भारतीय राजनीति में युवाओं की भागीदारी और उनके मुद्दों की अभिव्यक्ति को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है. मुंबई में आयोजित आईआईएमयूएन (IIMUN) की 15वीं वर्षगांठ के विशेष कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने अपनी ही पार्टी की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने खुलकर स्वीकार किया कि Gen-Z यानी नई पीढ़ी के युवाओं के मूड को समझने में कांग्रेस कहीं न कहीं पीछे रह गई. देश भर में मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG 2026 के पेपर लीक और शैक्षणिक अव्यवस्थाओं को लेकर उपजे आक्रोश के बावजूद विपक्ष वह जनसमर्थन और ऊर्जा जुटाने में सफल नहीं हो सका, जो एक नए राजनीतिक दल कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन में देखने को मिली. थरूर का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश के राजनीतिक भविष्य को तय करने में युवा मतदाताओं की भूमिका अत्यंत निर्णायक मानी जा रही है.
युवा आंदोलन और कांग्रेस की रणनीति पर शशि थरूर की बेबाक स्वीकारोक्ति
कार्यक्रम में बातचीत के दौरान शशि थरूर ने कहा कि जिन सामाजिक और शैक्षणिक समस्याओं को लेकर युवाओं का गुस्सा सड़कों पर फूटा, उन पर कांग्रेस ने बहुत पहले से अपनी आवाज उठानी शुरू कर दी थी. पार्टी के शीर्ष नेता राहुल गांधी स्वयं 'छात्रों की गूंज' नाम से एक राष्ट्रव्यापी अभियान चला रहे थे, जिसके तहत छात्रों और उनके अभिभावकों से सीधा संवाद स्थापित किया जा रहा था. इसके बाद भी, जनता और युवाओं के बीच कांग्रेस का संदेश उस प्रखरता से नहीं पहुंच पाया जिस प्रखरता से CJP के विरोध प्रदर्शन ने अपनी जगह बनाई.
थरूर ने अपनी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और रणनीतिकारों को आत्ममंथन करने का सुझाव दिया. उन्होंने कहा, "हमें खुद से पूछना होगा कि क्या हम सुनने में नाकाम रहे और क्या Gen-Z की नब्ज पर हमारी उंगली नहीं थी?" उनका मानना था कि केवल राजनीतिक मुद्दों को उठा देना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उन मुद्दों को युवाओं की सामूहिक आवाज में ढालना और उनके साथ उसी संवाद शैली में जुड़ना आवश्यक होता है. अगर युवा वर्ग अपनी मांगों के लिए सड़कों पर उतर रहा है और किसी अन्य संगठन के पीछे एकजुट हो रहा है, तो राजनीतिक दलों को अपनी संचार नीति और संवाद के तरीकों की कमियों को तलाशना होगा.
नीट-यूजी 2026 पेपर लीक और कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन
छात्रों के असंतोष को राष्ट्रीय पटल पर लाने का काम जून महीने में उस समय गति पकड़ चुका था जब कॉकरोच जनता पार्टी ने मोर्चा संभाला. CJP की ओर से 20 जून को NEET-UG 2026 परीक्षा के दौरान हुए पेपर लीक के विरोध में बड़े पैमाने पर आंदोलन का आगाज किया गया था. प्रदर्शनकारी छात्रों और कार्यकर्ता तंत्र की ओर से केंद्र सरकार से सीधा स्पष्टीकरण मांगा जा रहा था. इस दौरान प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग थी कि व्यवस्थागत विफलता की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान तुरंत अपने पद से इस्तीफा दें.
यह आंदोलन केवल नारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्र के प्रतिष्ठित चेहरों की भागीदारी ने इसे नई धार दी. लद्दाख के प्रसिद्ध शिक्षा विशेषज्ञ और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी छात्रों के समर्थन में सामने आए और उन्होंने अनिश्चितकालीन अनशन शुरू कर दिया. सोनम वांगचुक के अनशन पर बैठते ही देश भर के छात्रों, प्रतियोगी परीक्षा के अभ्यर्थियों और नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का ध्यानाकर्षण जंतर-मंतर की ओर बढ़ गया. इसके बाद विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े युवाओं का समूह जंतर-मंतर पहुंचकर आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने लगा.
सोनम वांगचुक का अनशन और 20 जुलाई का संसद मार्च
जैसे-जैसे प्रदर्शन का दायरा व्यापक होता गया, कॉकरोच जनता पार्टी ने आंदोलन को और तेज करने के लिए 20 जुलाई को संसद भवन तक पैदल मार्च करने की घोषणा की. हालांकि, प्रस्तावित संसद मार्च से ठीक पहले पुलिस और प्रशासन ने कड़े कदम उठाए. जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को उस स्थान से हटा दिया गया, जिससे प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव की स्थिति पैदा हो गई. 20 जुलाई को जब छात्रों ने संसद की तरफ बढ़ने का प्रयास किया, तो पुलिस बल द्वारा कठोर कार्रवाई की गई.
संसद मार्च के दिन हुई पुलिस कार्रवाई और छात्रों को हिरासत में लिए जाने की घटना के बाद समूचे विपक्ष ने सरकार की मंशा पर गंभीर प्रश्न खड़े किए. इस घटनाक्रम ने पूरे मामले को एक बड़े राष्ट्रीय और राजनीतिक विवाद में तब्दील कर दिया. विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार युवाओं के जायज सवालों का जवाब देने के बजाय उनकी आवाज को दबाने का प्रयास कर रही है. CJP के इस उग्र और जमीनी प्रदर्शन ने मीडिया और आम जनता का ध्यान जिस तेजी से खींचा, उसने पारंपरिक राजनीतिक अभियानों को पीछे छोड़ दिया.
