गुजरात सरकार की ओर से एक बड़ा कदम उठाया गया है, जिसके तहत वडोदरा में एक आवासीय भूखंड का बड़ा हिस्सा मुफ्त और शेष हिस्सा रियायती दरों पर उपलब्ध कराने की तैयारी की जा रही है। यह मामला काफी समय से चर्चा में रहा है और अब इस पर अंतिम फैसला लेने के लिए वडोदरा नगर निगम की स्थायी समिति के सामने प्रस्ताव रखा गया है। इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर से हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि इससे जुड़ा विवाद पिछले एक दशक से भी अधिक समय से चल रहा था।
वडोदरा नगर निगम की स्थायी समिति में होगा विचार
प्राप्त जानकारी के अनुसार, कुल 978 वर्गमीटर के इस भूखंड का 500 वर्गमीटर हिस्सा मुफ्त में दिए जाने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा, बाकी बची हुई 478 वर्गमीटर जमीन को 45 प्रतिशत की छूट के साथ उपलब्ध कराने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। वडोदरा नगर निगम के आयुक्त की तरफ से यह प्रस्ताव पेश किया गया है, जिस पर 23 अक्टूबर को वडोदरा नगर निगम की स्थायी समिति की बैठक में विचार किया जाएगा और इसे अंतिम मंजूरी दिए जाने पर मुहर लग सकती है।
शेष जमीन के लिए तय की गई है विशेष मूल्यांकन दर
प्रस्ताव के मुताबिक, जो हिस्सा मुफ्त में नहीं दिया जाएगा, उसकी कीमत का निर्धारण वडोदरा अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी की मूल्यांकन समिति द्वारा तय की गई दर के आधार पर किया जाएगा। इस शेष जमीन की कीमत निर्धारित दर की 55 प्रतिशत रखी गई है, जिसका सीधा मतलब यह है कि जमीन हासिल करने वाले पक्ष को बाकी हिस्से पर 45 प्रतिशत की भारी छूट का लाभ मिलेगा।
वर्ष 2012 से चला आ रहा है जमीन का पुराना विवाद
यह पूरा विवाद वडोदरा के तांदलजा इलाके से जुड़ा हुआ है, जहां यह भूखंड स्थित है और यह आवासीय जमीन से जुड़ा मामला काफी पुराना है। संबंधित पक्ष द्वारा वर्ष 2012 से इस जमीन को प्राप्त करने की मांग की जा रही थी। शुरुआती दौर में वडोदरा नगर निगम ने इस जमीन को बेचने पर अपनी सहमति जता दी थी, लेकिन साल 2014 में गुजरात सरकार ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, जिसके बाद यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया था और विवाद गहराता गया था।
अतिक्रमण हटाने का नोटिस और कानूनी लड़ाई
विवाद तब एक बार फिर चर्चा में आया जब नगर निगम की ओर से कथित अतिक्रमण हटाने और जमीन खाली करने का औपचारिक नोटिस जारी किया गया। इस कार्रवाई के खिलाफ गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया और अदालत में दलील दी गई कि मामला एक दशक से ज्यादा पुराना है और कोई भी कठोर कदम उठाने से पहले विधिवत कारण बताओ नोटिस दिया जाना चाहिए था। साथ ही यह भी तर्क दिया गया था कि यह जमीन राज्य सरकार की न होकर नगर निगम के अधीन आती है।
हाई कोर्ट में अपील और कानूनी प्रक्रिया का समापन
हालांकि शुरुआती कानूनी मोर्चे पर हाई कोर्ट ने भूखंड के आवंटन के अनुरोध को नामंजूर करने वाले राज्य सरकार के फैसले को सही ठहराया था, जिसके बाद खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की गई थी। इस साल के अगस्त महीने के दौरान अदालत में सुनवाई के दौरान यह पक्ष रखा गया कि राज्य सरकार की मौजूदा नीति के तहत ही अपना दावा आगे बढ़ाया जाएगा। इसके बाद अपील को वापस लेने की अनुमति के साथ उस कानूनी प्रक्रिया को समाप्त कर दिया गया था।
राजनीतिक घटनाक्रम और ताजा परिस्थितियां
यह पूरा मामला ऐसे समय में दोबारा सुर्खियों में आया है जब राजनीतिक समीकरणों में बदलाव देखने को मिले हैं। पश्चिम बंगाल की बहरामपुर लोकसभा सीट से निर्वाचन के बाद राजनीतिक घटनाक्रम बदले और संसद में नई परिस्थितियों के बीच फैसले लिए गए। अब वडोदरा नगर निगम के आयुक्त द्वारा लाए गए इस नए प्रस्ताव के बाद एक बार फिर से इस भूखंड के आवंटन की प्रक्रिया को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि अंतिम फैसला 23 अक्टूबर की बैठक के बाद ही सामने आएगा।



















