भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत होती स्थिति और उसके राजनीतिक प्रभावों को लेकर सियासी गलियारों में बहस तेज हो गई है। देश की आर्थिक वृद्धि दर 7.8 फीसदी पर पहुंचने के बाद इसे एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि विपक्षी दलों की तरफ से लगातार महंगाई, रोजगार के अवसरों और आम नागरिकों की आय को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इसी पूरे परिदृश्य पर एक टेलीविजन चर्चा के दौरान विस्तार से मंथन किया गया कि क्या ये बेहतर आर्थिक आंकड़े राजनीतिक मोर्चे पर सरकार के लिए मददगार साबित हो रहे हैं और क्या इससे देश के राजनीतिक माहौल में कोई बदलाव आया है।
निःशुल्क राशन योजना और आर्थिक सुरक्षा
इस पूरी चर्चा की शुरुआत देश के करीब 81 करोड़ लोगों को मिलने वाले मुफ्त राशन और हालिया आर्थिक आंकड़ों से हुई। कार्यक्रम में शामिल विशेषज्ञों ने अपनी बात रखते हुए कहा कि यदि कोई पक्ष सरकारी आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, तो उसे यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि आंकड़ों में कहां कमी है और इसके विकल्प के रूप में क्या कदम उठाए जाने चाहिए थे। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून का हवाला देते हुए यह बताया गया कि देश की शहरी आबादी के 50 प्रतिशत हिस्से और ग्रामीण आबादी के 75 प्रतिशत हिस्से को रियादती दरों पर या पूरी तरह मुफ्त खाद्यान्न मुहैया कराने का कानूनी प्रावधान किया गया है।
विशेषज्ञों ने यह भी तर्क दिया कि जब किसी परिवार को अपने भोजन की बुनियादी चिंता से राहत मिलती है, तो वे अपनी बचा हुआ धन बच्चों की शिक्षा, कपड़े, दूध, फल, सब्जियों और अन्य जरूरी जरूरतों पर खर्च कर पाते हैं। इसी से देश की आर्थिक गतिविधियों का पूरा चक्र आगे बढ़ता है और बाजार में मांग बनी रहती है।
7.8 प्रतिशत की विकास दर और सेक्टरवार आंकड़े
चर्चा के दौरान 7.8 प्रतिशत की मजबूत आर्थिक वृद्धि दर का मुद्दा बेहद अहम रहा। जानकारों का कहना था कि यदि देश की अर्थव्यवस्था को सुस्त या मृतप्राय करार दिया जा रहा है, तो आलोचकों को यह भी बताना चाहिए कि वे किस पैमाने के आधार पर यह आकलन कर रहे हैं। इस बात पर भी गौर किया गया कि देश की आर्थिक वृद्धि लगातार कई तिमाहियों से 7 प्रतिशत या उससे अधिक के स्तर पर बनी हुई है।
विभिन्न क्षेत्रों के आंकड़ों का जिक्र करते हुए बताया गया कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 9.2 प्रतिशत, बिजली, गैस और जल आपूर्ति में 8.9 प्रतिशत, निर्माण क्षेत्र में 7.7 प्रतिशत, व्यापार, होटल, परिवहन और संचार सेवाओं में 8.5 प्रतिशत तथा वित्तीय, रियल एस्टेट और आईटी पेशेवर सेवाओं में करीब 12 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके अलावा, निजी निवेश में 12 प्रतिशत और ऋण वृद्धि में 18.3 प्रतिशत की उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई है।
बुनियादी ढांचे का विकास और महिला भागीदारी
देश में आर्थिक गतिविधियों की गति को समझाने के लिए बुनियादी ढांचे यानी इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार का उदाहरण विशेष रूप से दिया गया। चर्चा में रेखांकित किया गया कि वर्ष 2014 तक देश भर में केवल 74 हवाई अड्डे हुआ करते थे, जिनकी संख्या अब बढ़कर लगभग 157 के आसपास पहुंच चुकी है। इसके साथ ही, राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण की दैनिक रफ्तार 11 किलोमीटर प्रति दिन से बढ़कर करीब 36 किलोमीटर प्रति दिन हो गई है।
देश के ग्रामीण और शहरी इलाकों में बिजली की उपलब्धता पहले के मुकाबले काफी बेहतर हुई है, जो पहले औसतन 11 से 12 घंटे हुआ करती थी और अब बढ़कर औसतन 22 घंटे से अधिक हो गई है। इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के दौरान कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी में लगभग 23 से 24 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जिसे देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत माना गया है।
बदलते हालात और राजनीतिक नफा-नुकसान
चर्चा में अंततः यह बात सामने आई कि इन मजबूत आर्थिक आंकड़ों के सामने आने के बाद सरकार के पक्ष में राजनीतिक माहौल कुछ सुधरा हुआ दिखाई दे रहा है। एक समय ऐसा था जब सरकार पर विभिन्न मोर्चों पर दबाव और नकारात्मक चर्चाओं का माहौल था, लेकिन आर्थिक विकास के इन सकारात्मक आंकड़ों ने उस तस्वीर को काफी हद तक बदला है।
हालांकि, विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि राजनीति कभी एक जैसी नहीं रहती और हालात तेजी से बदलते हैं। राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने के लिए जमीनी चुनौतियों और विरोधाभासों का सही ढंग से प्रबंधन करना बेहद जरूरी होता है। इस पूरी चर्चा का निष्कर्ष यही निकला कि बेहतर आर्थिक आंकड़ों ने सरकार को फिलहाल राजनीतिक राहत जरूर दी है, लेकिन भविष्य का रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि इन परिस्थितियों को किस प्रकार संभाला जाता है।





















