वे और कार्यकर्ताओं के फीडबैक को आधार बनाया जा रहा है। कुल आवेदनों में लगभग 1000 महिला कार्यकर्ताओं की दावेदारी भी सामने आई है, जो निकाय राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को दर्शाती है। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अनुभवी पुराने नेताओं और ऊर्जावान नए चेहरों के बीच संतुलन बनाने की है। 150 सीटों पर 2500 से अधिक आवेदकों में से चयन के बाद पार्टी को असंतुष्ट नेताओं और बागियों की चुनौतियों का भी सामना करना पड़ सकता है, जो निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरकर पार्टी प्रत्याशियों का समीकरण बिगाड़ सकते हैं।

कांग्रेस की रणनीति: 50 प्रतिशत युवाओं को अवसर देने का दांव

दूसरी तरफ कांग्रेस इस चुनाव में अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव लाती दिख रही है। राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने निकाय और पंचायत चुनावों में 50 वर्ष से कम आयु के प्रत्याशियों को 50 प्रतिशत टिकट देने की महत्वपूर्ण घोषणा की है। इस नीति के माध्यम से कांग्रेस पुराने और अनुभवी नेताओं के साथ-साथ युवाओं की नई पीढ़ी को चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है। युवा दावेदारों के लिए डिजिटल माध्यम से आवेदन प्राप्त करने और बहुस्तरीय स्क्रीनिंग करने का काम किया जा रहा है। कांग्रेस की मुख्य रणनीति नए चेहरों के उत्साह, स्थानीय नागरिक समस्याओं और राज्य सरकार के खिलाफ असंतोष को हथियार बनाकर भाजपा को घेरने की है। अब देखना यह होगा कि यह युवा दांव कांग्रेस को 150 वार्डों के नए सियासी परिदृश्य में कितनी मजबूती प्रदान करता है।

सवाल-जवाब

जयपुर नगर निगम में अब कुल कितने वार्ड हैं?
जयपुर नगर निगम में ग्रेटर और हेरिटेज का विलय होने के बाद अब कुल 150 वार्ड हैं।
2020 के निकाय चुनाव में ग्रेटर और हेरिटेज निगमों में क्या नतीजे रहे थे?
2020 में ग्रेटर के 150 वार्डों में भाजपा ने 88 और कांग्रेस ने 49 सीटें जीती थीं, जबकि हेरिटेज के 100 वार्डों में कांग्रेस ने 47 और भाजपा ने 42 सीटें जीती थीं।
जयपुर नगर निगम में मेयर का पद किस वर्ग के लिए आरक्षित है?
जयपुर नगर निगम में इस बार मेयर का पद अनारक्षित (सामान्य वर्ग) रखा गया है।
150 वार्डों में आरक्षण की क्या स्थिति है?
150 वार्डों में से 20 वार्ड अनुसूचित जाति (SC), 6 वार्ड अनुसूचित जनजाति (ST), 30 वार्ड अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षित हैं और 94 वार्ड सामान्य वर्ग के लिए अनारक्षित हैं।
कांग्रेस ने इस चुनाव के लिए टिकट वितरण की क्या नई नीति घोषित की है?
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने 50 साल से कम उम्र के प्रत्याशियों को 50 प्रतिशत टिकट देने की घोषणा की है।
भाजपा के पास जयपुर में कितने टिकट आवेदन आए हैं?
जयपुर भाजपा को 150 वार्डों के लिए 2500 से अधिक टिकट आवेदन प्राप्त हुए हैं, जिनमें लगभग 1000 महिला दावेदार शामिल हैं।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·60 दिन पहले

जयपुर में ग्रेटर और हेरिटेज के विलय और वार्डों के 250 से घटकर 150 होने से चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। प्रशासनिक बदलाव के कारण पुराने पार्षदों के वोट बैंक और भौगोलिक सीमाएँ प्रभावित हुई हैं, जिससे दोनों प्रमुख दलों को नए सिरे से रणनीति बनानी होगी। इस बदलाव का असर आगामी परिणामों पर साफ दिखेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·60 दिन पहले

जयपुर नगर निगम के एकीकरण और 150 वार्डों के नए परिसीमन से केवल राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक और कानून-व्यवस्था के स्तर पर भी गहरी चुनौतियाँ खड़ी होंगी। वार्डों के घटने और भौगोलिक सीमाओं के बदलने से टिकट वितरण को लेकर दोनों दलों के भीतर तीव्र अंतर्द्वंद और बगावत की स्थिति बन सकती है। पूर्व पार्षदों और दिग्गजों के वोट बैंक बिखरने से चुनावी सरगर्मी के साथ जमीनी स्तर पर तनाव और विवाद बढ़ने की पूरी आशंका है, जिस पर जिला प्रशासन और पुलिस को विशेष निगरानी रखनी होगी।

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