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सड़कों पर उबले युवा और मायावती की खामोशी, क्या 2027 से पहले खत्म हो रहा है बहुजन समाज पार्टी का वजूद?राजनीति
22 जुल॰ 2026, 8:52 pm (96 दिन पहले)· 2

सड़कों पर उबले युवा और मायावती की खामोशी, क्या 2027 से पहले खत्म हो रहा है बहुजन समाज पार्टी का वजूद?

नीट विवाद और युवाओं के गुस्से के बीच अखिलेश यादव और राहुल गांधी लगातार सड़क पर उतरकर समर्थन जुटा रहे हैं. दूसरी तरफ, मायावती और बहुजन समाज पार्टी की जमीनी स्तर से बढ़ती दूरी के कारण उनका पारंपरिक दलित वोट बैंक तेजी से चंद्रशेखर आजाद जैसे आक्रामक नेताओं की ओर खिसक रहा है.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, क्योंकि राज्य 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारी कर रहा है. आजकल सड़क पर होने वाले विरोध प्रदर्शन राजनीति का मुख्य केंद्र बन गए हैं. नीट परीक्षा विवाद को लेकर देशभर के छात्र जंतर-मंतर से लेकर हर जगह प्रदर्शन कर रहे हैं. इस गुस्से का फायदा उठाने के लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव तुरंत मैदान में उतर गए हैं. इसके विपरीत, बहुजन समाज पार्टी, जो कभी इस राज्य में एकतरफा राज करती थी, जमीनी स्तर से पूरी तरह गायब है. इस खामोशी के कारण उनके पुराने समर्थक भी पार्टी के भविष्य पर सवाल उठा रहे हैं और सोच रहे हैं कि क्या राजनीति की गर्मी से परेशान होकर हाथी अब किसी पेड़ के नीचे बैठ गया है.

सियासी गर्मी के बीच हाथी की खामोशी

उत्तर प्रदेश में इस समय राजनीतिक माहौल पूरी तरह से गरमाया हुआ है. नीट परीक्षा में धांधली के आरोपों से लेकर बेरोजगारी जैसी बड़ी समस्याओं ने युवाओं को एकजुट कर दिया है. लखनऊ से लेकर दिल्ली की सड़कों तक बड़े पैमाने पर आंदोलन हो रहे हैं. युवाओं में इस बात को लेकर भारी निराशा है कि उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है. जनता के इस मूड को भांपते हुए राहुल गांधी और अखिलेश यादव सड़क पर उतरकर छात्रों का पूरा समर्थन कर रहे हैं. उनकी यह सक्रियता मतदाताओं के बीच एक मजबूत संदेश भेज रही है. दूसरी तरफ, बहुजन समाज पार्टी और उसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती इन अहम जमीनी आंदोलनों में कहीं नजर नहीं आ रही हैं. राजनीति के जानकार और आम नागरिक यह सवाल पूछ रहे हैं कि जनता के संघर्ष के इस महत्वपूर्ण समय में पार्टी का नेतृत्व आखिर कहां है.

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लगातार गिरता चुनावी ग्राफ

मायावती ने चार बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली है. उन्होंने राज्य में दलित और बहुजन राजनीति के सबसे बड़े चेहरे के रूप में अपनी मजबूत पहचान बनाई. उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता 2007 के विधानसभा चुनाव में मिली थी, जब उन्होंने अपने दम पर बहुजन समाज पार्टी को पूर्ण बहुमत दिलाया था. इस ऐतिहासिक जीत को सोशल इंजीनियरिंग का एक बेहतरीन उदाहरण माना गया था, जिसने अलग-अलग समुदायों को एक मंच पर ला दिया. लेकिन, पिछले एक दशक के चुनावी आंकड़े पार्टी के लगातार पतन की एक डरावनी तस्वीर पेश करते हैं. यह गिरावट 2012 में सत्ता से बाहर होने के साथ शुरू हुई. 2017 के राज्य चुनावों तक आते-आते पार्टी केवल 19 सीटों पर सिमट गई. 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हालात और भी खराब हो गए, जब पार्टी इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई. उस चुनाव में पार्टी केवल एक सीट जीत सकी और उसका वोट शेयर गिरकर महज 12.88 प्रतिशत रह गया.

पार्टी संगठन को सबसे बड़ा झटका 2024 के लोकसभा चुनावों में लगा. बहुजन समाज पार्टी के नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया. पार्टी को उम्मीद थी कि इससे उनकी खोई हुई जमीन वापस मिलेगी, लेकिन नतीजा पूरी तरह से निराशाजनक रहा. पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई और उसका कुल वोट शेयर 10 प्रतिशत के अहम आंकड़े से भी नीचे खिसक गया. लगातार मिल रही इन हारों ने पार्टी के राजनीतिक अस्तित्व पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

कार्यकर्ताओं से दूरी बनाने का नुकसान

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बहुजन समाज पार्टी का मौजूदा संकट काफी हद तक उसका अपना पैदा किया हुआ है. इसकी सबसे बड़ी वजह पार्टी का अपने मूल वोट बैंक से कटाव है. पिछले कुछ वर्षों में मायावती ने अपनी राजनीतिक गतिविधियों को केवल लखनऊ या दिल्ली के बंद कमरों में होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित कर दिया है. सड़क की लड़ाई, सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन और बड़े जन आंदोलनों से दूर रहने की इस रणनीति ने पार्टी के कैडर को बहुत निराश किया है. जिस राजनीतिक संगठन को उसके संस्थापक कांशीराम ने गांव-गांव जाकर बैठकों और जमीनी संघर्ष की नींव पर खड़ा किया था, वह आज अपने ही कार्यकर्ताओं से ठीक से संवाद नहीं कर पा रहा है. इस सीधे संपर्क की कमी के कारण पारंपरिक समर्थक संकट के समय खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं.