कांग्रेस का दांव: एनएसयूआई का प्रदर्शन और 'छात्रों की गूंज' अभियान
इस पूरे मामले में कांग्रेस का यह तर्क रहा है कि उसने नीट परीक्षा में धांधली का मुद्दा सबसे पहले उठाया था. पार्टी के छात्र संगठन नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) ने 12 मई को ही राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक विशाल विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया था. यह प्रदर्शन उस समय हुआ था जब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने पेपर लीक के गंभीर आरोपों और अनियमितताओं को देखते हुए NEET परीक्षा को रद्द करने की घोषणा की थी. इस आधार पर कांग्रेस का कहना था कि देश के छात्रों का असंतोष और परीक्षा प्रणालियों की पारदर्शिता पर उठने वाले सवाल उसके राजनीतिक एजेंडे में पहले से शामिल थे.
इसके पश्चात, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 17 जून को राजस्थान के शैक्षणिक केंद्र कोटा से अपने विशेष संवाद कार्यक्रम 'छात्रों की गूंज' की औपचारिक शुरुआत की. कोटा में लाखों छात्र मेडिकल और इंजीनियरिंग परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं, इसलिए वहां से इस मुहिम का आगाज करना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना गया था. कोटा के बाद राहुल गांधी इस अभियान को उत्तराखंड की राजधानी देहरादून ले गए. वहां उन्होंने परीक्षा लीक और भर्ती घोटालों से प्रभावित हुए युवाओं तथा उनके परिवारों से सीधी बातचीत की और उनकी समस्याएं सुनीं. इसके साथ ही राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जाकर प्रतियोगी छात्रों के बीच बेरोजगारी और नौकरी के संकट की वास्तविकताओं को उजागर करने की योजना भी बनाई थी.
कोटा, देहरादून और प्रयागराज: राहुल गांधी के आक्रामक तेवर
अपने अभियान के विभिन्न चरणों में राहुल गांधी ने केंद्र सरकार और परीक्षा संचालन निकायों पर कड़े प्रहार किए थे. उन्होंने कोटा में छात्रों से बात करते हुए आरोप लगाया था कि कोचिंग व्यवस्था के नाम पर छात्रों के भविष्य और उनके सपनों का सौदा करने वाली एक पूरी उगाही मशीन सक्रिय है. वहीं देहरादून की अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने कहा कि बार-बार होने वाले पेपर लीक के पीछे एक पूरा सिंडिकेट काम कर रहा है जो लाखों युवाओं के जीवन और वर्षों की मेहनत को बर्बाद कर रहा है.
राहुल गांधी ने प्रयागराज दौरे की पृष्ठभूमि तैयार करते हुए स्पष्ट रूप से कहा था, "कोटा में हमने छात्रों के सपनों से कमाई करने वाली उगाही मशीन को उजागर किया." उन्होंने आगे दावा किया था कि देश का युवा वर्ग अब इस दमघोंटू और भ्रष्ट व्यवस्था के सामने झुकने को तैयार नहीं है. युवा अब केवल खोखले दावों और नफरत से भरे बयानों को नकार चुके हैं. कांग्रेस पार्टी यह सुनिश्चित करेगी कि युवाओं की यह आवाज देश के हर कोने में गूंजे. हालांकि, इन तीखे बयानों और दौरों के बावजूद, पार्टी की यह मुहिम उस स्तर की जन-लामबंदी पैदा नहीं कर पाई जैसी CJP के धरने और मार्च में नजर आई.
जेन-जी राजनीति और कांग्रेस के लिए आत्ममंथन की जरूरत
शशि थरूर का यह वक्तव्य केवल एक सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रही संगठनात्मक और रणनीतिक कमियों की ओर इशारा करता है. पार्टी के पास मुद्दे की गंभीरता का स्पष्ट आकलन था, राहुल गांधी व्यक्तिगत रूप से छात्रों से संवाद कर रहे थे और छात्र संगठन NSUI सड़कों पर उतरा था. इसके बावजूद आम युवाओं और Gen-Z श्रेणी के मतदाताओं में वह राजनीतिक ऊर्जा और भावनात्मक जुड़ाव पैदा नहीं हो सका जो एक आंदोलन के लिए आवश्यक होता है.
थरूर के विश्लेषणात्मक वक्तव्य से यह स्पष्ट होता है कि आज की युवा पीढ़ी या Gen-Z का राजनीति को देखने का नजरिया पारंपरिक तरीकों से बिल्कुल अलग है. केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस करने या चुनावी रैलियों में वादे करने से युवा वर्ग को प्रभावित नहीं किया जा सकता. आज का युवा सोशल मीडिया की गतिशीलता, सड़कों पर तात्कालिक उपस्थिति और पारदर्शी व सीधे संवाद के समावेश को अधिक प्रभावी मानता है. आने वाले समय में राजनीतिक सफलता हासिल करने के लिए कांग्रेस को अपनी भाषा, शैली और युवाओं से जुड़ने के माध्यमों में क्रांतिकारी बदलाव लाने होंगे.



















