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जेडीयू का नाम बदलने की अटकलों पर प्रशांत किशोर का तंज, बोले अमित शाह चला रहे नीतीश कुमार की पार्टीराजनीति
13 सित॰ 2026, 9:10 pm (43 दिन पहले)· 1

जेडीयू का नाम बदलने की अटकलों पर प्रशांत किशोर का तंज, बोले अमित शाह चला रहे नीतीश कुमार की पार्टी

जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने जनता दल यूनाइटेड का नाम बदलने के प्रस्ताव पर तीखा कटाक्ष करते हुए आरोप लगाया है कि पार्टी का पूरा नियंत्रण अमित शाह के पास है।

बिहार के सियासी मैदान में इन दिनों बयानों के तीखे तीर चलाए जा रहे हैं, जहां नेता एक-दूसरे पर सीधे हमले कर रहे हैं। एक तरफ जहां सत्ताधारी दल जनता दल यूनाइटेड के भीतर पार्टी का नाम बदलकर ‘जनता दल (नीतीश)’ करने के प्रस्ताव पर आंतरिक रूप से चर्चा होने की खबरें आ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ जन सुराज के मार्गदर्शक और बांकीपुर के विधायक प्रशांत किशोर ने इस मुद्दे को लेकर JDU के शीर्ष नेताओं पर जोरदार हमला बोला है। JDU का नाम बदलने की संभावित कोशिशों पर चुटकी लेते हुए प्रशांत किशोर ने कहा कि चाहे पार्टी का नाम जनता दल यूनाइटेड रहे या जनता दल नीतीश, इसे असल में चलाने वाले अमित शाह ही हैं, और उनके नीचे काम करने वाले दो स्थानीय नेता महज उनके इशारे पर नाचने वाली कठपुतलियां हैं। इस तीखे कटाक्ष ने JDU नेतृत्व को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है और राज्य के सत्ताधारी गठबंधन में BJP के बढ़ते प्रभाव को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

नाम बदलने की चर्चा और 'वन डमरू' का कटाक्ष

पिछले कुछ दिनों से जनता दल यूनाइटेड का नाम बदलकर ‘जनता दल (नीतीश)’ करने को लेकर राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चाएं हो रही हैं। इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए प्रशांत किशोर ने तर्क दिया कि केवल संगठन का नाम बदल देने से बिहार की जमीनी हकीकत में कोई बदलाव आने वाला नहीं है। उन्होंने दावा किया कि पार्टी का नाम क्या रखा जाता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वर्तमान JDU का संचालन खुद नीतीश कुमार के हाथों में नहीं है, बल्कि इसे गृह मंत्री अमित शाह द्वारा चलाया जा रहा है। उनके अनुसार, दिल्ली में बैठा BJP नेतृत्व जो कुछ भी तय करता है, JDU में उसी फैसले को बिना किसी हिचकिचाहट के लागू कर दिया जाता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा किए गए एक वीडियो में प्रशांत किशोर ने इस बात को विस्तार से समझाते हुए कहा कि पार्टी वास्तव में दिल्ली से संचालित हो रही है, जबकि इसके नीचे बैठे दो नेता, जिन्हें उन्होंने ‘वन डमरू’ (दूसरों के इशारे पर बजने वाला डमरू) कहा, केवल अपने केंद्रीय आकाओं के निर्देशों पर नाच रहे हैं।

'वन डमरू' वाले बयान के पीछे के राजनीतिक मायने

अपने बयान में ‘वन डमरू’ शब्द का इस्तेमाल करके प्रशांत किशोर ने JDU के उन वरिष्ठ नेताओं पर निशाना साधा है जो BJP के केंद्रीय नेतृत्व के निर्देशों के अनुसार फैसले ले रहे हैं। यह रूपक उन लोगों की ओर इशारा करता है जिनके पास खुद निर्णय लेने की कोई स्वतंत्र क्षमता नहीं बची है और वे पूरी तरह से बाहरी निर्देशों पर निर्भर हो चुके हैं। किशोर का स्पष्ट संदेश यह है कि नीतीश कुमार की पार्टी ने अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता खो दी है, और इसके शीर्ष स्तर पर बैठे रणनीतिकार केवल दिल्ली से तय होकर आने वाले फैसलों को लागू करने का काम कर रहे हैं। हालांकि प्रशांत किशोर ने अपने बयान में उन दोनों नेताओं के नामों का खुलासा नहीं किया, लेकिन उनके इस कटाक्ष ने बिहार की राजनीति में इस बात को लेकर कौतूहल पैदा कर दिया है कि आखिर वे कौन से दो प्रभावशाली चेहरे हैं जिनके पास वास्तव में फैसले लेने की कोई ताकत नहीं बची है।

