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विपक्षी एकजुटता पर दिलीप घोष का तंज, बोले- मजबूरी में याद आए महात्मा गांधीराजनीति
28 सित॰ 2026, 12:02 pm (29 दिन पहले)· 0

विपक्षी एकजुटता पर दिलीप घोष का तंज, बोले- मजबूरी में याद आए महात्मा गांधी

भाजपा नेता दिलीप घोष ने ममता बनर्जी की विपक्षी एकजुटता की अपील पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि जो लोग पहले अकेले चुनाव लड़ते थे, वे अब मजबूरी में सबको साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं।

कोलकाता में भारतीय जनता पार्टी की तरफ से पश्चिम बंगाल की राजनीति को लेकर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। भाजपा नेता और बंगाल सरकार में मंत्री दिलीप घोष ने ममता बनर्जी की ओर से विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिशों पर करारा तंज कसा है। उन्होंने मीडिया से बातचीत में आरोप लगाया कि सत्ता के समीकरण बदलने के बाद अब विपक्षी नेताओं को सबकी याद आ रही है, जबकि अपने प्रभाव के दिनों में उन्होंने किसी अन्य दल को तवज्जो नहीं दी थी।

पुराने दिनों का दिया हवाला

न्यू टाउन में पत्रकारों से चर्चा करते हुए मंत्री दिलीप घोष ने अतीत के चुनावों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब ममता बनर्जी की पार्टी ने यहां चुनाव लड़ा था, तब उन्होंने कांग्रेस तक को नहीं पूछा था। उस समय जो मुंह में आया, वह सब कहा गया। अब हालात बदल चुके हैं और मामला उल्टा पड़ गया है, इसलिए मजबूरी में महात्मा गांधी को याद किया जा रहा है और वे हर किसी के पास समर्थन के लिए दौड़ रही हैं।

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विधानसभा संख्याबल और पार्टी पर वार

दिलीप घोष ने विधानसभा में सीटों की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि जनता ने विपक्ष में बैठने के लिए एक मजबूत ताकत दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 81 का आंकड़ा कोई मामूली संख्या नहीं है, क्योंकि पिछले पांच वर्षों तक उनके पास इससे भी कम संख्या बल था। उन्होंने आगे कटाक्ष करते हुए कहा कि पहले उनकी पार्टी को तोड़ा गया था, लेकिन अब वे खुद अपनी ही पार्टी को एकजुट नहीं रख पा रही हैं। जो दल या नेता अपनी पार्टी को एक नहीं कर सकता, वह देश को क्या एकजुट करेगा और उनकी बात पर कौन भरोसा करेगा?

कुणाल घोष के हमले पर बयान

एआईटीएमसी के विधायक कुणाल घोष पर हाल ही में हुए हमले के मामले पर भी भाजपा नेता ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि कुणाल घोष खुद जान-बूझकर लोगों को उकसाने का काम करते हैं ताकि वे लगातार सुर्खियों में बने रहें। उनके मुताबिक, इस तरह की घटनाओं के जरिए केवल खबरों में बने रहना ही उनका मुख्य उद्देश्य होता है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर रखी राय

देश की सीमाओं से बाहर चल रहे संघर्षों और वैश्विक हालात पर भी मंत्री दिलीप घोष ने अपनी बात रखी। उन्होंने रूस और यूक्रेन के बीच चल रही जंग का जिक्र करते हुए कहा कि इस लड़ाई की वजह से पूरी दुनिया की इकोनॉमी प्रभावित हो रही है। विकास के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए आज वैश्विक स्तर पर कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। लगातार बैठकें हो रही हैं, लेकिन यह युद्ध सभी देशों के लिए चिंता का विषय है और इसे जल्द से जल्द रोका जाना चाहिए।

पाकिस्तान की स्थिति और भारत की भूमिका

पड़ोसी देश पाकिस्तान को लेकर दिलीप घोष ने तीखे शब्दों में कहा कि पाकिस्तान की इतनी हैसियत नहीं है कि वह दुनिया में शांति ला सके। उन्होंने कहा कि जिस देश के अपने घर में शांति नहीं है, जहां खाने के लिए रोटी, गाड़ी के लिए पेट्रोल और पीने को पानी तक का संकट है, वहां शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह चरमरा चुकी हैं। ऐसे देश की बात पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कौन ध्यान देगा। इसके विपरीत, उन्होंने जोर देकर कहा कि जब भारत बोलता है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोलते हैं, तब पूरी दुनिया सुनती है और आज भी सुन रही है।

सवाल-जवाब

दिलीप घोष ने ममता बनर्जी की विपक्षी एकजुटता पर क्या प्रतिक्रिया दी?
दिलीप घोष ने तंज कसते हुए कहा कि अपने समय में कांग्रेस को न पूछने वाले नेता अब मजबूरी में सबके पास दौड़ रहे हैं।
विधानसभा में विपक्ष का संख्याबल कितना बताया गया है?
भाजपा नेता दिलीप घोष के अनुसार विपक्ष का संख्याबल 81 है, जिसे उन्होंने मामूली संख्या नहीं बताया।
कुणाल घोष पर हुए हमले को लेकर दिलीप घोष ने क्या कहा?
उन्होंने आरोप लगाया कि कुणाल घोष खबरों में बने रहने के लिए खुद जान-बूझकर लोगों को उकसाते हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध पर दिलीप घोष का क्या रुख था?
उन्होंने कहा कि इस युद्ध के कारण दुनिया की इकोनॉमी प्रभावित हो रही है और यह लड़ाई सबके लिए चिंताजनक है।
पाकिस्तान को लेकर दिलीप घोष ने क्या बयान दिया?
उन्होंने कहा कि जिस देश में खुद शांति, रोटी और पानी का संकट हो, उसकी बात दुनिया में कोई नहीं सुनेगा।
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टिप्पणियाँ 5

Riya Menon@riya-menon·28 दिन पहले

राजनीति में कौन कब किसे याद कर ले, कहना मुश्किल है। सिर्फ मजबूरी ही वजह हो, यह हमेशा सही नहीं लगता।

Rohan Verma@rohan-verma·28 दिन पहले

राजनीति में कब कौन किस मजबूरी में किसके गले लग जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। दिलीप घोष ने बिल्कुल सही कहा कि कल तक जो अकेले लड़ने का दम भरते थे, आज उन्हें सबका साथ चाहिए। वैसे हैरानी इस बात की है कि क्या वाकई ये विपक्षी दल चुनाव में साथ मिलकर टिक पाएंगे या फिर बस नाम के लिए गठबंधन बन रहा है?

Arshdeep Ahluwalia@arshdeep-ahluwalia·28 दिन पहले

रोहन जी, पंजाब और हरियाणा में भी तो क्षेत्रीय दलों के ऐसे ही हाल हैं, जब चुनाव आते हैं तो मजबूरी में गठबंधन की याद आ जाती है पर नतीजे क्या निकलते हैं, सब जानते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·28 दिन पहले

अस्सी से ज़्यादा सीटों का दम भरने वाले नेता खुद अपनी पार्टी को नहीं संभाल पा रहे, तो देश जोडऩे की बात पर कौन भरोसा करेगा। राजनीति में हालात बदलते देर नहीं लगती।

Karan Malhotra@karan-malhotra·28 दिन पहले

रविकाश जी, 81 सीटों का आंकड़ा वाकई मजबूत है, लेकिन पार्टी टूटने वाली बात पर भी सोचना चाहिए।

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