जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक गलियारों में बड़े प्रशासनिक और संगठनात्मक बदलाव की आहट तेज हो चुकी है। मंगलवार, 27 अक्टूबर को राज्य की सियासत में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आने की पूरी संभावना है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की अगुवाई वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करने जा रही है। इस संभावित फेरबदल को लेकर पिछले कई दिनों से राजनीतिक हलकों में कयासों का दौर जारी था, जिस पर अब उपराज्यपाल मनोज सिन्हा द्वारा निमंत्रण भेजे जाने के बाद मुहर लगती दिख रही है। श्रीनगर के प्रतिष्ठित लोक भवन में सुबह 10:30 बजे से शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन तय किया गया है, जिसके बाद सरकार का नया स्वरूप सबके सामने होगा।
प्रशासनिक और राजनीतिक समीकरण साधने की कवायद
उमर अब्दुल्ला की सरकार में होने जा रहा यह संभावित बदलाव महज कुछ चेहरों की अदलाबदल तक सीमित नहीं है। जानकारों का मानना है कि इसके जरिए सरकार के भीतर क्षेत्रीय और राजनीतिक संतुलन को साधने की गंभीर कोशिश की जा रही है। चर्चा है कि मौजूदा मंत्रिपरिषद से दो मंत्रियों की छुट्टी हो सकती है और उनकी खाली हुई जगहों पर नए विधायकों को कमान सौंपी जा सकती है। हालांकि, इन अटकलों पर अभी तक किसी भी आधिकारिक स्तर से ठोस पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन राजभवन में होने वाले इस कार्यक्रम ने राजनीतिक सरगर्मी को काफी बढ़ा दिया है।
क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर सियासी खींचतान और उम्मीदें
इस फेरबदल के दौरान जम्मू और कश्मीर दोनों संभागों के बीच शक्ति और प्रतिनिधित्व का संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। सूत्रों और चर्चाओं के अनुसार रामबन, पुंछ, अनंतनाग के साथ-साथ उत्तरी और मध्य कश्मीर के कुछ खास इलाकों को इस बार मंत्रिमंडल में नुमाइंदगी मिल सकती है। नेशनल कॉन्फ्रेंस इस बात पर बारीक नजर रख रही है कि किन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाए ताकि पार्टी का जमीनी राजनीतिक आधार और अधिक मजबूत हो सके। क्षेत्रीय संतुलन की यह मांग सरकार के लिए आंतरिक स्तर पर भी काफी अहमियत रखती है।
पार्टी नेतृत्व की अपील और उम्मीदवारों की दौड़
मंत्रिमंडल में जगह पाने के लिए विधायकों के बीच लॉबिंग की खबरों के बीच खुद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास किया था। उन्होंने शनिवार को दिए अपने संकेतों में साफ किया था कि मंत्रियों की अंतिम सूची पर नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला के साथ विस्तार से चर्चा हो चुकी है और इसे फाइनल कर दिया गया है। मुख्यमंत्री ने पार्टी के भीतर अनुशासन बनाए रखने की अपील करते हुए नेताओं से आग्रह किया था कि वे मंत्री पद के लिए अनावश्यक पैरवी करने से बचें। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पार्टी आलाकमान आखिरकार किन चेहरों पर अपना भरोसा जताता है।
कांग्रेस की भागीदारी और राज्य के दर्जे का पेंच
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का सबसे बड़ा और जटिल सवाल कांग्रेस पार्टी की संभावित हिस्सेदारी से जुड़ा हुआ है। विधानसभा चुनावों के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस ने मिलकर सरकार गठन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया था, लेकिन सत्ता में कांग्रेस की हिस्सेदारी और जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस दिलाए जाने का मुद्दा लगातार बहसों के केंद्र में रहा है। कांग्रेस पार्टी का अब तक यह स्पष्ट रुख रहा है कि जब तक इस केंद्र शासित प्रदेश को उसका पुराना पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिल जाता, तब तक वह औपचारिक रूप से सरकार का हिस्सा नहीं बनेगी। पार्टी का तर्क है कि लोकतांत्रिक अधिकारों की पूर्ण बहाली और राज्य का दर्जा मिलना सर्वोच्च प्राथमिकता है।
कांग्रेस के रुख में बदलाव पर सस्पेंस
श्रीनगर के लोक भवन में होने वाले इस शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस पार्टी की मौजूदगी या गैर-मौजूदगी ही यह तय करेगी कि क्या गठबंधन के भीतर कोई नया समीकरण बना है। यदि कांग्रेस इस बार भी मंत्रिमंडल से दूर रहती है, तो नेशनल कॉन्फ्रेंस को अपने इस प्रमुख सहयोगी दल के साथ विधानसभा के भीतर और बाहर बेहतर राजनीतिक तालमेल बिठाने के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी होगी। हालांकि, कांग्रेस की तरफ से अभी तक अपने पुराने रुख में किसी भी तरह के बदलाव या सरकार में शामिल होने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। इसलिए इस फेरबदल से पहले किसी भी प्रकार के निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
नब्बे सीटों की विधानसभा और मंत्रिपरिषद की संवैधानिक सीमा
जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के स्पष्ट प्रावधानों के मुताबिक, किसी भी केंद्र शासित प्रदेश की मंत्रिपरिषद का आकार वहां की कुल विधानसभा सीटों के दस प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता है। नब्बे निर्वाचित सीटों वाली इस विधानसभा के गणित के हिसाब से मुख्यमंत्री समेत मंत्रिपरिषद में अधिकतम नौ सदस्य ही शामिल हो सकते हैं। सीटों की यह कानूनी सीमा इस बदलाव को और अधिक संवेदनशील बना देती है। इतने सीमित पदों के बीच हर एक फेरबदल का सीधा असर पार्टी के आंतरिक समीकरणों और प्रशासनिक दक्षता पर पड़ता है।
विभागों के आवंटन और भविष्य की प्राथमिकताओं पर नजर
शपथ ग्रहण की प्रक्रिया संपन्न होने के बाद सबसे बड़ा सवाल विभागों के पुनर्वितरण को लेकर उठेगा। नए मंत्रियों को कौन सा महकमा मिलता है और पुराने मंत्रियों के विभागों में किस तरह फेरबदल किया जाता है, इससे सरकार की आने वाले दिनों की प्राथमिकताओं का साफ पता चलेगा। प्रशासनिक पकड़ और जनता से जुड़े मुद्दों पर मुहर लगाने के लिए यह मंत्रिमंडल विस्तार एक अहम मोड़ साबित हो सकता है।
राजनीतिक भविष्य के तीन बड़े सवाल
मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को देखें तो उमर अब्दुल्ला सरकार के लिए यह फेरबदल अपनी कार्यशैली को धार देने का एक बेहतरीन मौका है। यह देखना भी दिलचस्प होगा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस अपने सहयोगियों के साथ रिश्तों को किस दिशा में ले जाती है। मंगलवार को होने वाला यह कार्यक्रम मूल रूप से तीन बड़े सवालों के जवाब तलाश रहा है कि नए चेहरे कौन होंगे, किन दो मंत्रियों की विदाई तय है और क्या कांग्रेस अपने रुख पर कायम रहती है या कोई नया राजनीतिक दांव चलती है। अंतिम स्पष्टता सिर्फ आधिकारिक सूची सामने आने के बाद ही मिल सकेगी।
