सम्राट चौधरी के बजाय अब सीधे JDU पर निशाना

हाल के समय तक बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर के हमलों के केंद्र में मुख्य रूप से राज्य के उप-मुख्यमंत्री और BJP नेता सम्राट चौधरी रहे थे। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के प्रचार के दौरान जब सम्राट चौधरी ने एक साक्षात्कार में प्रशांत किशोर को ‘बेचारा’ कहकर संबोधित किया था, तो प्रशांत किशोर ने भी उन पर तीखा पलटवार किया था। किशोर ने तब कहा था कि हां, मैं बेचारा हूं क्योंकि मेरे पास बिहार की व्यवस्था को सुधारने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है, और मैं इस राज्य के भविष्य को सम्राट चौधरी जैसे राजनेताओं के भरोसे नहीं छोड़ सकता। लेकिन अब किशोर की राजनीतिक रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। उन्होंने सम्राट चौधरी के साथ जारी जुबानी जंग को छोड़कर अपना पूरा ध्यान सीधे JDU के प्रशासनिक ढांचे और नीतीश कुमार के शासन मॉडल की कमियों को उजागर करने पर केंद्रित कर दिया है।

नीतीश कुमार के पारंपरिक वोट बैंक पर नजर

प्रशांत किशोर की इस रणनीति के पीछे एक सोची-समझी राजनीतिक चाल छिपी हुई है। वे अच्छी तरह जानते हैं कि बिहार में एक बहुत बड़ा ऐसा वर्ग है जो गैर-RJD और गैर-BJP विचारधारा का है, जिसमें मुख्य रूप से अति पिछड़ा वर्ग और तटस्थ मतदाता शामिल हैं। पारंपरिक रूप से यह बड़ा वोट बैंक हमेशा नीतीश कुमार का मजबूत समर्थन आधार रहा है। JDU को एक कमजोर और असहाय पार्टी के रूप में पेश करके और ‘ब्रांड नीतीश’ के पतन की कहानी गढ़कर, प्रशांत किशोर इस महत्वपूर्ण मतदाता वर्ग को अपनी नवगठित पार्टी जन सुराज की ओर आकर्षित करना चाहते हैं। वे JDU का नाम बदलने की कोशिशों को उसकी घटती लोकप्रियता के प्रमाण के रूप में जनता के सामने रख रहे हैं। इसके साथ ही, किशोर ने बिहार में हर साल आने वाली विनाशकारी बाढ़ और जल संसाधन विभाग के कुप्रबंधन को लेकर भी JDU को घेरा है, क्योंकि यह महत्वपूर्ण विभाग पिछले कई वर्षों से लगातार JDU के नियंत्रण में ही रहा है।

बिहार के भविष्य के लिए जन सुराज का वैकल्पिक एजेंडा

अपने जन सुराज अभियान के माध्यम से प्रशांत किशोर बिहार की पारंपरिक राजनीति के स्थापित तरीकों को चुनौती दे रहे हैं, जो दशकों से जातिगत समीकरणों, धार्मिक ध्रुवीकरण और मुफ्त की घोषणाओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है। वे राज्य के राजनीतिक विमर्श को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों पर केंद्रित करने का प्रयास कर रहे हैं। JDU को अमित शाह द्वारा नियंत्रित बताना और उसके शीर्ष नेताओं को प्रभावहीन साबित करना इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा है। ऐसा करके किशोर खुद को और जन सुराज को NDA और महागठबंधन दोनों के मुकाबले एक मजबूत और सक्षम विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। अब देखना यह होगा कि लोकसभा चुनाव 2029 और बिहार विधानसभा चुनाव 2030 के दौरान प्रशांत किशोर का यह नया राजनीतिक नैरेटिव कितने वोट बटोरने में सफल हो पाता है और बिहार की सत्ता की कुंजी किसे मिलती है।

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