शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को विपक्ष अपनी बड़ी राजनीतिक जीत मान रहा है। NEET और पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों के बीच इस इस्तीफे ने सबका ध्यान खींचा है। पहली नजर में यह विरोध प्रदर्शनों की एक बड़ी कामयाबी लगती है। लेकिन राजनीति केवल हार और जीत का साधारण गणित नहीं है। किसी भी बड़े फैसले का असर तात्कालिक राजनीतिक नफे-नुकसान से कहीं ज्यादा गहरा होता है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक मंत्री के पद छोड़ने तक सीमित करके देखना अधूरा होगा। व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह समझना जरूरी है कि बड़े जन आंदोलनों के सामने सरकारें किस तरह रिएक्ट करती हैं और यही रिएक्शन अक्सर उस आंदोलन की पूरी दिशा तय कर देता है। इतिहास गवाह है कि किसी भी सत्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा सीधे तौर पर विरोध प्रदर्शन नहीं होता, बल्कि उस विरोध पर शासन की अपनी प्रतिक्रिया होती है।
सर्बिया से शुरू हुई थी प्रतिरोध की यह अनोखी कहानी
इस पूरी राजनीतिक रणनीति की जड़ें तलाशने के लिए हमें 1990 के दशक के आखिरी दौर में सर्बिया जाना होगा। उस समय सर्बिया के राष्ट्रपति स्लोबोदान मिलोशेविच की सत्ता को बेहद शक्तिशाली और अकाट्य माना जाता था। हालांकि उनके खिलाफ अंदरखाने काफी असंतोष था, लेकिन आम जनता का मानना था कि उन्हें लोकतांत्रिक तरीकों से हटाना लगभग असंभव है। इसी निराशा के माहौल के बीच अक्टूबर 1998 में कुछ विश्वविद्यालयी छात्रों ने 'ओत्पोर' नाम से एक नया आंदोलन खड़ा किया। सर्बियाई भाषा में 'ओत्पोर' शब्द का सीधा अर्थ 'प्रतिरोध' यानी रेजिस्टेंस होता है। इस संगठन की शुरुआत मूल रूप से विश्वविद्यालयों पर सरकार के बढ़ते शिकंजे के विरोध में हुई थी। मई 1998 में लाए गए यूनिवर्सिटी लॉ के माध्यम से बेलग्रेड विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और वहां की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए थे। छात्रों ने इसी फैसले के खिलाफ एकजुट होकर ओत्पोर की नींव रखी थी।
जब यूनिवर्सिटी के मुद्दों से आगे बढ़कर बदली आंदोलन की धार
वक्त के साथ इस छात्र संगठन के तेवर और एजेंडे दोनों में बड़ा बदलाव आया। ओत्पोर ने यूनिवर्सिटी से जुड़े स्थानीय और प्रशासनिक मुद्दों को पीछे छोड़ दिया और अपना पूरा ध्यान राष्ट्रपति स्लोबोदान मिलोशेविच को सत्ता से बेदखल करने पर केंद्रित कर दिया। संगठन का स्पष्ट मानना था कि जब तक देश का राजनीतिक ढांचा नहीं बदलता, तब तक अन्य किसी भी मूल समस्या का स्थायी समाधान निकाला जाना संभव नहीं है। लेकिन इन छात्रों के सामने एक बहुत बड़ी व्यावहारिक चुनौती खड़ी थी। उन्हें जल्द ही यह अहसास हो गया कि यदि वे सीधे तौर पर पुलिस या सरकारी मशीनरी से हिंसक टकराव का रास्ता चुनते हैं, तो राज्य अपनी संपूर्ण दमनकारी ताकत का इस्तेमाल करके इस आंदोलन को बहुत आसानी से कुचल देगा। इसलिए उन्होंने आमने-सामने की हिंसा के बजाय एक ऐसी चतुर रणनीति पर काम करना शुरू किया, जिसमें सरकार को उसके अपने ही फैसलों और प्रतिक्रियाओं के कारण भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़े। यही वह वैचारिक मोड़ था जिसने आधुनिक अहिंसक आंदोलनों की सबसे चर्चित रणनीतियों में से एक को जन्म दिया।
क्या होती है डिलेमा एक्शन या दुविधा वाली रणनीति?
