उत्तर प्रदेश के सीतापुर में कांग्रेस पार्टी को अपना जिला कार्यालय खाली करना होगा क्योंकि इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने नगर पालिका के बेदखली आदेश पर स्टे लगाने की मांग ठुकरा दी है। इस मामले में कांग्रेस नगर अध्यक्ष की ओर से दाखिल की गई याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया। यह पूरा विवाद टैमसेन गंज इलाके के प्लॉट नंबर 244/1 से जुड़ा हुआ है, जहां घंटा घर के ऊपरी हिस्से पर साल 1971 से कांग्रेस का कब्जा चला आ रहा है। नगर पालिका की ओर से यह दफ्तर खाली करने के लिए 15 दिन का समय दिया गया था, जिसके खिलाफ पार्टी अदालत की शरण में गई थी।
सुनवाई के दौरान जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी सरकारी जमीन पर लंबे समय तक कब्जा बना रहने मात्र से वह अवैध कब्जा वैध नहीं हो जाता। अदालत ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई भी पुख्ता आवंटन पत्र या दस्तावेज पेश करने में असमर्थ रहे जो यह साबित कर सके कि उक्त संपत्ति उन्हें कानूनी प्रक्रिया के तहत आवंटित की गई थी। राज्य सरकार की तरफ से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि यह जमीन पूरी तरह से नजूल की थी और इस पर बिना किसी वैध अनुमति के कब्जा किया गया था।
अदालत में नहीं टिक सका कांग्रेस का पक्ष
कांग्रेस पक्ष की दलील थी कि उनका कब्जा दशकों पुराना है और उन्होंने 1971 में 320 रुपये किराया चुकाए जाने की एक रसीद भी अदालत के सामने रखी। हालांकि, इन दलीलों के बावजूद अदालत ने पाया कि पिछले 55 सालों से एक भी रुपये का किराया जमा नहीं कराया गया है और न ही इस बात का कोई कानूनी दस्तावेज मौजूद है जो संपत्ति के वैध आवंटन की पुष्टि करता हो। पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि दशकों पुराना कब्जा तभी कानूनी दर्जा पा सकता है जब उसके समर्थन में कोई आधिकारिक आवंटन आदेश या वैध दस्तावेज मौजूद हो।
आगे की कानूनी प्रक्रिया और निर्देश
हाई कोर्ट ने अंतरिम राहत की मांग को सिरे से खारिज करते हुए इस मामले में आगे की कार्यवाही तय कर दी है। अदालत ने प्रतिवादी पक्षों को निर्देश दिया है कि वे आने वाले तीन हफ़्ते के भीतर अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करें। इसके साथ ही, याचिकाकर्ताओं को उस जवाब पर अपना पक्ष रखने के लिए दो हफ़्ते का अतिरिक्त समय दिया जाएगा। इस कानूनी झटके के बाद अब सीतापुर में कांग्रेस के इस पुराने ठिकाने पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।



















