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हिमाचल विधानसभा में राज्य विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक 2026 पास, कर्ज संकट पर बोले मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खूराजनीति
2 सित॰ 2026, 8:06 pm (1 घंटे पहले)· 2

हिमाचल विधानसभा में राज्य विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक 2026 पास, कर्ज संकट पर बोले मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू

हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने 6 राज्य विश्वविद्यालयों में वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता लाने के लिए संशोधन विधेयक पारित किया, वहीं मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने प्रदेश के कर्ज प्रबंधन पर अपनी बात रखी।

हिमाचल प्रदेश की कानून व्यवस्था और शैक्षणिक सुधारों की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए राज्य विधानसभा ने 'हिमाचल प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2026' को सर्वसम्मति से पारित कर दिया है। इस नए कानून के जरिए प्रदेश में संचालित 6 राज्य विश्वविद्यालयों से संबंधित कानूनों में बड़े प्रशासनिक और वित्तीय बदलाव किए गए हैं। विधेयक का मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में पारदर्शिता लाना, वित्तीय अनुशासन कायम करना और जवाबदेही तय करना है। कानून पास होने के बाद सदन को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने स्पष्ट किया कि सरकार का इरादा विश्वविद्यालयों के कामकाज में अनावश्यक दखल देना नहीं, बल्कि जनता के पैसे के सही इस्तेमाल पर नजर रखना है।

विश्वविद्यालयों में भर्ती और वित्तीय फैसलों पर रहेगी पैनी नजर

पास किए गए संशोधन विधेयक के तहत विश्वविद्यालयों के वित्तीय और प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने के लिए नए नियम तय किए गए हैं। अब विश्वविद्यालयों में नए पदों के सृजन, नियुक्तियों, पदोन्नति के मामलों और वेतन-भत्तों से जुड़े फैसलों पर राज्य सरकार की निगरानी पहले से अधिक रहेगी। इन सभी वित्तीय और प्रशासनिक मामलों को अंतिम मंजूरी के लिए भेजने से पहले विश्वविद्यालय की वित्त समिति के सामने रखना अनिवार्य होगा। इस वित्त समिति में राज्य के वित्त विभाग की सीधी और महत्वपूर्ण भूमिका होगी। शिक्षकों तथा अन्य कर्मचारियों की पारदर्शी भर्ती के लिए विधिवत चयन समितियों का गठन किया जाएगा और निर्धारित नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाएगा।

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कुलपति, कार्यकारी परिषद और कुलाधिपति के अधिकार तय

संशोधन विधेयक में विश्वविद्यालय के शीर्ष अधिकारियों और निकायों की जिम्मेदारियों को भी स्पष्ट रूप से विभाजित किया गया है। कुलपति विश्वविद्यालय के मुख्य कार्यकारी और शैक्षणिक प्रमुख के रूप में संस्थान के दैनिक कामकाज और अनुशासन की निगरानी करेंगे। किसी भी आपात स्थिति में फैसले लेने का तत्काल अधिकार कुलपति के पास रहेगा, हालांकि बाद में सक्षम प्राधिकारी से इसकी औपचारिक मंजूरी लेना जरूरी बनाया गया है। दूसरी ओर, विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद सामान्य प्रशासन और परिसंपत्तियों के प्रबंधन का काम देखेगी। वित्त समिति मुख्य रूप से विश्वविद्यालय के बजट, आय-व्यय के खातों और ऑडिट रिपोर्ट की विस्तृत समीक्षा करेगी। यदि किसी विषय पर वित्त समिति और कार्यकारी परिषद के बीच सहमति नहीं बनती है, तो मामला कुलाधिपति के पास भेजा जाएगा। राज्य सरकार के परामर्श के बाद कुलाधिपति द्वारा लिया गया निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होगा।

