देशभर में एक तरफ जहां आधुनिक राजनीति और युवाओं के मुद्दों पर चर्चाएं छिड़ी हुई हैं, वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर जातिगत राजनीति का पारा चढ़ता जा रहा है। हर सियासी दल राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए जातिगत समीकरणों को साधने में जुटा हुआ है। इस माहौल के बीच हाल ही में सामने आए अंकित बालियान हत्याकांड में भी जाति का एंगल तलाशे जाने की कोशिश की गई, और जब पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए आरोपियों का एनकाउंटर किया, तो उस पर भी सवाल खड़े किए जाने लगे।
शुरुआती दौर में समाजवादी पार्टी की ओर से इस हत्या के बाद एक खास राजनीतिक नैरेटिव सेट करने का प्रयास किया गया और सरकार को घेरा गया। लेकिन जैसे ही उत्तर प्रदेश पुलिस ने कार्रवाई करते हुए इस मामले के आरोपियों को मुठभेड़ में ढेर कर दिया, तो विपक्षी दल एनकाउंटर की प्रामाणिकता पर ही सवाल उठाने लगे। राजनीतिक गलियारों में इस घटना को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं।
दूसरी तरफ, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी अपनी राजनीतिक रणनीति के तहत एक अलग मोर्चा संभाल रखा है। मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद वह शुद्धिकरण और दलितों के साथ भेदभाव के मुद्दों को लगातार तूल दे रहे हैं। कभी वह दलितों को कागज के कप में चाय दिए जाने का मुद्दा उठाते हैं तो कभी अन्य सामाजिक भेदभाव की बात करते हैं। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सामने आए नए तथ्यों ने उनके दावों पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं, और स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई जा चुकी है। इस कानूनी कार्रवाई से कांग्रेस पार्टी खासी नाराज है और उसका कहना है कि दलितों के अपमान की बात उठाने की वजह से उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है।
राजनीतिक उठापटक का यह दौर सिर्फ विपक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि एनडीए गठबंधन के भीतर भी जाति और आरक्षण के मुद्दों को लेकर खींचतान देखने को मिल रही है। गठबंधन के दो मंत्री इन मसलों पर आपस में ही भिड़ते नजर आए और एक-दूसरे से इस्तीफे की मांग तक कर डाली। इससे साफ जाहिर होता है कि आने वाले चुनावों से पहले राजनीतिक दलों के भीतर और बाहर दोनों ही स्तरों पर गजब का हंगामा मचा हुआ है।
अंकित बालियान हत्याकांड और पुलिसिया कार्रवाई
अंकित बालियान की हत्या के बाद उपजे हालात ने पूरे मामले को एक संवेदनशील मोड़ दे दिया है। एक तरफ जहाँ विपक्षी दल इसे जातिगत चश्मे से देख रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ खुद अंकित बालियान का परिवार पुलिस की इस कार्रवाई से काफी हद तक संतुष्ट नजर आता है। घटना के फौरन बाद परिवार ने आरोपियों के एनकाउंटर की मांग की थी। अब मुठभेड़ के बाद अंकित की पत्नी और बहन ने साफ तौर पर कहा है कि पुलिस प्रशासन बेहतरीन काम कर रहा है और दो आरोपियों के मारे जाने से उन्हें संतोष मिला है, हालांकि उनका यह भी मानना है कि अभी न्याय पूरा नहीं हुआ है और बाकी बचे हुए दोषियों को भी सख्त सजा मिलनी चाहिए।
घटना सामने आते ही पुलिस और एसटीएफ पूरी तरह हरकत में आ गई थी। पुलिस को शुरुआत में ही इस बात का अंदेशा हो गया था कि इस वारदात को अंजाम देने वाले अपराधी उत्तर प्रदेश के बाहर से आए हैं। इसी आधार पर आसपास के इलाकों के सीसीटीवी फुटेज खंगालने का सिलसिला शुरू किया गया। अपराधियों की धरपकड़ के लिए कुल 7 जिलों से पुलिस की 8 टीमों को मैदान में उतारा गया। पुलिस की शुरुआती जांच में इस हत्याकांड में कुल 6 लोगों की संलिप्तता सामने आई, जिनमें 4 शूटर शामिल थे जबकि दो अन्य लोगों ने मृतक की रेकी करने का काम किया था।
