लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने रविवार, 2 अगस्त 2026 को तमिलनाडु के उन तीन युवा अभ्यर्थियों के पीड़ित परिवारों से मुलाकात की, जिन्होंने NEET परीक्षा रद्द होने और पेपर लीक की घटनाओं से निराश होकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी। गोपिका, रोशनी और वेत्री आनंदन नामक इन अभ्यर्थियों के परिजनों से संवाद करने के बाद राहुल गांधी ने देश की परीक्षा प्रणाली और प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखा हमला बोला है। संसद द्वारा पेपर लीक रोधी कड़े कानून पारित किए जाने के बावजूद, राहुल गांधी द्वारा इस मुद्दे को लगातार राष्ट्रीय स्तर पर आक्रामक रूप से उठाए जाने के पीछे एक गहरी राजनीतिक रणनीति देखी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषक इसे 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं, जहां राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव युवा असंतोष को एक मुख्य चुनावी हथियार बनाने की तैयारी में हैं।
NEET और प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए मध्यम वर्ग से सीधा जुड़ाव
कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी के लिए मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET का मुद्दा केवल किसी एक परीक्षा की गड़बड़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के करोड़ों युवा मतदाताओं और उनके परिजनों के दिलों को छूने वाला एक महत्वपूर्ण जरिया बन चुका है। भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं और मेडिकल दाखिले की तैयारी करने वाले अधिकांश छात्र मध्यम वर्ग और निम्न-मध्यम वर्ग के परिवारों से आते हैं। जब भी कोई राष्ट्रीय परीक्षा रद्द होती है या उसका पेपर लीक होता है, तो उसका सीधा असर इन परिवारों के वर्षों के आर्थिक निवेश और उनके बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। राहुल गांधी इस जमीनी हकीकत को पहचानते हुए इस संकट को सरकार के खिलाफ एक प्रमुख राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
प्रतियोगी छात्रों की रैलियों और सभाओं में राहुल गांधी लगातार यह सवाल उठाते रहे हैं कि "ईमानदार और मेहनती छात्रों को बेईमान व्यवस्था की कीमत क्यों चुकानी पड़े?" इस सीधे तर्क के जरिए विपक्ष प्रशासनिक क्षमताओं और सरकारी निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है। पीड़ित परिवारों से व्यक्तिगत रूप से मिलकर सांत्वना देना और उनके साथ खड़े होना यह संदेश देता है कि विपक्षी गठबंधन हर मुश्किल परिस्थिति में देश के युवाओं के संरक्षक के रूप में उपस्थित है।
उत्तर प्रदेश में प्रतियोगी छात्रों का असंतोष और 2027 का राजनीतिक मैदान
उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य होने के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं का भी सबसे बड़ा केंद्र है। राज्य में UPPSC, RO/ARO, सिपाही भर्ती और NEET जैसी परीक्षाओं में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों की संख्या करोड़ों में है। पिछले कुछ समय के दौरान विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में सामने आई गड़बड़ियों और पेपर लीक की घटनाओं ने उत्तर प्रदेश के युवा वर्ग के भीतर सरकार के प्रति भारी निराशा और असंतोष भर दिया है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी 2027 के विधानसभा चुनाव में भी एकजुट होकर उतरने का स्पष्ट इरादा जता चुके हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 18 से 35 वर्ष के युवाओं का जनसांख्यिकी वर्ग बेहद निर्णायक भूमिका निभाता है। यदि प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता का मुद्दा इसी तरह गर्म रहता है, तो यह युवा आबादी चुनाव के नतीजों को पूरी तरह बदलने का मादा रखती है। सपा और कांग्रेस का गठबंधन इस युवा आक्रोश को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए एक सुव्यवस्थित रणनीति के तहत काम कर रहा है, जिससे सत्तारूढ़ दल के सामने एक बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी हो रही है।
PDA फॉर्मूले और 'युवा-न्याय' एजेंडे का मिलाजुला दांव
उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावी समर में विपक्षी गठबंधन का मुकाबला सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के धार्मिक और विकास केंद्रित एजेंडे से होना है। इसका सामना करने के लिए अखिलेश यादव के 'पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक' यानी PDA फॉर्मूले और राहुल गांधी के 'युवा और न्याय' के संकल्प को एक साथ मिलाया जा रहा है। गठबंधन की रणनीति यह है कि सामाजिक न्याय के पारंपरिक समीकरणों में रोजगार और परीक्षा धांधली से पीड़ित युवाओं को जोड़कर एक व्यापक जनाधार तैयार किया जाए।
अखिलेश यादव लगातार राज्य स्तर पर युवाओं के रोजगार के अधिकार और भर्ती प्रक्रियाओं की कमियों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जबकि राहुल गांधी इस मुद्दे को राष्ट्रीय मंच पर उठाकर केंद्र सरकार की नीतियों को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। यह दोहरा हमला विपक्षी गठबंधन को उत्तर प्रदेश के शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों के युवाओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करने का अवसर प्रदान कर रहा है।
सपा-कांग्रेस रणनीति का भावी दृष्टिकोण
राहुल गांधी का नीट पीड़ित परिवारों से मिलना और संसद से लेकर सड़क तक इस मुद्दे को जीवित रखना किसी तात्कालिक बयानबाजी का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह 2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए बिछाई जा रही बिसात का अहम हिस्सा है। जब अखिलेश यादव और राहुल गांधी एक मंच पर आकर प्रचार की कमान संभालेंगे, तो 'पेपर लीक' और 'युवाओं का अंधकारमय भविष्य' बीजेपी के खिलाफ उनका सबसे धारदार और मारक हथियार साबित हो सकता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सत्ताधारी दल युवाओं के इस गहराते असंतोष को शांत करने और विपक्ष के इस आक्रामक दांव को बेअसर करने के लिए क्या कदम उठाता है।



