कर्ज के बोझ और वित्तीय स्थिति पर बोले मुख्यमंत्री सुक्खू

विधेयक पर चर्चा के दौरान प्रदेश की आर्थिक स्थिति और बढ़ते कर्ज के मुद्दे पर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने पिछली सरकार की वित्तीय नीतियों की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि विकास कार्यों के लिए हर सरकार को कर्ज लेना पड़ता है, लेकिन वर्तमान प्रशासन पर पुराना कर्ज चुकाने का भारी वित्तीय दबाव बना हुआ है। उन्होंने सदन में आंकड़े प्रस्तुत करते हुए बताया कि हिमाचल प्रदेश की वार्षिक कर्ज लेने की कानूनी सीमा 9,000 करोड़ रुपये है, जबकि हर साल राज्य को पुराने कर्ज की किश्तों और ब्याज के रूप में लगभग 11,000 करोड़ रुपये चुकाने पड़ रहे हैं। इस अंतर को पूरा करने के लिए सरकार को अपनी राज्य ट्रेजरी से हर साल लगभग 2,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि पूर्व भाजपा सरकार के दौरान राज्य के संसाधनों का उचित प्रबंधन नहीं हुआ, जिसका असर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ा।

लॉटरी, भांग की खेती और बीबीएमबी अधिकारों पर सरकार का रुख

सदन में विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने लॉटरी और भांग की खेती जैसे मुद्दों पर भी अपनी सरकार की स्थिति साफ की। उन्होंने कहा कि राज्य में लॉटरी व्यवस्था शुरू करने पर विपक्ष का विरोध पूरी तरह से बेबुनियाद है, क्योंकि सरकार ने किसी भी नागरिक पर लॉटरी टिकट खरीदने का कोई दबाव नहीं डाला है। यह पूरी तरह से नागरिक की अपनी इच्छा पर निर्भर है। वहीं नियंत्रित भांग की खेती के मुद्दे पर मुख्यमंत्री ने कहा कि इस विषय की जांच के लिए गठित विशेष सेलेक्ट कमेटी में विपक्ष के प्रतिनिधि भी शामिल हैं, इसलिए इस पर अनावश्यक राजनीति करने के बजाय रचनात्मक सहयोग देना चाहिए। इसके अलावा मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने भाखड़ा ब्यास प्रबंध बोर्ड यानी बीबीएमबी में हिमाचल प्रदेश के जायज हक का मुद्दा उठाते हुए दोहराया कि राज्य सरकार अपने अधिकारों के लिए कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर निरंतर संघर्ष करती रहेगी।

सवाल-जवाब

विधानसभा में कौन सा विधेयक पास हुआ है?
हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने 'हिमाचल प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2026' पास किया है।
इस संशोधन विधेयक से कितने विश्वविद्यालयों पर असर पड़ेगा?
यह कानून हिमाचल प्रदेश के 6 राज्य विश्वविद्यालयों पर लागू होगा।
हिमाचल प्रदेश पर सालाना कर्ज चुकाने का कितना बोझ है?
हिमाचल प्रदेश की कर्ज लेने की सीमा 9,000 करोड़ रुपये है, जबकि हर साल करीब 11,000 करोड़ रुपये कर्ज चुकाने में जा रहे हैं।
वित्त समिति और कार्यकारी परिषद में विवाद होने पर किसका फैसला अंतिम होगा?
दोनों निकायों के बीच मतभेद की स्थिति में मामला कुलाधिपति के पास जाएगा, जिनका फैसला राज्य सरकार की सलाह के बाद अंतिम होगा।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·31 मिनट पहले

यह विधाई संशोधन उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रशासनिक पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन लाने की दिशा में एक कड़ा कदम है। विश्वविद्यालयों के वित्तीय फैसलों में राज्य के वित्त विभाग की सीधी भागीदारी से सार्वजनिक धन के दुरुपयोग पर लगाम कसेगी। हालांकि, इस तरह के सख्त सरकारी नियंत्रण से शैक्षणिक स्वायत्तता पर क्या असर पड़ेगा, इस पर भविष्य में कानूनी और अकादमिक स्तर पर बहस होना तय है।

Rohan Verma@rohan-verma·30 मिनट पहले

करण मल्होत्रा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह ध्यान देना होगा कि जब राज्य सरकारें विश्वविद्यालयों के बजट और नियुक्तियों में वित्त विभाग के जरिए सीधा दखल देती हैं, तो प्रशासनिक कसावट के साथ-साथ राजनीतिक और प्रशासनिक खींचतान बढ़ने का जोखिम भी पैदा हो जाता है। विशेषकर वित्त समिति और कार्यकारी परिषद के बीच गतिरोध की स्थिति में कुलाधिपति और सरकार के पास अंतिम अधिकार जाना, उच्च शिक्षण संस्थानों के रोजमर्रा के कामकाज में बाहरी हस्तक्षेप को बढ़ावा दे सकता है, जिस पर आने वाले दिनों में अकादमिक हलकों से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है।

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