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उत्तर प्रदेश में नई टीम के सहारे सामाजिक संतुलन साधने में जुटी कांग्रेस, चुनावी बिसात पर बदले समीकरणराजनीति
3 अक्तू॰ 2026, 2:03 pm (1 घंटे पहले)· 0

उत्तर प्रदेश में नई टीम के सहारे सामाजिक संतुलन साधने में जुटी कांग्रेस, चुनावी बिसात पर बदले समीकरण

कांग्रेस आलाकमान ने उत्तर प्रदेश संगठन में बड़ा फेरबदल करते हुए आराधना मिश्रा मोना को प्रदेश अध्यक्ष और इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है. इस रणनीतिक बदलाव के जरिए पार्टी ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित और अति पिछड़ा वर्गों को एकजुट कर चुनावी जमीन मजबूत करने का प्रयास कर रही है.

उत्तर प्रदेश में आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक खेमों में हलचल तेज हो गई है. कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य इकाई के सांगठनिक ढांचे में व्यापक फेरबदल करते हुए अपनी नई कार्यसमिति की घोषणा कर दी है. इस बड़े संगठनात्मक बदलाव के तहत पूर्व अध्यक्ष अजय राय की जगह रामपुर खास विधानसभा क्षेत्र से लगातार तीन बार निर्वाचित विधायक आराधना मिश्रा मोना को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की नई कमान सौंपी गई है. इसके साथ ही सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष का दायित्व दिया गया है. पार्टी की इस नई सूची को केवल सामान्य सांगठनिक बदलाव के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसके पीछे एक सुविचारित सामाजिक समीकरण साधने की स्पष्ट कोशिश दिखाई देती है.

पार्टी ने इस नई टीम के जरिए राज्य के विभिन्न सामाजिक वर्गों को एक मंच पर लाने का खाका तैयार किया है. उत्तर प्रदेश के प्रभारी के तौर पर पहले से सक्रिय दलित चेहरे राजेंद्र पाल गौतम के साथ-साथ नव नियुक्त वरिष्ठ उपाध्यक्ष आलोक प्रसाद को शामिल किया गया है, जो दलित समाज से आते हैं. इसके अलावा देवेंद्र निषाद को संगठन में जगह देकर अति पिछड़ा वर्ग को भी सीधा प्रतिनिधित्व दिया गया है. इन नियुक्तियों के जरिए कांग्रेस राज्य के प्रमुख सामाजिक समूहों को साधने की रणनीति पर काम कर रही है. राजनीतिक गलियारों में अब इस बात पर चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह नई बिसात समाजवादी पार्टी के साथ सीटों के तालमेल में कांग्रेस का पलड़ा भारी करने के लिए बिछाई गई है या फिर इसका सीधा लक्ष्य सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन को सीधी चुनावी चुनौती देना है.

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सवर्ण और मुस्लिम मतदाताओं को साधने की सोची-समझी पहल

राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा मोना को प्रदेश अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपकर कांग्रेस ने सवर्ण समाज, विशेष रूप से ब्राह्मण मतदाताओं के बीच एक मजबूत संदेश देने का प्रयास किया है. उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में लगभग 10 से 12 प्रतिशत ब्राह्मण मतदाता हमेशा से एक निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं और कई मौकों पर सत्ता की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस वर्ग के भीतर मौजूद कथित नाराजगी का लाभ उठाने के इरादे से ही कांग्रेस ने यह ब्राह्मण चेहरा आगे किया है.

दूसरी तरफ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में गहरा प्रभाव रखने वाले इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया है. राज्य में करीब 19 से 20 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं. इस वर्ग के बीच अपनी सीधी उपस्थिति बनाए रखने और मतदाताओं का भरोसा फिर से जीतने के लिए कांग्रेस ने इमरान मसूद पर भरोसा जताया है. इस दोहरे नेतृत्व के जरिए पार्टी सवर्ण और अल्पसंख्यक मतदाताओं का एक पारंपरिक गठबंधन फिर से खड़ा करने की उम्मीद कर रही है.

दलित और अति-पिछड़ा वर्ग पर विशेष ध्यान

कांग्रेस नेतृत्व ने केवल सवर्ण और अल्पसंख्यक समीकरण तक खुद को सीमित नहीं रखा है, बल्कि बहुजन समाज पार्टी के कमजोर पड़ते जनाधार को देखते हुए दलित और अति-पिछड़े वर्गों को भी अपने पाले में लाने की तैयारी की है. उत्तर प्रदेश के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम दलित समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि नवनियुक्त वरिष्ठ उपाध्यक्ष आलोक प्रसाद भी इसी वर्ग से आते हैं. इनके साथ ही देवेंद्र निषाद को संगठन के शीर्ष स्तर पर शामिल कर पार्टी ने अति पिछड़ा वर्ग के बीच अपनी पैठ बढ़ाने की योजना बनाई है.

