बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में पिछले दो दशकों से एकछत्र प्रभाव रखने वाले 'नीतीश युग' का अवसान वर्ष 2026 में 21 साल लंबे सफर के बाद हो गया। इस ऐतिहासिक पड़ाव के साथ ही जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के भीतर आंतरिक सत्ता संघर्ष और दो अलग-अलग शक्ति केंद्रों के उभरने की एक बेहद दिलचस्प और जटिल कहानी आकार लेने लगी। हालांकि, इस नए राजनीतिक घटनाक्रम की पृष्ठभूमि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों की घोषणा से पहले ही लिखी जाने लगी थी। पार्टी के भीतर चल रही इस खींचतान, सांगठनिक बदलावों और शीर्ष नेतृत्व की बदलती प्राथमिकताओं को लेकर जेडीयू के एक बेहद वरिष्ठ और पुराने नेता ने कई ऐसे गहरे राज खोले हैं, जिन्हें अब तक पार्टी के बड़े नीति-नियंतक दबाते आ रहे थे। वर्तमान में बिहार के राजनीतिक गलियारों में जेडीयू की अंदरूनी गुटबाजी, समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर पार्टी का रुख, और राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विनय कुमार सहित तीन वरिष्ठ अधिकारियों का अचानक लंबी छुट्टी पर चले जाना सबसे बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है। इसके साथ ही, सीएम सम्राट चौधरी को लेकर भी राजनीतिक हलकों में कई तरह की कयासबाजियों का दौर गर्म है। ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है कि आखिर बिहार की राजनीति में सितंबर का यह महीना इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है और क्या वाकई जेडीयू के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है? इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत कब, कहां और किस तरह से हुई, इसकी परतें अब धीरे-धीरे खुलने लगी हैं।
एक अणे मार्ग पर जीत का जश्न और बदलती हवा
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के तुरंत बाद, पटना स्थित मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास '1, अणे मार्ग' पर भारी गहमागहमी थी। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की शानदार और अप्रत्याशित सफलता पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बधाई देने के लिए जेडीयू और बीजेपी के तमाम बड़े नेताओं, मंत्रियों और विधायकों का हुजूम उमड़ पड़ा था। मुख्यमंत्री आवास के विशाल बैठक हॉल में पहले से ही जेडीयू के कई दिग्गज मंत्री और कद्दावर नेता अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। इस भीड़ में पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा, कैबिनेट मंत्री अशोक चौधरी, विजय चौधरी, श्रवण कुमार के साथ-साथ हमेशा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साये की तरह रहने वाले ललन सर्राफ और हरेंद्र बहादुर सिंह भी हॉल के एक कोने में खड़े होकर आपसी चर्चा में व्यस्त थे। इसी बीच, विजय चौधरी ने स्थिति को देखते हुए वहां मौजूद सहयोगियों से कहा कि अब मुख्यमंत्री जी को अंदर से बुला लिया जाना चाहिए। विजय चौधरी के इस सुझाव पर तुरंत अमल करते हुए हरेंद्र बहादुर सिंह मुख्यमंत्री के निजी कक्ष की तरफ बढ़े और कुछ ही देर में नीतीश कुमार को साथ लेकर हॉल में वापस लौटे। इस खास मौके पर बिहार जेडीयू के एक वरिष्ठ मुस्लिम नेता भी अपने युवा बेटे के साथ मुख्यमंत्री से मुलाकात करने के लिए वहां मौजूद थे।
टीडीपी पर सवाल और विस्मृति के संकेत
