उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल काफी तेज हो चुकी है। राज्य के इस महत्वपूर्ण चुनावी मुकाबले से पहले सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपने सामाजिक आधार और रणनीतिक समीकरणों को मजबूत करने में जुट गए हैं। एक तरफ समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव नए राजनीतिक दांव और घोषणाओं के जरिए अपनी पैठ बढ़ाने में लगे हैं, तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी अपने पारंपरिक और नए वोट बैंक को एक साथ साधे रखने की रणनीति पर काम कर रही है। इसी राजनीतिक माहौल के बीच केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता जेपी नड्डा से आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे प्रतिनिधियों की मुलाकात ने राज्य के सियासी पारे को और बढ़ा दिया है। इस मुलाकात के बाद यह सवाल चर्चा के केंद्र में आ गया है कि क्या सत्तारूढ़ दल चुनाव से पहले आरक्षण के ढांचे में किसी बड़े सुधार की पृष्ठभूमि तैयार कर रहा है।
जंतर-मंतर प्रदर्शन से लेकर जेपी नड्डा से मुलाकात तक का घटनाक्रम
आरक्षण प्रणाली में बदलाव और समीक्षा की मांग को लेकर बीते 21 अगस्त को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक सार्वजनिक प्रदर्शन आयोजित किया गया था। इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे प्रतिनिधियों में हर्ष दुबे, रण बहादुर सिंह चौहान और मृत्युंजय पाठक मुख्य रूप से शामिल थे। प्रदर्शन के बाद इन प्रतिनिधियों ने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से मुलाकात की और अपनी मांगों का ज्ञापन सौंपा। इस बातचीत को राजनीतिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि आंदोलनकारी समूह के रुख में एक स्पष्ट रणनीतिक बदलाव देखा गया है।
शुरुआती दौर में इस आंदोलन से जुड़े लोग जातिगत आरक्षण को पूरी तरह समाप्त करने की मांग कर रहे थे। हालांकि, समय के साथ आंदोलन का स्वरूप बदला है और अब प्रतिनिधि अपनी बात को आरक्षण खत्म करने के बजाय आरक्षण प्रणाली में सुधार और इसकी व्यापक समीक्षा के रूप में पेश कर रहे हैं। इस बदलाव ने सरकार और सत्तारूढ़ दल के लिए आंदोलनकारियों से संवाद का एक नया रास्ता खोल दिया है।
आरक्षण सुधार आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगें
आंदोलनकारी प्रतिनिधियों द्वारा उठाई गई मांगों में कई बुनियादी बिंदु शामिल हैं, जो वर्तमान आरक्षण ढांचे में बड़े बदलाव का संकेत देते हैं। इनकी सबसे पहली और प्रमुख मांग यह है कि आरक्षण व्यवस्था का मुख्य आधार जातीय पहचान के बजाय आर्थिक स्थिति को बनाया जाना चाहिए। प्रतिनिधियों का तर्क है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को मदद की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, चाहे उनकी सामाजिक या जातीय पृष्ठभूमि कुछ भी हो।
इसके अलावा, एक परिवार को आरक्षण का लाभ केवल एक बार दिए जाने की नीति लागू करने पर जोर दिया गया है। आंदोलनकारियों का मानना है कि यदि किसी परिवार की एक पीढ़ी को आरक्षण का लाभ मिल चुका है और वह सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सशक्त हो चुका है, तो अगली पीढ़ी को स्वतः सामान्य श्रेणी के तहत प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए। इससे उन परिवारों को अवसर मिल सकेगा जो अब तक आरक्षण के लाभ से वंचित रहे हैं।
