राजनीति के गलियारों में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के हालिया बयान इन दिनों चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आलोचना करना कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा रहा है, लेकिन कई मौकों पर उनके बयान विवादों में घिर जाते हैं और उनकी राजनीतिक छवि पर भी असर डालते हैं। अतीत में नरेंद्र मोदी को लेकर की गई उनकी कई टिप्पणियां राजनीतिक रूप से पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हुई हैं, जिनका असर चुनावी नतीजों में साफ देखने को मिला था।
अतीत के विवादित बयान और चुनावी नतीजे
प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत आलोचना को लेकर राहुल गांधी कई बार असहज स्थिति में फंसे हैं। वर्ष 2018 के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री के खिलाफ एक विवादास्पद टिप्पणी की थी, जिसका खामियाजा पार्टी को 2019 के आम चुनावों में भुगतना पड़ा था। इसके अलावा, 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले भी उन्होंने भाजपा पर निशाना साधते हुए एक तीखा बयान दिया था। इन राजनीतिक बयानों के परिणाम स्वरूप चुनावी मैदान में कांग्रेस पार्टी और उसके घटक दलों को भारी सीटों के नुकसान का सामना करना पड़ा था। इसके अलावा साल 2017 में उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक स्तर पर वायरल हुआ था, जिसमें एक काल्पनिक मशीन का जिक्र करते हुए आलू से सोना बनाने की बात कही गई थी। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया था कि वह तंज कस रहे थे, लेकिन विरोधी राजनीतिक दलों ने इस प्रसंग को खूब उछाला और आज भी सोशल मीडिया पर उसका मजाक उड़ाया जाता है।
स्कूलों में दलित भेदभाव और चाय की दुकानों का जिक्र
हाल ही में पुणे में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गांधी ने दलितों के साथ हो रहे भेदभाव के मुद्दे पर विस्तार से अपनी बात रखी। उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण की घटना का जिक्र करते हुए वे मूल विषय से आगे निकल गए। उन्होंने दावा किया कि आज भी देश के स्कूलों में दलित बच्चों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता है और उनसे शौचालय साफ कराने जैसे काम करवाए जाते हैं। इसी कड़ी में उन्होंने यह भी कहा कि चाय की दुकानों पर भी दलितों के लिए अलग बर्तन रखे जाते हैं और उन्हें डिस्पोजेबल गिलासों में चाय दी जाती है, जबकि सवर्ण वर्ग के लोगों को कांच या चीनी मिट्टी के वाशेबल गिलासों में चाय परोसी जाती है। उनके इस दावे पर समाज के विभिन्न वर्गों से तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं और जानकारों का मानना है कि इस तरह के जमीनी वास्तविकताओं से परे उदाहरण उनकी हास्यास्पद स्थिति पैदा करते हैं।
मनुस्मृति को लेकर उपजा नया विवाद
राहुल गांधी की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं, बल्कि करीब दो हजार साल पुरानी मनुस्मृति पर दिए गए उनके बयानों ने भी सनातन समाज को नाराज कर दिया है। जानकारों का कहना है कि मनुस्मृति की रचना प्राचीन सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार हुई थी, जहां वर्ण व्यवस्था और आश्रम व्यवस्था का प्रावधान था और उस दौर की स्थितियां आज के आधुनिक युग से पूरी तरह भिन्न थीं। आज के समय में हर जाति और धर्म के लोग तमाम तरह के रोजगार और व्यवसायों से जुड़े हैं तथा महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं। इसके बावजूद राजनीतिक नफा-नुकसान के फेर में विरोधी दल आज भी सनातनी व्यवस्थाओं को निशाना बनाते हैं, ताकि दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके। विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की रणनीतियों से उल्टा बहुसंख्यक समाज और सनातनी वर्ग और अधिक एकजुट हो जाता है, जिसका राजनीतिक लाभ अंततः भाजपा को मिलता रहा है।
सवर्णों और सनातनियों की गहरी नाराजगी
भले ही आज की तारीख में मनुस्मृति की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए जाते हों, लेकिन इसके साथ देश के सवर्ण और सनातनी समाज की गहरी भावनाएं जुड़ी हुई हैं। विशेषकर ब्राह्मण समाज इन बयानों को लेकर कांग्रेस नेता से बेहद खफा है और भारतीय जनता पार्टी ने इस मुद्दे को आक्रामक तरीके से उठाना शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा और सांसद सुधांशु त्रिवेदी समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने इस बात के लिए राहुल गांधी की कड़ी आलोचना की है। भाजपा का सीधा आरोप है कि कांग्रेस नेता केवल हिंदू धर्म और उसकी धार्मिक ग्रंथों को ही अपने निशाने पर रखते हैं, जबकि अन्य धर्मों की पितृसत्तात्मक और रूढ़िवादी प्रथाओं पर वे हमेशा चुप्पी साधे रहते हैं। पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि यह सब समाज को खंडित करने और देश की सांस्कृतिक विरासत को धूमिल करने के किसी सुनियोजित एजेंडे का हिस्सा है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की तीखी चेतावनी
इस पूरे घटनाक्रम के बीच धार्मिक जगत से भी महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के मतभेद और वैचारिक टकराव किसी से छिपे नहीं हैं। चाहे वह योग को बढ़ावा देने का मामला हो, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का विरोध करना हो या फिर अयोध्या में राम मंदिर के अधूरे निर्माण के दौरान प्राण प्रतिष्ठा को लेकर आपत्ति जताना हो, वे लगातार सत्ता पक्ष की नीतियों की मुखालफत करते रहे हैं। धार्मिक मामलों में राजनीतिक हस्तक्षेप का उनका कड़ा विरोध अक्सर भाजपा के लिए असहज स्थितियां पैदा करता रहा है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के साथ उनकी बढ़ती नजदीकियां भी राजनीतिक गलियारों में खासी चर्चा का विषय बनी हुई हैं।



