जैसे ही नीतीश कुमार ने हॉल में प्रवेश किया, उन्होंने बेहद सादगी से अपने दोनों हाथ जोड़कर वहां उपस्थित सभी नेताओं को 'प्रणाम-प्रणाम' कहा और अपनी निर्धारित सीट पर बैठ गए। उनके बैठते ही हरेंद्र बहादुर सिंह ने मुख्यमंत्री का ध्यान वहां उपस्थित वरिष्ठ नेताओं की तरफ खींचते हुए कहा कि संजय झा जी, विजय बाबू, अशोक चौधरी जी और श्रवण बाबू काफी देर से उनका इंतजार कर रहे हैं। नीतीश कुमार ने बैठते ही सीधे सांगठनिक और चुनावी मुद्दों पर बात शुरू कर दी। उन्होंने कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा की तरफ देखते हुए पहला सवाल किया कि आखिर पार्टी जहानाबाद लोकसभा सीट कैसे हार गई? इसके तुरंत बाद उन्होंने पूछा कि शांभवी कितने वोटों के अंतर से चुनाव जीती हैं? इसी बातचीत के दौरान हॉल में मौजूद एक अन्य नेता ने देश के राजनीतिक हालात का जिक्र करते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर टीडीपी ने इस बार 16 सीटें जीती हैं। यह सुनते ही नीतीश कुमार ने अचानक पूछा, "यह टीडीपी क्या है?" वहां बैठे नेताओं के चेहरे पर इस सवाल से थोड़ी हैरानी साफ दिखी। तभी एक नेता ने बात संभालते हुए स्पष्ट किया कि सर, वह चंद्रबाबू नायडू की पार्टी है। इस पर नीतीश कुमार ने थोड़ा ठहरते हुए कहा, "अच्छा-अच्छा, समझ गया..."। मुख्यमंत्री का यह व्यवहार और उनकी इस तरह की सामान्य राजनीतिक जानकारियों पर विस्मृति वहां मौजूद कई नेताओं के लिए बेहद चौंकाने वाली थी।
कंधे पर हाथ और विदाई का अहसास
पार्टी के उस वरिष्ठ नेता ने बताया कि वे और उनके बेटे लगभग 35 मिनट तक उस हॉल में मुख्यमंत्री और अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठे रहे। इस दौरान बिहार की विभिन्न लोकसभा सीटों पर जीत-हार के समीकरणों, किस सीट पर किस वजह से नुकसान हुआ और कहां पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया, इन सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा होती रही। जब बातचीत का दौर थोड़ा थमा, तो उस मुस्लिम नेता ने मुख्यमंत्री से कहा, "सर, हम तो सिर्फ आपको इस शानदार जीत की मुबारकबाद देने आए थे। अब अगर आपकी आज्ञा हो, तो हम निकलें?" इस पर नीतीश कुमार ने वहां बैठे अन्य सभी नेताओं और मंत्रियों की तरफ देखा और कहा, "आप लोग यहीं बैठे रहिए, मैं इन्हें बाहर तक छोड़कर आता हूं।" मुख्यमंत्री के इस अप्रत्याशित व्यवहार पर विजय चौधरी ने तुरंत टोकते हुए कहा कि आप बैठे रहिए सर, ये खुद चले जाएंगे, आपको जाने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन नीतीश कुमार ने किसी की नहीं सुनी और वे उस नेता को बाहर गेट तक छोड़ने के लिए खुद अपनी सीट से उठ खड़े हुए।
गेट तक जाने के रास्ते में नीतीश कुमार ने उस वरिष्ठ नेता के कंधे पर अपना हाथ रख दिया और लगभग 15 मिनट तक उनसे बेहद आत्मीयता से बातचीत की। इस दौरान मुख्यमंत्री ने उनसे कहा, "देखिए, आने वाले विधानसभा चुनावों में मुझे जहां भी प्रचार के लिए कहा जाएगा, मैं पूरी ताकत से वहां जाऊंगा। हमें आगामी विधानसभा चुनाव में इस लोकसभा चुनाव से भी कहीं बेहतर प्रदर्शन करके दिखाना है। आप अभी से सभी लोगों को तैयार करना शुरू कर दीजिए।" इस मुलाकात के बाद उस नेता का बेटा बेहद खुश और उत्साहित था कि बिहार के मुख्यमंत्री उसके पिता को खुद गेट तक छोड़ने आए थे। लेकिन वह वरिष्ठ नेता उसी क्षण एक गंभीर और कड़वी हकीकत भांप चुके थे। उन्होंने मन ही मन महसूस किया कि मुख्यमंत्री उन्हें क्या छोड़ने आ रहे हैं, बल्कि सच तो यह है कि अब मुख्यमंत्री का नियंत्रण और उनका पुराना दौर धीरे-धीरे उनसे और पार्टी से छूट रहा है।
निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री की इनसाइड स्टोरी
जेडीयू के इसी अंदरूनी घटनाक्रम पर बात करते हुए वरिष्ठ नेता ने एक और महत्वपूर्ण खुलासा किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान ही पार्टी के भीतर यह स्पष्ट रूप से महसूस होने लगा था कि नीतीश कुमार का स्वास्थ्य अब वैसा नहीं रह गया है और उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही है। प्रारंभ में, नीतीश कुमार अपने बेटे निशांत कुमार को सक्रिय राजनीति और जेडीयू संगठन में लाने के सख्त खिलाफ थे। वे नहीं चाहते थे कि उनका परिवार इस तरह से राजनीति का हिस्सा बने। लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता ललन सिंह ने एक दिन सीधे नीतीश कुमार से बात की और उनके सामने एक तीखा सवाल रख दिया। ललन बाबू ने मुख्यमंत्री से अत्यंत स्पष्ट शब्दों में पूछा था, "क्या चाहते हैं निशांत कटोरा लेकर घूमे?"
