अमेरिकी चेतावनियों और आर्थिक प्रतिबंधों के तमाम दबावों को दरकिनार करते हुए भारत ने एक बार फिर कूटनीतिक स्वायत्तता का स्पष्ट परिचय दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिश्केक में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के साथ आमने-सामने की उच्चस्तरीय बैठक की और दोनों देशों के बीच सहयोग को नई ऊंचाइयां देने की प्रतिबद्धता दोहराई। इस मुलाकात ने दुनिया भर के कूटनीतिक गलियारों में गहरी हलचल मचा दी है, क्योंकि यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब अमेरिका की ओर से ईरान पर लगातार भारी दबाव बनाया जा रहा था और तेहरान के साथ व्यापारिक रिश्ते रखने वाले देशों को गंभीर परिणामों की चेतावनियां दी जा रही थीं।
अमेरिकी प्रशासन लंबे समय से ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रहा है और उसने वैश्विक मंचों पर यह रुख अपनाया है कि जो भी देश ईरान के साथ किसी भी प्रकार का व्यापारिक सौदा करेगा, उसे अमेरिका की नाराजगी का सामना करना पड़ेगा। इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति से मिलकर यह संदेश दे दिया कि भारत अपनी विदेश नीति के मामलों में किसी बाहरी महाशक्ति के दबाव में काम करने वाला नहीं है। इस मुलाकात के तुरंत बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा किए गए संदेश में प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच व्यापार का दायरा और बढ़ाया जाएगा, जो साफ तौर पर यह रेखांकित करता है कि भारत अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को सर्वोपरि रखता है।
द्विपक्षीय बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने मौजूदा क्षेत्रीय हालातों और भू-राजनीतिक स्थिरता पर भी विस्तार से चर्चा की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया कि भारत इस पूरे क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किए जाने वाले हर सकारात्मक प्रयास का समर्थन करता रहेगा। इस उच्चस्तरीय भेंट के बाद एक्स पर किए गए अपने आधिकारिक पोस्ट में प्रधानमंत्री ने लिखा कि बिश्केक में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से मुलाकात के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में भारत और ईरान के बीच चली आ रही पारंपरिक दोस्ती को और अधिक प्रगाढ़ करने पर गंभीर चर्चा हुई तथा व्यापारिक बास्केट का विविधीकरण करने का संकल्प लिया गया।
ईरान के आधिकारिक पक्षों की ओर से भी इस मुलाकात के बाद एक बयान जारी किया गया जिसमें राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने हालिया संघर्ष के दौर में भारत की तरफ से मिले सहयोग और समर्थन के लिए आभार व्यक्त किया। ईरानी पक्ष ने दोहराया कि उनका देश किसी भी तरह के युद्ध के पक्ष में नहीं है और तमाम समस्याओं का समाधान केवल आपसी बातचीत और कूटनीतिक माध्यमों से निकाला जाना चाहिए। इसके साथ ही, ईरान ने वैश्विक मामलों में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका का हवाला देते हुए नई दिल्ली से आग्रह किया कि वह विभिन्न पक्षों के साथ अपने राजनयिक संपर्कों का उपयोग करके क्षेत्र में शांति स्थापना के प्रयासों को आगे बढ़ाए।
ईरान के साथ भारत के रिश्ते केवल कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दोनों संस्कृतियों के बीच सदियों पुराने गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। आज के परिप्रेक्ष्य में ऊर्जा सुरक्षा, परिवहन, क्षेत्रीय संपर्क और व्यापार जैसे कई महत्वपूर्ण रणनीतिक मुद्दे इन दोनों राष्ट्रों के साझा हितों से जुड़े हुए हैं। ईरान मध्य एशिया और उससे आगे के बड़े बाजारों तक पहुंचने के लिए भारत को एक सुरक्षित और सुगम मार्ग प्रदान करता है, जिसका सबसे बड़ा और जीवंत उदाहरण चाबहार बंदरगाह है। भारत काफी लंबे समय से चाबहार के माध्यम से अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों के साथ वैकल्पिक और निर्बाध कनेक्टिविटी विकसित करने में जुटा हुआ है, इसलिए तेहरान के साथ संबंधों में किसी भी प्रकार की नरमी या दूरी भारत के भू-राजनीतिक हितों के अनुकूल नहीं हो सकती है।
यह कूटनीतिक कदम यह भी स्पष्ट करता है कि ईरान के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने का यह कतई मतलब नहीं है कि भारत अमेरिका के खिलाफ किसी खेमेबंदी का हिस्सा बन गया है। वास्तव में, भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, आधुनिक तकनीक, विदेशी निवेश, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी के मोर्चे पर अत्यंत गहरे और मजबूत संबंध हैं। इसके बावजूद नई दिल्ली का रुख यह साफ करता है कि संप्रभुता और राष्ट्रीय हित का स्थान सर्वोपरि है और अमेरिका के साथ मित्रता अपनी जगह है जबकि ईरान, रूस, खाड़ी देशों तथा अन्य पारंपरिक साझेदारों के साथ स्वतंत्र संबंध अपनी जगह कायम रहेंगे।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि यदि इस मोड़ पर अमेरिका के दबाव के आगे घुटने टेक दिए जाते, तो भविष्य में यह दबाव और अधिक बढ़ता जाता और देश की रणनीतिक स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाती। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पेजेश्कियन की इस महत्वपूर्ण मुलाकात ने यह साबित कर दिया है कि भारत अपने आर्थिक और कूटनीतिक हितों को किसी अन्य देश की एकतरफा प्रतिबंध नीतियों के हवाले करने को तैयार नहीं है। इस प्रकार, यह उच्चस्तरीय संवाद केवल दो देशों के बीच व्यापारिक समझौतों का विस्तार नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की दिशा और दशा को तय करने वाला एक बड़ा और निर्णायक कदम है।


















