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पाकिस्तान में मौत की सजा से बाल-बाल बचे भारतीय जासूस मोहनलाल भास्कर की रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तानपड़ताल
9 अग॰ 2026, 6:34 am (62 दिन पहले)· 1

पाकिस्तान में मौत की सजा से बाल-बाल बचे भारतीय जासूस मोहनलाल भास्कर की रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तान

मोहनलाल भास्कर के जासूसी सफर का दूसरा हिस्सा बयां करता है कि कैसे पाकिस्तान में अमानवीय यातनाएं झेलने के बाद भी उन्होंने मौत की सजा को मात दी और वतन वापसी की।

मोहनलाल भास्कर के जासूसी अभियानों की श्रृंखला के इस दूसरे भाग में उनके उस दौर का जिक्र है जब उनका सामना पाकिस्तान की खुफिया और सैन्य एजेंसियों की सबसे残酷 प्रताड़नाओं से हुआ। पंजाब के रहने वाले मोहनलाल ने शिक्षण कार्य छोड़कर जासूसी की दुनिया में कदम रखा था और अपने शुरुआती दौर में ही कई बार सीमा पार आ-जा चुके थे। सत्रहवीं बार पाकिस्तान की सीमा में दाखिल होने के बाद उनका सामना अमर सिंह से हुआ, जिस पर पाकिस्तानी एजेंसियां पहले ही डोरे डाल चुकी थीं। लाहौर पहुँचने पर अमर सिंह और उसके साथियों ने उन्हें एक होटल में ठहराया, जहाँ से एक खतरनाक और खौफनाक दौर की शुरुआत हुई।

गिरफ्तारी और सैन्य पूछताछ केंद्र का खौफनाक माहौल

होटल के कमरे में अमर सिंह के साथियों ने पिस्तौल निकालकर मोहनलाल को बंधक बना लिया और उनके हाथ बांधकर उन्हें सीधे लाहौर छावनी स्थित 596 फील्ड इंटररोगेशन यूनिट ले गए। वहाँ मेजर एजाज मकसूद ने उनसे पूछताछ शुरू की और परमाणु ऊर्जा आयोग की एक फाइल के बारे में कड़ाई से पूछा। इनकार करने पर मेजर के आदेश पर हवलदार अजीज ने उन्हें बेरहमी से पीटा। उनके कपड़े उतरवाकर लकड़ी के तख्ते पर औंधे लेटाया गया और गांठों वाली भारी शाखा से घंटों पिटाई की गई जिससे वे बेहोश हो गए। होश आने पर उन्हें छत से लटकाया गया और शरीर पर डंडों से अनगिनत वार किए गए, जबकि डॉक्टर सईद ने उनकी आँखों में तेज रसायन तक डाल दिया ताकि उन्हें तोड़ने का प्रयास किया जा सके।

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लाखपत जेल और जुल्फिकार अली भुट्टो से जुड़ा वाकया

अनेक दिनों तक अमानवीय प्रताड़ना सहने के बाद उन्हें लाहौर की लाकपत जेल भेज दिया गया, जहाँ कैदियों को बेहद खराब भोजन और यातनाएँ मिलती थीं। एक रात जेल में अचानक जबरदस्त हंगामा हुआ और कैदियों ने नारे लगाने शुरू कर दिए। उस दौरान ذوالفقار अली भुट्टो की आवाज लाउडस्पीकर के जरिए गूंजी थी जिन्होंने कैदियों को शांत रहने की अपील की थी और यह उम्मीद बंधाई थी कि नई सरकार आने पर सभी कैदी अपने वतन लौट जाएंगे। हालाँकि, इसके बावजूद मोहनलाल की मुश्किलें कम नहीं हुईं और उन्हें बार-बार अलग-अलग केंद्रों पर भेजकर तरह-तरह की यातनाएँ दी जाती रहीं ताकि वे टूट जाएं और खुफिया राज उगल दें।

मौत की सजा से चौदह साल की कैद और अंततः वतन वापसी

एक समरी कोर्ट मार्शल के दौरान मोहनलाल को मौत की सजा सुना दी गई, जिसके बाद उन्हें मौत की कोठरी में रखा गया। इस बीच उन्होंने विरोध के रूप में अपने सारे कपड़े फाड़ दिए और अपने ही हाथों से अपनी दाढ़ी-मूछों के सारे बाल नोच डाले, जिसे देखकर पाकिस्तानी अधिकारी भी हैरान रह गए। बाद में एक अन्य कोर्ट मार्शल में उनकी सजा को बदलकर चौदह साल के कठोर कारावास में तब्दील कर दिया गया, जिससे उन्हें बड़ी राहत मिली। दिसंबर 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और शिमला समझौते के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार 9 दिसंबर 1974 का दिन आया जब तीस भारतीय कैदियों को वाहन में बिठाकर वाघा बॉर्डर लाया गया।

वाघा सीमा पर वतन वापसी और पिता से भावनात्मक मिलन

वाघा सीमा के दोनों ओर भारत और पाकिस्तान के लोगों की भारी भीड़ जमा थी और ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच कैदियों की अदला-बदली की प्रक्रिया शुरू हुई। शाम को ठीक चार बजे भारतीय कैदियों की बारी आई और सूची में पंद्रहवें नंबर पर मोहनलाल भास्कर का नाम पुकारा गया। भारतीय पक्ष से स्वीकारोक्ति मिलते ही उन्होंने पूरी ताकत से भारत माता की जय का नारा लगाया और भारतीय सीमा में छलांग लगा दी। सीमा पर उनके बुजुर्ग पिता पहले से ही उनका इंतजार कर रहे थे, जिनकी आँखें बेटे के गम में सूख चुकी थीं। मोहनलाल ने अपने पिता को गले से लगा लिया और दोनों की आँखों से खुशी और संघर्ष के आँसू बह निकले।

सवाल-जवाब

मोहनलाल भास्कर कौन थे?
मोहनलाल भास्कर पंजाब के एक पूर्व शिक्षक थे जिन्होंने शिक्षण कार्य छोड़कर भारत के लिए जासूसी का रास्ता चुना था।
मोहनलाल को पाकिस्तान में किस सैन्य इकाई में ले जाया गया था?
उन्हें लाहौर छावनी स्थित 596 फील्ड इंटररोगेशन यूनिट में ले जाया गया था जहाँ मेजर एजाज मकसूद ने उनसे पूछताछ की थी।
मोहनलाल को अदालत से क्या सजा सुनाई गई थी?
शुरुआत में उन्हें समरी कोर्ट मार्शल द्वारा मौत की सजा सुनाई गई थी, जिसे बाद में फील्ड जनरल कोर्ट मार्शल द्वारा चौदह साल के कठोर कारावास में बदल दिया गया था।
मोहनलाल की वतन वापसी कब और कहाँ हुई?
9 दिसंबर 1974 को वाघा बॉर्डर के जरिए तीस भारतीय कैदियों के साथ मोहनलाल भास्कर की भारत में वापसी हुई थी।
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