ललन सिंह के इस सीधे और बेहद व्यावहारिक सवाल ने नीतीश कुमार की सोच को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया। इसी बातचीत के बाद जेडीयू की पूरी कहानी बदल गई और आखिरकार निशांत कुमार की पार्टी के सांगठनिक ढांचे में औपचारिक एंट्री का रास्ता साफ हुआ। हालांकि, जेडीयू के इस वरिष्ठ नेता का मानना है कि पार्टी आज जिस गंभीर आंतरिक संकट और असमंजस के दौर से गुजर रही है, वह काफी हद तक टल सकता था। यदि निशांत कुमार को आज से कम से कम दो साल पहले ही पार्टी की मुख्यधारा में शामिल कर लिया जाता, तो शायद जेडीयू के भीतर आज सत्ता के दो समानांतर केंद्र बनने की नौबत ही नहीं आती और संगठन में अनुशासन पूरी तरह बना रहता।
समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर श्याम रजक का रुख
पार्टी के भीतर मचे इस घमासान के बीच जेडीयू के एक और बेहद प्रभावशाली और दिग्गज नेता श्याम रजक का भी बयान सामने आया है, जो जेडीयू में सबकुछ पूरी तरह ठीक होने का दावा कर रहे हैं। श्याम रजक ने पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी की खबरों को पूरी तरह से खारिज करते हुए बार-बार इस बात को दोहराया है कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के अत्यंत संवेदनशील मुद्दे पर उन्होंने जो भी बयान दिया है, वह पूरी तरह से सही और पार्टी लाइन के अनुरूप है। श्याम रजक का कहना है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता विजय चौधरी और कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा भी उनके इस रुख से पूरी तरह सहमत हैं। उन्होंने मीडिया पर निशाना साधते हुए कहा कि मीडिया के कुछ लोग जानबूझकर पार्टी के भीतर फूट डालने और तरह-तरह की भ्रामक खबरें फैलाने का प्रयास कर रहे हैं।
श्याम रजक ने स्पष्ट किया कि यूसीसी के मुद्दे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केंद्र सरकार को जो विस्तृत पत्र लिखा था, जेडीयू आज भी पूरी तरह से उसी पुराने रुख पर कायम है और उसमें किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं किया गया है। उन्होंने यह भी भरोसा जताया कि पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा की देश के गृह मंत्री अमित शाह से होने वाली मुलाकात के बाद यूसीसी से जुड़े तमाम तकनीकी और राजनीतिक विवाद पूरी तरह से सुलझा लिए जाएंगे और गठबंधन के भीतर सब कुछ पूरी तरह से सामान्य हो जाएगा।
संजय झा का बयान और जेडीयू के अस्तित्व का सवाल
यूसीसी के इस बड़े विवाद के खड़े होने से ठीक पहले, जेडीयू के नवनियुक्त कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा का एक बेहद चौंकाने वाला और चर्चा बटोरने वाला बयान सामने आया था। संजय झा ने अपने बयान में कहा था कि जेडीयू के नाम में 'यू' की जगह अब 'एन' होना चाहिए। संजय झा के इस अचानक आए बयान के पीछे क्या असली मंशा थी? उन्होंने ऐसा बयान क्यों दिया? क्या इसके पीछे जेडीयू के राष्ट्रीय पार्टी बनने की महत्वाकांक्षा थी या फिर पार्टी के भीतर एक बड़े विभाजन या टूट का खतरा मडरा रहा है, जिससे ध्यान भटकाने के लिए यह शिगूफा छोड़ा गया?