ओत्पोर के इन युवा कार्यकर्ताओं ने अमेरिकी राजनीतिक विचारक जीन शार्प के अहिंसक प्रतिरोध के सिद्धांतों से गहरी प्रेरणा ली थी। जीन शार्प का मानना था कि किसी भी सरकार की वास्तविक ताकत केवल सेना, पुलिस या प्रशासन तक सीमित नहीं होती, बल्कि शासन की असली शक्ति अंततः जनता के सहयोग, उसकी सहमति और देश की संस्थाओं के समर्थन पर टिकी होती है। यदि नागरिक बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण तरीकों से अपना समर्थन वापस लेना शुरू कर दें, तो दुनिया की सबसे शक्तिशाली सरकार भी गंभीर दबाव में आ जाती है। इसी वैचारिक पृष्ठभूमि से 'पॉलिटिकल जिउ-जित्सु' का सिद्धांत निकला। इस सिद्धांत के अनुसार यदि कोई सरकार शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल का प्रयोग करती है, तो उसका परिणाम अक्सर उसके अपने खिलाफ चला जाता है। ऐसी संवेदनशील स्थिति में आम जनता की सहानुभूति स्वतः प्रदर्शनकारियों के साथ जुड़ जाती है, सरकार की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े होने लगते हैं और आंदोलन को पहले से कहीं अधिक नैतिक समर्थन मिलने लगता है।
राजनीतिक दुविधा का यह चक्र कैसे काम करता है?
इन्हीं बुनियादी सिद्धांतों से प्रेरित होकर बाद के वर्षों में ओत्पोर और उसके पूर्व सहयोगियों द्वारा स्थापित CANVAS यानी Centre for Applied Nonviolent Action and Strategies ने जिस आधुनिक रणनीति को पूरी दुनिया में लोकप्रिय बनाया, उसे व्यापक रूप से 'डिलेमा एक्शन' के नाम से जाना जाता है। बहुत ही सरल शब्दों में कहें तो डिलेमा एक्शन का मुख्य उद्देश्य सरकार को एक ऐसी राजनीतिक स्थिति में धकेलना होता है जहां उसके पास कोई भी सुगम या सुरक्षित विकल्प न बचे। इस रणनीति के तहत ऐसे अनोखे, शांतिपूर्ण और प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन आयोजित किए जाते हैं जो लोगों का ध्यान बहुत तेजी से अपनी ओर खींचें, मीडिया तथा सोशल मीडिया की सुर्खियों में छा जाएं और सरकार पर तुरंत प्रतिक्रिया देने का भारी दबाव बना दें। इसके बाद सरकार के सामने अमूमन दो ही रास्ते शेष रहते हैं। यदि शासन उस विरोध प्रदर्शन को पूरी तरह नजरअंदाज करता है, तो जनता के बीच यह संदेश जाता है कि सरकार अंदर से कमजोर पड़ रही है और जन दबाव के आगे पस्त हो चुकी है।
हर फैसले में छिपा होता है राजनीतिक जोखिम
इसके विपरीत यदि सरकार उन शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सख्त बल प्रयोग करती है, तो उस पर तानाशाही और दमन का खुला आरोप लग जाता है, जिससे आम लोगों की सहानुभूति सीधे तौर पर आंदोलन के पक्ष में चली जाती है। यानी सरकार कोई भी फैसला करे, दोनों ही परिस्थितियों में उसे भारी राजनीतिक नुकसान उठाने का गंभीर जोखिम उठाना पड़ता है। इसी खूबी के कारण इस अनूठी रणनीति को 'डिलेमा एक्शन' यानी दुविधा पैदा करने वाला कदम कहा जाता है। ओत्पोर ने केवल अपने देश में इस रणनीति का सफल प्रयोग ही नहीं किया, बल्कि समय के साथ इसे एक बेहद प्रभावी और ग्लोबल राजनीतिक मॉडल के रूप में विकसित भी कर डाला। राष्ट्रपति मिलोशेविच के पतन के बाद ओत्पोर के सह-संस्थापक स्र्जा पोपोविच और उनके साथियों ने मिलकर इस दिशा में काम करने वाली संस्था की नींव रखी और दुनिया भर के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया।



