यह पूरा संगठनात्मक ढांचा बहुजन समाज पार्टी के खिसकते वोट बैंक को अपनी तरफ आकर्षित करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. राज्य के गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग और अति-पिछड़ी जातियों को संगठनात्मक प्रतिनिधित्व देकर कांग्रेस एक ऐसा सामाजिक गठबंधन तैयार करना चाहती है, जो सीधे तौर पर चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सके.

सपा के पीडीए फॉर्मूले के साथ संभावित तालमेल का असर

यदि 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का यह नया ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग का समीकरण समाजवादी पार्टी के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले के साथ मिलकर काम करता है, तो चुनावी परिदृश्य में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन है कि ऐसे गठबंधन की स्थिति में मुस्लिम और यादव वर्ग के लगभग 28 से 30 प्रतिशत वोटों में कोई बिखराव नहीं होगा. इसके अतिरिक्त गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग और अति-पिछड़ा मतदाता पीडीए के साथ जुड़कर भारतीय जनता पार्टी के पारंपरिक पिछड़े वोट बैंक में सेंधमारी कर सकते हैं.

यदि यह गठबंधन चुनावी मैदान में मतदाताओं को एकजुट रखने और वोटों का प्रभावी ट्रांसफर कराने में सफल रहता है, तो जानकारों के मुताबिक उत्तर प्रदेश की 120 से 150 विधानसभा सीटों के नतीजे सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में लगभग 40 से 50 सीटें मुस्लिम आबादी के प्रभाव वाली मानी जाती हैं. इमरान मसूद के सियासी प्रभाव के कारण सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बिजनौर और मुरादाबाद के इलाकों में मुस्लिम, जाट और दलित मतदाताओं का एक बड़ा ध्रुवीकरण देखने को मिल सकता है.

पूर्वांचल, बुंदेलखंड और तराई क्षेत्रों की स्थिति

मध्य उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल के इलाकों में करीब 60 से 70 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां यह नया सामाजिक समीकरण असर डाल सकता है. आराधना मिश्रा मोना के नेतृत्व से यह सवाल उठ रहा है कि क्या ब्राह्मण मतदाताओं का एक हिस्सा सत्तारूढ़ दल से अलग होकर कांग्रेस की तरफ रुख करेगा. इसके साथ ही निषाद और दलित नेताओं की मौजूदगी से पूर्वांचल के उन क्षेत्रों में मुकाबला कड़ा हो सकता है, जहां अति-पिछड़ी जातियों की आबादी बहुतायत में है.

इसके अलावा बुंदेलखंड और तराई बेल्ट की 20 से 30 विधानसभा सीटें भी राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील हैं. इन इलाकों में दलित और अति-पिछड़ी जातियां चुनावी नतीजों को तय करने में निर्णायक भूमिका निभाती हैं. यदि कांग्रेस इन वर्गों का विश्वास जीतने में सफल रहती है, तो इन सीटों पर चुनावी मुकाबला काफी त्रिकोणीय या द्विपक्षीय बन सकता है.

सत्तारूढ़ दल की रणनीतिक ताकत और चुनौतियां

इन तमाम विपक्षी रणनीतियों के बावजूद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भारतीय जनता पार्टी के पास इस सामाजिक मोर्चेबंदी का मुकाबला करने के लिए अपना एक मजबूत आधार मौजूद है. भारतीय जनता पार्टी का कैडर आधारित संगठन और केंद्र व राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से जुड़ा लाभार्थी वर्ग जातिगत दीवारों से ऊपर उठकर मतदान करता रहा है. इसके अतिरिक्त ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य मतदाताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग लंबे समय से पार्टी का मुख्य आधार रहा है, जिसे केवल सांगठनिक चेहरे बदलने से पूरी तरह अलग करना आसान नहीं माना जा रहा है.

अपराध पर जीरो टॉलरेंस की प्रशासनिक नीति और हिंदुत्व के वैचारिक मुद्दों पर भारतीय जनता पार्टी राज्य में अपनी मजबूत स्थिति बनाए हुए है. ऐसे में कांग्रेस की यह नई टीम न केवल आगामी चुनाव में अपनी जमीन मजबूत करने का प्रयास है, बल्कि सहयोगी दलों के साथ चुनावी सीटों के बंटवारे के दौरान अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाने का एक सुनियोजित कदम भी साबित हो सकती है.

सवाल-जवाब

उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की नई अध्यक्ष किसे बनाया गया है?
रामपुर खास से लगातार तीन बार की विधायक आराधना मिश्रा मोना को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया है.
इमरान मसूद को पार्टी संगठन में क्या जिम्मेदारी सौंपी गई है?
सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है.
कांग्रेस की नई टीम में दलित और अति पिछड़े वर्ग से किन नेताओं को शामिल किया गया है?
दलित वर्ग से प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम और वरिष्ठ उपाध्यक्ष आलोक प्रसाद को शामिल किया गया है, जबकि देवेंद्र निषाद अति पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.
विश्लेषकों के अनुसार इस नए समीकरण से कितनी विधानसभा सीटों पर असर पड़ सकता है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह सामाजिक गठबंधन जमीन पर प्रभावी रहा, तो राज्य की 120 से 150 विधानसभा सीटों के समीकरण प्रभावित हो सकते हैं.
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