एक नए दलित नेतृत्व का उभार

बहुजन समाज पार्टी की इस निष्क्रियता से जो राजनीतिक खालीपन पैदा हुआ है, उसे नए और आक्रामक नेता तेजी से भर रहे हैं. आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद खास तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो रहे हैं. जाटव और दलित युवाओं के बीच उनकी अपील बहुत तेजी से बढ़ी है. 2024 के लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर आजाद ने बिना किसी बड़े राजनीतिक गठबंधन के नगीना संसदीय सीट से चुनाव लड़ा. सिर्फ अपने जमीनी संपर्क के दम पर उन्होंने 1.5 लाख से अधिक वोटों के भारी अंतर से जीत हासिल की. उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी दोनों के मजबूत उम्मीदवारों को बड़े अंतर से हराया.

यह शानदार जीत मतदाताओं की पसंद में एक साफ बदलाव दिखाती है. दलित युवा अब खुले तौर पर एक ऐसे आक्रामक और जमीनी नेता की तलाश कर रहे हैं, जो सड़क पर उनके कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो सके. चंद्रशेखर आजाद लगातार संसद के अंदर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं. इतना ही नहीं, हाल ही में दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्रों पर हुए लाठीचार्ज के बाद वह तुरंत संसद भवन में धरने पर बैठ गए. उनके इस कदम ने युवा पीढ़ी के बीच एकजुटता का एक बहुत मजबूत संदेश भेजा है.

दो ध्रुवों वाली राजनीति और 2027 की राह

आने वाले 2027 के विधानसभा चुनावों को मायावती और उनकी राजनीतिक विरासत के लिए करो या मरो की लड़ाई माना जा रहा है. उत्तर प्रदेश की राजनीति अब पूरी तरह से दो ध्रुवों में बंट चुकी है. एक तरफ भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला मजबूत एनडीए गठबंधन है, और दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का इंडिया ब्लॉक है. जब भी बहुजन समाज पार्टी इस बंटे हुए माहौल में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला करती है, तो मतदाता उसे मुख्य मुकाबले से बाहर मान लेते हैं. नतीजतन, उनका पारंपरिक वोट बैंक अपना वोट बेकार जाने से बचाने के लिए भारतीय जनता पार्टी या समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन की ओर शिफ्ट हो जाता है.

इसके अलावा, अखिलेश यादव ने अपनी पीडीए रणनीति को बहुत सफलतापूर्वक लागू किया है, जो पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एक साथ लाने पर केंद्रित है. यह मास्टरस्ट्रोक वोटों को एकजुट करने में इतना कारगर साबित हुआ है कि असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता भी भविष्य में समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन के साथ आने की सोच रहे हैं. अगर मायावती 2027 से पहले अपने कैडर में नया जोश भरने और अपनी जमीनी रणनीति को बदलने में विफल रहती हैं, तो महत्वपूर्ण जाटव वोट बैंक चंद्रशेखर आजाद और इंडिया ब्लॉक के बीच स्थायी रूप से बंट सकता है.

हालांकि मायावती ने हाल ही में सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के नारे के तहत सम्मेलनों का आयोजन करके और ब्राह्मणों तथा अन्य जातियों को टिकट बांटकर 2007 के अपने सफल सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले को फिर से जिंदा करने की कोशिश की है. लेकिन मौजूदा माहौल में इस रणनीति की सफलता पर गहरा संदेह बना हुआ है. ऐसे दौर में जहां राजनीतिक लड़ाइयां सड़क से लेकर संसद तक पूरी आक्रामकता के साथ लड़ी जाती हैं, सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बहुजन समाज पार्टी अपनी खोई हुई सियासी जमीन वापस पा सकेगी, या फिर वह उत्तर प्रदेश के चुनावी नक्शे से पूरी तरह गायब हो जाएगी.

सवाल-जवाब

बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में अपना जनाधार क्यों खो रही है?
पार्टी अपने जमीनी कार्यकर्ताओं से कट चुकी है और नेतृत्व ने सड़क पर संघर्ष करने के बजाय खुद को केवल बंद कमरों की प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित कर लिया है.
2024 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने कितनी सीटें जीतीं?
पार्टी ने उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा था, लेकिन वह एक भी सीट नहीं जीत पाई और उसका वोट शेयर 10 प्रतिशत से भी नीचे गिर गया.
दलित मतदाताओं के लिए नए राजनीतिक विकल्प के रूप में कौन उभर रहा है?
आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद सड़क पर उतरकर युवाओं के साथ खड़े हो रहे हैं, जिससे वह दलित युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पीडीए रणनीति क्या है?
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा बनाई गई पीडीए रणनीति पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यक समुदायों को एक साथ जोड़ने पर केंद्रित है.
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