बाराबंकी मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित महाभारत काल से जुड़ा पौराणिक देववृक्ष पारिजात इन दिनों शिव भक्तों के लिए भारी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इस ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहर पर खिले स्वर्ण आभा वाले सुंदर फूल पर्यटकों का मन मोह रहे हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि यह पुष्प भगवान शिव को अत्यंत प्रिय हैं, जिसके चलते सावन के इस पवित्र महीने में इन्हें शिवलिंग पर चढ़ाने के लिए श्रद्धालु खासे उत्सुक नजर आ रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव को अर्पित किए जाने वाले पारिजात के इन फूलों को घर में संभाल कर रखने से बरकत होती है और धन-धान्य में वृद्धि होती है।
लगभग चार महीने के लंबे पतझड़ के दौर के बाद इस पेड़ पर पहले हरी-भरी पत्तियां फूटीं और अब हजारों की संख्या में सुनहरे फूलों का दीदार हो रहा है। ये मनमोहक फूल भगवान लोधेश्वर के दर्शन करने के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को पूरी तरह मंत्रमुग्ध कर रहे हैं। यहां पहुंचने वाले पर्यटक इन फूलों के साथ अपनी तस्वीरें और सेल्फी लेते हुए भी दिखाई दे रहे हैं। कई लोग इन फूलों को अपने साथ घर ले जाने का प्रयास भी करते हैं, क्योंकि स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक इन्हें पास रखने से मानसिक शांति मिलती है और समृद्धि की प्राप्ति होती है, जिसे पाने के लिए लोग काफी उत्सुक रहते हैं।
इस मंदिर और वृक्ष के पुजारी भरत दास ने इस पौधे के पौराणिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह वही पारिजात वृक्ष है जिसकी उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान निकले चौदह रत्नों में से एक के रूप में हुई थी। उनके अनुसार, महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान अर्जुन इसे स्वर्ग लोक से अपनी माता कुंती के लिए लेकर आए थे और यहीं इसकी स्थापना की थी। पुजारी भरत दास का यह भी कहना है कि माता कुंती ने इन्हीं पारिजात के फूलों से भगवान शिव की विधिवत आराधना की थी, जिसके प्रतापस्वरूप पांडवों को महाभारत के भीषण युद्ध में विजय हासिल हुई थी।
इस ऐतिहासिक पेड़ के संरक्षण और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर जिला वन अधिकारी आकाश दीप बाधवान ने जानकारी दी कि बाराबंकी जिले में मौजूद यह पारिजात वृक्ष पौराणिक लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। सावन के महीने में यहां आने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए, पर्यटकों और दर्शनार्थियों की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखने के लिए क्षेत्रीय वन अधिकारी को आवश्यक निर्देश दिए जा चुके हैं।
पारिजात का यह पेड़ न केवल जैव विविधता के दृष्टिकोण से बल्कि आम जनता की गहरी आस्था के कारण भी काफी अहमियत रखता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए इस वृक्ष के महत्व और इतिहास की जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए विभिन्न स्थानों पर सूचना बोर्ड या साइनेज लगाए गए हैं। वन विभाग लगातार इस पौराणिक धरोहर की देखभाल में जुटा हुआ है और नेशनल बोटैनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी एनबीआरआई के वैज्ञानिकों के सहयोग से इस प्राचीन वृक्ष का समय-समय पर उपचार भी किया जाता है ताकि यह सुरक्षित रह सके।



