अन्य प्रमुख मांगों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस आरक्षण के दायरे और प्रतिशत को बढ़ाना शामिल है। साथ ही, समय-समय पर पूरी आरक्षण व्यवस्था की संवैधानिक समीक्षा करने का सुझाव भी दिया गया है। आंदोलनकारियों का कहना है कि आरक्षित वर्गों के भीतर भी ऐसे अनेक समुदाय हैं, जिन्हें पिछले कई दशकों में आरक्षण का अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका है। इसलिए नीतिगत स्तर पर ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिससे वंचित समुदायों तक आरक्षण का उचित हिस्सा पहुंच सके।
क्या ओबीसी वर्ग में 'कोटा के भीतर कोटा' लागू करने की तैयारी है?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी समुदायों का वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केंद्र या राज्य सरकार आरक्षण को पूरी तरह खत्म करने जैसा कोई कदम नहीं उठाएगी, क्योंकि ऐसा करना राजनीतिक रूप से आत्मघाती साबित हो सकता है। इसके बजाय सरकार आरक्षण व्यवस्था के भीतर ही छोटे-छोटे नीतिगत सुधार करने का रास्ता चुन सकती है।
इसी संदर्भ में 'कोटा के भीतर कोटा' यानी रोहिणी आयोग की सिफारिशों को लागू करने की संभावना पर चर्चा तेज हो गई है। रोहिणी आयोग का गठन ओबीसी वर्ग के भीतर विभिन्न जातियों को मिलने वाले आरक्षण के लाभों के वितरण की जांच करने के लिए किया गया था। आयोग की रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि आरक्षण का एक बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा और प्रभावशाली पिछड़ी जातियों तक ही सीमित रह गया है, जबकि दर्जनों अति पिछड़ी जातियां आज भी इसके लाभ से दूर हैं।
यदि बीजेपी सरकार रोहिणी आयोग की सिफारिशों को आधार बनाकर ओबीसी आरक्षण का वर्गीकरण करती है, तो इससे अति पिछड़ी जातियों को उनका न्यायसंगत अधिकार मिल सकता है। राजनीतिक रूप से यह कदम बीजेपी के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है, क्योंकि इससे वह उन समुदायों को अपने पाले में ला सकती है जो खुद को अब तक उपेक्षित महसूस करते रहे हैं। हालांकि, आरक्षण में किसी भी तरह का फेरबदल एक बेहद संवेदनशील विषय है और सत्तारूढ़ दल को अपने पारंपरिक सवर्ण समर्थकों और आरक्षित वर्गों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए भारी मशक्कत करनी होगी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण और गठबंधन की चालें
उत्तर प्रदेश के चुनावी रण में पश्चिमी क्षेत्र का अपना एक अलग और महत्वपूर्ण स्थान है। वर्ष 2014 के बाद से बीजेपी ने राज्य में जिस व्यापक सोशल इंजीनियरिंग का ताना-बाना बुना था, उसमें सवर्णों के साथ-साथ गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित समुदायों को जोड़ने में सफलता मिली थी। पश्चिमी यूपी में जाट मतदाताओं की भूमिका हमेशा से चुनाव परिणामों को प्रभावित करती रही है।
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से राष्ट्रीय लोकदल के नेता जयंत चौधरी की मुलाकात को काफी अहम माना जा रहा है। राष्ट्रीय लोकदल का बीजेपी के साथ पहले से गठबंधन मौजूद है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट किसानों और ग्रामीण मतदाताओं के बीच जयंत चौधरी की पकड़ को देखते हुए बीजेपी इस रिश्ते को और मजबूत बनाना चाहती है।
दूसरी तरफ, विपक्षी खेमे में अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के बीच बनी राजनीतिक दूरी का सीधा फायदा बीजेपी को मिलता दिख रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम-जाट या जाटव-मुस्लिम जैसे संभावित जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण वाले समीकरण चुनावी नतीजों को किसी भी दिशा में मोड़ सकते हैं। यही वजह है कि सत्तारूढ़ दल पश्चिमी यूपी में अपने हर कदम को बेहद सोच-समझकर उठा रहा है ताकि किसी भी तरह के विपरीत सामाजिक ध्रुवीकरण को रोका जा सके।
