मौत के बाद अब खाद बनेगा इंसानी शरीर, ऑस्ट्रेलिया के इस राज्य ने दी अनोखी कानूनी मंजूरीसोने की चाल 4,000 डॉलर के पास अटकी, सिस्टमैटिक बिकवाली के बीच केंद्रीय बैंकों की खरीदारी ने संभाला मोर्चाईसीबी की नीतिगत बैठक और फ्रांस के बॉन्ड संकट के बीच वैश्विक मुद्रा बाजारों में हलचलयूरोपीय अर्थव्यवस्था में सुस्त विकास और असमान महंगाई के बीच वैश्विक बाजारों में सतर्कताअरुणाचल सीमा विवाद पर बीजिंग की प्रतिक्रिया, भारत से सहयोग की अपीलदमदार निखार के लिए क्या खाएं, डॉक्टर जश्या सरीन ने बताए स्किन फ्रेंडली फूड्सआरबीएनजेड की ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदों के बीच फिसला न्यूजीलैंड डॉलर27 अक्टूबर को आ रहा है Redmi K100 स्मार्टफोन, बोस साउंड और 165Hz स्क्रीन से लैस होने की चर्चागुजरात में शुरू हुई निम्रत कौर आहूवालिया की नई शूटिंग, शेयर की खास तस्वीरकुंभ राशिफल नवंबर 2026: शनि की चाल से क्या होगा असर और उतरती साढ़ेसाती का हाल
सिंगापुर से पटना लौटते ही मामा साधु यादव से मिलीं रोहिणी आचार्य, बिहार की सियासत में नए समीकरण की आहटराजनीति
5 अक्तू॰ 2026, 7:40 pm (21 दिन पहले)· 1

सिंगापुर से पटना लौटते ही मामा साधु यादव से मिलीं रोहिणी आचार्य, बिहार की सियासत में नए समीकरण की आहट

लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने पटना पहुंचते ही अपने मामा साधु यादव के आवास पर जाकर पैर छूकर आशीर्वाद लिया। पुराने गिले-शिकवे भुलाकर हुई इस मुलाकात से आरजेडी के भीतर नए सियासी समीकरणों के कयास लगाए जा रहे हैं।

बिहार के सियासी गलियारों में राष्ट्रीय जनता दल सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के कुनबे की आंतरिक उठापटक एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में आ गई है। सिंगापुर में करीब 11 महीने बिताने के बाद अपने पिता के बुलावे पर गुरुवार को पटना लौटीं रोहिणी आचार्य ने सीधे अपने मामा और पूर्व सांसद साधु यादव के आवास का रुख कर सबको चौंका दिया। यह वही साधु यादव हैं, जिन्हें कभी रोहिणी ने तीखी तल्खी के बीच 'कंस मामा' की संज्ञा दी थी। बरसों से बंद संवाद के बाद अचानक भांजी का मामा की चौखट पर पहुंचना और उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेना सामान्य शिष्टाचार भर नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे सूबे की राजनीति में एक नए शक्ति संतुलन की तलाश के रूप में देखा जा रहा है।

पारिवारिक कड़वाहट और पुरानी दूरियों का लंबा इतिहास

बिहार के राजनीतिक इतिहास में एक दौर ऐसा था जब राबड़ी देवी की हुकूमत के समय उनके भाइयों साधु यादव और सुभाष यादव की सत्ता तथा संगठन में तूती बोलती थी। लालू प्रसाद यादव के बेहद विश्वासपात्र रहे साधु यादव कालांतर में सत्ता संरचना से बाहर होते चले गए। खासकर तेजस्वी यादव के हाथों में पार्टी की मुकम्मल बागडोर आने के बाद पुराने दिग्गज पूरी तरह हाशिये पर धकेल दिए गए। इसके चलते दोनों परिवारों के दरमियान सार्वजनिक स्तर पर कड़वाहट इतनी बढ़ गई कि भाई-बहन और साले-बहनोई के बीच बातचीत का सिलसिला पूरी तरह टूट गया। जब तेजस्वी यादव का विवाह हुआ था, तब साधु यादव ने कटु टिप्पणियां की थीं, जिसके जवाब में रोहिणी आचार्य ने मोर्चा संभालते हुए उन पर जोरदार हमला बोला था। अब उसी कड़वे अतीत को दरकिनार कर दोनों का एक मंच पर दिखना संकेत देता है कि वक्त के साथ सियासी जरूरतें बदल चुकी हैं।

सारण की जमीन और भविष्य की चुनावी बिसात

सारण संसदीय क्षेत्र के चुनावी मुकाबले में मिली शिकस्त के बाद से ही रोहिणी आचार्य के भीतर पार्टी के रणनीतिकारों को लेकर नाराजगी पनप रही थी। उनका मानना रहा है कि चुनाव के दौरान उन्हें पार्टी के अंदरूनी तंत्र से वह समर्थन हासिल नहीं हुआ, जिसकी दरकार थी। सारण के इलाके में साधु यादव का पुराना जमीनी रसूख और मजबूत जनाधार आज भी असरदार माना जाता है। भविष्य में दोबारा छपरा की जमीन से चुनावी समर में उतरने की मंशा रखने वाली रोहिणी के लिए साधु यादव का साथ एक मजबूत ढाल साबित हो सकता है। तेजस्वी यादव के एकछत्र फैसलों के सामने अपने पारंपरिक आधार को एकजुट कर रोहिणी यह संदेश देना चाहती हैं कि वे अलग-थलग नहीं हैं, बल्कि परिवार के पुराने सिपहसालारों को जोड़कर अपनी स्वतंत्र ताकत खड़ी कर सकती हैं।