इस पूरे गंभीर घटनाक्रम और पार्टी के भीतर चल रहे जबरदस्त मंथन के बीच, जेडीयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और वर्तमान केंद्रीय मंत्री ललन सिंह का पूरी तरह से खामोश रहना भी राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर रहा है। ललन सिंह जैसे कद्दावर और मुखर नेता का इस विवाद पर शांत रहना जेडीयू के भीतर चल रहे गहरे सत्ता संघर्ष की तरफ साफ इशारा करता है। इसी बीच, बिहार के डीजीपी विनय कुमार सहित तीन बेहद वरिष्ठ और महत्वपूर्ण प्रशासनिक अधिकारियों को अचानक एक साथ लंबी छुट्टी पर भेज दिया गया। इस प्रशासनिक फेरबदल को लेकर भी पटना के सत्ता गलियारों में चर्चाओं का बाजार बेहद गर्म है। कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या डीजीपी विनय कुमार ने बिहार के सीएम सम्राट चौधरी की किसी बेहद गोपनीय बातचीत या रणनीति की जानकारी ललन सिंह को लीक कर दी थी, जिसके बाद सरकार ने इतनी बड़ी कार्रवाई की? इन तमाम गंभीर और अनसुलझे सवालों के साये में ही जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और महत्वपूर्ण नेताओं की बैठक पटना में आयोजित हो रही है।
जेडीयू और बीजेपी के बीच खींचतान की असली वजह
इस बेहद अहम बैठक के समाप्त होने के बाद क्या जेडीयू और बीजेपी के बीच पिछले काफी समय से चली आ रही आंतरिक खींचतान और अविश्वास का अंत होगा, या फिर बिहार की राजनीति में कोई बिल्कुल नया और चौंकाने वाला समीकरण उभरकर सामने आएगा, यह तो आने वाला वक्त ही तय करेगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जेडीयू के सभी 85 विधायक, सांसद और मंत्री आज भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व के साथ पूरी मजबूती और एकजुटता से खड़े हैं?
जेडीयू के अंदरूनी मामलों और सांगठनिक संरचना को बेहद करीब से जानने वाले राजनीतिक विश्लेषकों और अंदरूनी सूत्रों की मानें तो, पार्टी के भीतर इस समय गुटबाजी अपने चरम पर है। विशेष रूप से, केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह के करीबी और वफादार नेताओं को संगठन में लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। संजय झा ने जब से पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में नई सांगठनिक टीम का गठन किया है, तब से उन्होंने कई पुराने, समर्पित और जमीनी स्तर पर सक्रिय चेहरों को दरकिनार कर दिया है। संगठन में इस तरह की उपेक्षा के बाद पार्टी के भीतर जबरदस्त असंतोष और बगावती सुर उभरने लगे हैं। इसी असंतोष को दबाने के लिए हाल ही में पार्टी ने अपने कुछ मुखर नेताओं, जैसे छोटू सिंह, के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की है। इसके अतिरिक्त, राजीव रंजन सिंह के बेहद करीबी माने जाने वाले बाहुबली नेता अनंत सिंह द्वारा विधान परिषद (एमएलसी) के चुनावों में जेडीयू के ही आधिकारिक उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ खुली मुहिम चलाना भी इस बड़ी बैठक के मुख्य एजेंडे में शामिल हो सकता है।
जेडीयू के भीतर चल रही इस चौतरफा खेमेबाजी और अनुशासनहीनता का सबसे मूल कारण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का अस्वस्थ होना बताया जा रहा है। चूंकि नीतीश कुमार का स्वास्थ्य पिछले कुछ समय से ठीक नहीं है, इसलिए पार्टी के नेताओं के मन से अब उनके उस सख्त अनुशासन और कड़े नियंत्रण का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है, जिसके दम पर उन्होंने दो दशकों तक जेडीयू को एकजुट रखा था। इसी डर के खत्म होने के साथ ही पार्टी के भीतर अब उत्तराधिकार और वर्चस्व की जंग पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी है।





