पुलिस के अनुसार इनमें से दो शूटर 20 अगस्त की शाम को ही शामली पहुँच चुके थे और वहाँ के एक होटल में कमरा लेकर ठहरे हुए थे। इसी होटल के सीसीटीवी फुटेज की मदद से उन शूटर्स की पहचान मोहित और सुमित के रूप में सुनिश्चित की गई। इसके बाद 26 अगस्त को अंकित की हत्या को अंजाम देने के बाद ये शूटर वहाँ से फरार हो गए, जिसमें से दो शूटर करनाल की तरफ भागे जबकि मोहित और सुमित बागपत की दिशा में निकल गए।
पुलिस लगातार मोहित और सुमित की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए थी और उन्हें ट्रैक कर रही थी। सोमवार को एक मुखबिर से मिली खास सूचना के आधार पर पुलिस बल ने दोनों को चारों तरफ से घेर लिया। पुलिस के मुताबिक ये दोनों शूटर सोनीपत की तरफ भागने की फिराक में थे। खुद को घिरता देख और गिरफ्तारी के डर से उन्होंने पुलिस दल पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। आत्मरक्षार्थ पुलिस की जवाबी कार्रवाई में दोनों आरोपी ढेर हो गए। इस मुठभेड़ के दौरान दो पुलिसकर्मियों के भी घायल होने की सूचना मिली है। इस हाई-प्रोफाइल मर्डर केस में अभी भी चार आरोपी फरार चल रहे हैं, जिनकी पहचान सत्यम और आर्यन के तौर पर हुई है और पुलिस उनकी तलाश में लगातार दबिश दे रही है।
एनकाउंटर पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और जुबानी जंग
अंकित बालियान हत्याकांड के आरोपियों के मारे जाने के बाद समाजवादी पार्टी के रुख में बड़ा बदलाव आया है। जो पार्टी पहले इस पूरी घटना में अंकित की जाति को लेकर राजनीति चमका रही थी, वह अब सीधे तौर पर पुलिस के एनकाउंटर पर ही सवालिया निशान खड़े कर रही है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार को सब पता है कि अपराधी कौन हैं, फिर भी अपराध क्यों रुक नहीं रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकार के दावों को सही मान लिया जाए, तो क्या वास्तव में सही लोगों का एनकाउंटर किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि जब मृतक के पिता खुद यह कह रहे हैं कि अभी उन्हें पूरा न्याय नहीं मिला है, तो यह पूरी तरह से एक जाँच का विषय बन जाता है। इसके साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि अतीत के फेक एनकाउंटर्स में भी जाति को देखकर कार्रवाई की गई है और आने के समय में जब उनकी सरकार बनेगी तो इन सबकी निष्पक्ष जाँच कराई जाएगी।
सपा सांसद अवधेश प्रसाद ने भी अपने पार्टी सुप्रीमो के सुर में सुर मिलाते हुए कहा कि किन विशेष परिस्थितियों में यह एनकाउंटर अंजाम दिया गया, यह बहुत बड़ा जाँच का विषय है और इसकी उच्चस्तरीय जाँच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कानून में आईपीसी, सीआरपीसी और न्यायपालिका के पास हर बड़े से बड़े जुर्म के लिए फाँसी तक की सजा का पूरा प्रावधान है, ऐसे में अचानक आखिर ऐसी कौन-सी स्थिति उत्पन्न हो गई थी कि मुठभेड़ का रास्ता चुनना पड़ा।
दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी ने अखिलेश यादव की इस जातिगत राजनीति और एनकाउंटर पर उठाए जा रहे सवालों का कड़ा पलटवार किया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब विपक्ष और विशेषकर अखिलेश यादव को देश की किसी भी संवैधानिक संस्था पर भरोसा नहीं बचा है, और उनका काम सिर्फ और सिर्फ निराधार आरोप लगाना रह गया है। उन्होंने कहा कि यह कोई नई व्यवस्था नहीं है जो उनके समय में बनाई गई हो, बल्कि यह पहले से ही चली आ रही है और विपक्ष का मकसद केवल राजनीति करना है।
उत्तर प्रदेश के पिछले दो विधानसभा चुनावों से लगातार हार का सामना कर रहे अखिलेश यादव आगामी 2027 के चुनावों के लिए अपनी हर संभव कोशिश कर रहे हैं। वह एक तरफ पीडीए का नया नारा दे रहे हैं तो दूसरी तरफ जातिगत कार्ड खेलने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। पार्टी के भीतर उत्साह का यह आलम है कि सपा नेताओं का यहाँ तक कहना है कि 2027 का चुनाव उनके लिए जीवन-मरण का सवाल है, और यदि पार्टी किसी कुत्ते के गले में भी घंटी बांधकर मैदान में उतार दे, तो जनता को उसी को वोट देना होगा क्योंकि असली मकसद समस्याओं का समाधान पाना है।


















