फिल्म जगत में इन दिनों दहशत का माहौल देखने को मिल रहा है। हाल ही में अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर हुए हमले के मामले में पुलिस ने तीनों शूटर्स को दबोच लिया है। इस घटना के फौरन बाद अनिल पंडित नामक एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर इसकी जिम्मेदारी लेते हुए पोस्ट डाली थी, जिसे लॉरेंस बिश्नोई गिरोह से जोड़कर देखा जा रहा है। अनिल पंडित फिलहाल कैलिफोर्निया में रहकर भारत में शूटर्स का सिंडिकेट संचालित करता है। इससे पहले सलमान खान के आवास पर गोलियां चलाई जा चुकी हैं, बाबा सिद्दीकी की हत्या हो चुकी है और अब टाइगर श्रॉफ बाल-बाल बचे हैं। इन लगातार वारदातों के चलते बॉलीवुड से जुड़े लोगों के मन में गहरी असुरक्षा और चिंता बैठ गई है।
जेल की सुरक्षा और लॉरेंस बिश्नोई की भूमिका पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या टाइगर श्रॉफ पर हुआ यह हमला वास्तव में लॉरेंस बिश्नोई के इशारे पर हुआ था। इस वक्त लॉरेंस बिश्नोई गुजरात की साबरमती जेल में बंद है, जो कि एक हाई सिक्योरिटी जेल है। क्या कोई अपराधी जेल के भीतर बैठकर अपना पूरा नेटवर्क चला सकता है। हालांकि इस बात के ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं कि इस फायरिंग का आदेश सीधे लॉरेंस ने दिया था, यह केवल एक दावा भर है। पुलिस का स्पष्ट कहना है कि लॉरेंस इस समय जेल की हाई सिक्योरिटी बैरक में पूरी तरह आइसोलेशन में रखा गया है।
कड़ी निगरानी और मोबाइल इस्तेमाल की अफवाहों का सच
जेल प्रशासन के अलावा गुजरात एटीएस भी उस पर लगातार कड़ी नजर रखती है। एटीएस की अनुमति के बिना उसका कोई भी मूवमेंट मुमकिन नहीं है। जेल के नियमों के मुताबिक किसी को भी उससे मिलने की इजाजत नहीं दी जाती है। इससे पहले भी उसके पास मोबाइल फोन होने की खबरें सामने आई थीं, लेकिन वे सभी बेबुनियाद साबित हुईं। पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार साबरमती जेल में उसके पास कभी कोई कंप्यूटर या फोन नहीं मिला है। उसके वकीलों को भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से ही उससे बातचीत करने की अनुमति दी जाती है। साबरमती जेल के जिस वार्ड में उसे रखा गया है, वहां मोबाइल नेटवर्क काम नहीं करता है। इस बात का भी कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है कि शूटर्स को भेजने वाला शख्स वाकई लॉरेंस गैंग से जुड़ा था।
गैंगस्टर्स के नाम का इस्तेमाल और स्टार्स की सुरक्षा
पुलिस का मानना है कि अमेरिका और कनाडा में छिपे बैठे अपराधी केवल लॉरेंस बिश्नोई के नाम का दुरुपयोग करते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में खौफ पैदा करने के लिए सलमान खान जैसे बड़े कलाकारों का नाम इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन जिन फिल्मी हस्तियों को धमकियां मिल रही हैं, वे इस तरह के जोखिम को नजरअंदाज कैसे कर सकते हैं। वे इन हालातों में शांत कैसे बैठ सकते हैं। टाइगर श्रॉफ की कार पर गोलियां चलना कैमरे पर रिकॉर्ड हुआ है, जो अपने आप में एक हकीकत है। यह अकाट्य सच है कि सलमान खान के घर पर हमले हुए और बाबा सिद्दीकी को दिनदहाड़े मौत के घाट उतार दिया गया। इसलिए भय का माहौल बनना स्वाभाविक है और अपराधी इस खौफ का पूरा फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। अब यह जिम्मेदारी पुलिस और एनआईए पर है कि वे न केवल इस गिरोह का पूरी तरह सफाया करें, बल्कि जनता और इंडस्ट्री को ठोस सबूत दें कि इस आतंक का अंत कर दिया गया है।
कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी की रणनीति पर उठे सवाल
दूसरी तरफ राजनीतिक गलियारों में भी बयानों का दौर गर्म है। कांग्रेस पार्टी के भीतर से ही नेताओं ने नेतृत्व को आईना दिखाना शुरू कर दिया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने खुलकर कहा है कि जो लोग सत्ता परिवर्तन या रिजीम चेंज का सपना देख रहे हैं, वे लोकतंत्र की मूल भावना से पूरी तरह अनजान हैं। लोकतंत्र में सरकारें जनता द्वारा चुनी जाती हैं, तख्तापलट या रिजीम चेंज जैसी कोई अवधारणा भारतीय व्यवस्था में नहीं होती। उन्होंने सलाह दी कि जो लोग सरकार का विरोध कर रहे हैं, उन्हें निष्पक्ष चुनाव की मांग उठानी चाहिए, न कि ऐसी बेतुकी बातें करनी चाहिए। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी इस बात का समर्थन करते हुए कहा कि सत्ता में बदलाव केवल वोटों के माध्यम से संभव है, इसलिए जो लोग भारत की तुलना नेपाल या बांग्लादेश से करने की बात सोचते हैं, वे भारी गलतफहमी के शिकार हैं।
अनुभवी नेताओं की नसीहत और वैचारिक मतभेद
आनंद शर्मा कांग्रेस के पुराने और तजुर्बेकार नेता माने जाते हैं, जबकि शशि थरूर बाद के दौर के नेता हैं। दोनों ने राजनीति और दुनिया के उतार-चढ़ाव को नजदीक से देखा है। दोनों भली-भांति समझते हैं कि इस तरह की रिजीम चेंज की बातें राहुल गांधी के असली उद्देश्यों को जनता के सामने बेनकाब कर सकती हैं। वे यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि भारत की आम जनता कभी भी ढाका जैसी हिंसा और खून-खराबे को स्वीकार नहीं करेगी। कांग्रेस पार्टी के अधिकांश वरिष्ठ नेताओं का यही मानना है। उनका कहना है कि उनकी पार्टी की विचारधारा कभी भी लेनिनवादी या माओवादी नहीं रही है, और कांग्रेस ने कभी हिंसा के रास्ते सरकार बदलने का समर्थन नहीं किया।
सवाल जो अनुत्तरित रह जाते हैं
लेकिन इन तमाम बयानों के बावजूद कांग्रेस नेताओं के पास इस बात का कोई संतोषजनक जवाब नहीं है कि राहुल गांधी आखिर नेहा बोरा और प्रशांत भूषण जैसे लोगों के साथ उठना-बैठना क्यों पसंद करते हैं। वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के उस धड़े का समर्थन क्यों करते हैं जिस पर देश विरोधी नारे लगाने के आरोप लगते हैं। उनके आसपास लगातार माओवादी और लेनिनवादी सोच रखने वाले लोग क्यों मंडराते नजर आते हैं। इन सवालों के घेरे में पार्टी की नीति और नीयत दोनों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं, जिनका जवाब देना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा।