पूर्वांचल में क्षेत्रीय सहयोगियों के भरोसे बीजेपी की चुनावी रणनीति
पश्चिमी यूपी की तरह पूर्वांचल का इलाका भी उत्तर प्रदेश की सत्ता तक पहुंचने का मुख्य द्वार माना जाता है। पूर्वांचल के जिलों जैसे आजमगढ़, गाजीपुर और जौनपुर में सामाजिक और जातीय समीकरण बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण हैं। इन क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी का पारंपरिक कैडर और सामाजिक आधार काफी मजबूत माना जाता है।
पूर्वांचल में अपनी स्थिति को मजबूत बनाए रखने के लिए बीजेपी अपने क्षेत्रीय सहयोगी दलों और प्रभावशाली नेताओं पर काफी हद तक निर्भर है। इसमें सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओम प्रकाश राजभर और अपना दल (एस) की नेता अनुप्रिया पटेल की भूमिका प्रमुख हो जाती है। ये दोनों नेता अपने-अपने जातीय समूहों, विशेषकर राजभर और कुर्मी मतदाताओं के बीच गहरा प्रभाव रखते हैं।
पूर्वांचल में पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों का एकमुश्त समर्थन ही यह तय करता है कि किस दल का पलड़ा भारी रहेगा। बीजेपी की रणनीति इन क्षेत्रीय सहयोगियों के जरिए जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने की है, ताकि समाजवादी पार्टी के जातीय गोलबंदी के प्रयासों को नाकाम किया जा सके।
रायबरेली और अमेठी में कांग्रेस के गढ़ को ढहाने की कोशिश
उत्तर प्रदेश की रणनीति बनाते समय बीजेपी के निशाने पर कांग्रेस पार्टी के पारंपरिक गढ़ भी शामिल हैं। विशेष रूप से अमेठी और रायबरेली संसदीय क्षेत्रों पर सत्तारूढ़ दल का विशेष ध्यान बना हुआ है। अमेठी में पूर्व सांसद और बीजेपी नेता स्मृति ईरानी की लगातार राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
अमेठी में स्मृति ईरानी की इस निरंतर आवाजाही ने इस चर्चा को जन्म दिया है कि बीजेपी आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उन्हें कोई बड़ी और महत्वपूर्ण संगठनात्मक या रणनीतिक जिम्मेदारी दे सकती है। वहीं रायबरेली क्षेत्र को लेकर भी बीजेपी नेताओं के तीखे बयानों से स्पष्ट है कि पार्टी कांग्रेस के बचे-खुचे जनाधार को भी पूरी तरह से ध्वस्त करना चाहती है।
मतदाताओं की प्राथमिकता और विचारधारा का प्रभाव
राजनीतिक समीकरणों और सामाजिक इंजीनियरिंग के इस पूरे खेल के बीच उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में किए गए जनमत सर्वेक्षणों के आंकड़े भी बेहद दिलचस्प तथ्य उजागर करते हैं। हाल ही में सामने आए चुनावी सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चला है कि लगभग 25 प्रतिशत यानी 25 फीसदी मतदाता वोट डालते समय किसी व्यक्तिगत प्रत्याशी या तात्कालिक वादों के बजाय पार्टी की मूल विचारधारा को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं।
यह 25 फीसदी का आंकड़ा दिखाता है कि जहां एक तरफ जातीय और सामाजिक समीकरण चुनाव का रुख तय करते हैं, वहीं दूसरी तरफ कैडर आधारित विचारधारा भी एक बड़ा निर्णायक कारक बनी हुई है। उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले बीजेपी आरक्षण सुधारों पर संवाद स्थापित करके, अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को साधे रखकर और पारंपरिक वोट बैंक को सहेजकर एक बहुस्तरीय चुनावी रणनीति पर आगे बढ़ रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि आरक्षण सुधार की यह बहस राज्य के राजनीतिक पारे को किस दिशा में ले जाती है।



















