प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लगातार किए जा रहे विदेश दौरों ने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस विषय की गहराई को समझने के लिए 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' कार्यक्रम में एक विशेष चर्चा आयोजित की गई। इस चर्चा का संचालन इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा ने किया। पैनल में वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता, जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट वैभव सिंह और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पाराशर जैसे दिग्गज शामिल हुए, जिन्होंने इन दौरों के रणनीतिक और कूटनीतिक पहलुओं का विस्तार से विश्लेषण किया।
विपक्ष की अनुपस्थिति और विदेश नीति पर सवाल
कार्यक्रम के दौरान सबसे प्रमुख चर्चा इस बात पर हुई कि क्या विपक्ष वर्तमान सरकार की विदेश नीति पर कोई ठोस विकल्प पेश कर पा रहा है। पैनल ने सवाल उठाया कि सिर्फ आलोचना करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि देश की जनता को यह भी पता चलना चाहिए कि अगर विपक्ष सत्ता में होता तो उसकी वैकल्पिक विदेश नीति क्या होती। चर्चा में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की लंबी विदेश यात्राओं का भी जिक्र हुआ। वक्ताओं ने माना कि जब देश के भीतर कई महत्वपूर्ण विषयों पर राष्ट्रीय बहस चल रही हो, तो एक प्रमुख विपक्षी नेता की सार्वजनिक सक्रियता और निरंतर उपस्थिति आवश्यक होती है। उनकी अनुपस्थिति पर सवाल उठाते हुए पैनल ने कहा कि सरकार की गलतियों को तभी प्रभावी ढंग से गिनाया जा सकता है जब विपक्ष के पास अपना एक स्पष्ट और मजबूत दृष्टिकोण हो।
यूरेनियम समझौता और ऊर्जा सुरक्षा
प्रधानमंत्री के दौरों को ऊर्जा सुरक्षा के नजरिए से भी देखा गया। चर्चा में ऑस्ट्रेलिया के साथ हुए यूरेनियम आपूर्ति समझौते को एक बड़ी रणनीतिक सफलता करार दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की तेजी से बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए यूरेनियम जैसे संसाधनों की सुरक्षित आपूर्ति बेहद जरूरी है। पैनल के सदस्यों ने तर्क दिया कि अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना भारत की दीर्घकालिक विदेश नीति का अभिन्न हिस्सा है और इसी दिशा में मोदी सरकार निरंतर कदम उठा रही है। यह समझौता न केवल ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करता है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत के द्विपक्षीय संबंधों को भी एक नई मजबूती प्रदान करता है।
वैश्विक संबंधों का बढ़ता दायरा
चर्चा के दौरान यह बात उभरकर सामने आई कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपनी कूटनीतिक पहुंच को काफी व्यापक बनाया है। पहले जो देश भारत की विदेश नीति के केंद्र में नहीं थे, आज उनके साथ भारत के संबंध अधिक प्रगाढ़ हो गए हैं। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, पश्चिम एशिया के देशों और इजराइल जैसे सहयोगियों के साथ बढ़ते संबंधों को इसका ज्वलंत उदाहरण माना गया। वक्ताओं ने कहा कि बदलती दुनिया में भारत ने अब अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए बहुपक्षीय संबंधों को नई दिशा दी है। इससे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज और अधिक मुखर हुई है।
विविध क्षेत्रों में भारत का बढ़ता प्रभाव
विदेश नीति के अन्य आयामों पर बात करते हुए पैनल ने रक्षा, कृषि, तकनीक और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भारत की बढ़ती भूमिका पर प्रकाश डाला। इजराइल के साथ तकनीकी साझेदारी को भारत के लिए काफी लाभकारी बताया गया। इसी तरह, पश्चिम एशिया के देशों के साथ लगातार संवाद और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की सक्रिय भागीदारी को देश की उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में देखा जा रहा है। इन सभी सहयोगों का मकसद भारत के भीतर के विकास कार्यों को बाहरी संसाधनों और तकनीकों से जोड़ना है।
पाकिस्तान पर स्पष्ट दृष्टिकोण
आखिर में, पाकिस्तान के साथ संबंधों पर भी पैनल ने अपनी राय रखी। इस मामले में सरकार का रुख काफी सख्त और स्पष्ट रहा है। आतंकवाद को कूटनीति के केंद्र में रखते हुए यह साफ किया गया कि बिना स्पष्ट आधार के बातचीत संभव नहीं है। कुल मिलाकर 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' की यह चर्चा इस निष्कर्ष पर पहुंची कि विदेश नीति महज दौरों का नाम नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र के हितों को सुरक्षित रखने और वैश्विक स्तर पर भारत का प्रभाव बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम है। पैनल के अनुसार, यह नीति देश को एक लंबी अवधि का रणनीतिक लाभ देने वाली है।