मामा के सुर बदले और मिला जीत का खुला आशीर्वाद

दरवाजे पर पहुंची भांजी का साधु यादव ने गर्मजोशी से स्वागत किया और वर्षों की तल्खी पर मिट्टी डालते हुए मीडिया के सामने उनका खुला बचाव किया। साधु यादव ने कहा, "रोहिणी मेरी भगिनी है। वह फिर से छपरा से चुनाव लड़ेगी और जीतकर सांसद बनेगी। हमारा पूरा आशीर्वाद उसके साथ है।" अपने पुराने तेवरों से उलट साधु यादव ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी बहन राबड़ी देवी और उनके बीच मन में कोई दूरी कभी नहीं रही, क्योंकि घर की बेटी जब देहरी पर लौटती है तो हर किसी को खुशी होती है। इस बदले हुए रुख से संकेत मिलता है कि रोहिणी सिर्फ अपने लिए सियासी जमीन ही नहीं तलाश रहीं, बल्कि लालू-राबड़ी और साधु यादव के बीच बिखरे रिश्तों को समेटने में मध्यस्थ की भूमिका भी निभा सकती हैं।

आरजेडी के भीतर कई मोर्चों पर सुलगती कलह

यह अप्रत्याशित घटनाक्रम पार्टी के भीतर गहराते शक्ति संघर्ष के समय सामने आया है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बाद परिवार की अंदरूनी खींचतान उस वक्त सतह पर आ गई थी, जब रोहिणी आचार्य ने राजनीति और परिवार से दूरी बनाने का ऐलान करते हुए अपने साथ हुए दुर्व्यवहार का दर्द साझा किया था। उस नाजुक मोड़ पर भी साधु यादव खुलकर रोहिणी के समर्थन में उतरे थे और पार्टी के फैसलों पर मंथन की वकालत की थी। उधर तेज प्रताप यादव लंबे समय से अपनी जुदा राह अख्तियार किए हुए हैं, जबकि मीसा भारती को भी अहम फैसलों से दूर रखे जाने की टीस रही है। ऐसे में रोहिणी और साधु यादव का यह नया तालमेल पार्टी के एकाधिकारवादी नेतृत्व को चुनौती देने वाले एक नए धड़े की शुरुआत बन सकता है।

ये भी पढ़ें

सवाल-जवाब

रोहिणी आचार्य पटना कब और क्यों लौटीं?
रोहिणी आचार्य करीब 11 महीने सिंगापुर में रहने के बाद अपने पिता लालू प्रसाद यादव के बुलावे पर गुरुवार को पटना लौटीं।
साधु यादव कौन हैं और उनका लालू परिवार से क्या संबंध है?
साधु यादव पूर्व सांसद और पूर्व मंत्री हैं तथा वे पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के भाई यानी रोहिणी आचार्य के मामा हैं।
रोहिणी आचार्य ने पहले साधु यादव को 'कंस मामा' क्यों कहा था?
तेजस्वी यादव के विवाह के दौरान साधु यादव की तीखी आलोचना के जवाब में रोहिणी आचार्य ने उन पर तल्ख टिप्पणी करते हुए यह बात कही थी।
मुलाकात के बाद साधु यादव ने रोहिणी को लेकर क्या कहा?
साधु यादव ने कहा कि रोहिणी उनकी भांजी हैं और वे फिर से छपरा से चुनाव लड़कर सांसद बनेंगी, जिसके लिए उनका पूरा आशीर्वाद उनके साथ है।
रोहिणी आचार्य के साधु यादव से मिलने के पीछे क्या राजनीतिक कारण माना जा रहा है?
सारण क्षेत्र में साधु यादव के पुराने प्रभाव का लाभ उठाने और पार्टी में अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने के लिए यह कदम उठाया गया माना जा रहा है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Li Wei@li-wei·21 दिन पहले

कल तक जो मामा 'कंस' कहला रहे थे, आज अचानक इतने प्यारे कैसे हो गए? क्या तेजस्वी से पंगा लेने के लिए परिवार के बाकी पुराने दुश्मन भी अब एक मंच पर आएंगे?

Ravikash Gupta@ravikash·21 दिन पहले

राजनीति में कोई किसी का पक्का दुश्मन नहीं होता। जब कॉर्पोरेट जगत में मर्जर और टेकओवर की बात होती है, तो कई बार पुरानी राइवलरी भुलाकर नए रास्ते तलाशे जाते हैं। यहाँ भी कुछ वैसा ही खेल चल रहा है।

Arshdeep Ahluwalia@arshdeep-ahluwalia·21 दिन पहले

रविकेश जी, बात तो सही है आपकी। कभी जिस मामा को 'कंस' कहा था, आज उन्हीं के पैर छूने पड़ रहे हैं। सियासत में सचमुच सब जायज़ है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·21 दिन पहले

अपराध और राजनीति का यह पुराना रिश्ता हमेशा से थाने की डायरी से लेकर सत्ता के गलियारों तक चर्चा का विषय रहा है। परिवार में जब भी पुलिस या कानून के पचड़े जैसी कोई बात होती थी, तब ऐसे समीकरण और तल्खियां और बढ़ जाती थीं। अब चुनाव हारने के बाद पुराने रिश्तों को टटोलना साफ इशारा है कि अंदरखाने कुछ तो बड़ा पक रहा है।

Rohan Verma@rohan-verma·21 दिन पहले

करण भाई, थाने-पुलिस वाली बात तो छोड़िए, यहाँ असली खेल तो सारण और तेजस्वी के एकाधिकार का है।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp