राजस्थान सरकार अब गांव-गांव नहीं, बल्कि सीधे खेत-खेत तक जल संरक्षण की सुविधा पहुंचाने की तैयारी में है. चालू वित्तीय वर्ष में प्रदेश भर में करीब 18 हजार नए फार्म पॉण्ड बनाए जाएंगे और इस काम पर 185 करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम खर्च होगी. मकसद साफ है, बारिश का पानी खेतों से बहकर बेकार जाने के बजाय वहीं रुके और बाद में सिंचाई के काम आए.
यह योजना सिर्फ जल संग्रहण तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे ग्रामीण कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर के एक अहम हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है. जिन इलाकों में खेती मानसून की बारिश पर टिकी है, वहां फार्म पॉण्ड किसानों के लिए संकट के समय राहत का जरिया बन सकते हैं.
मानसून पर निर्भर खेती को मिलेगा सहारा
राजस्थान के बड़े हिस्से में खेती आज भी मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है. बारिश अगर वक्त पर न हो या बीच में लंबा अंतराल आ जाए, तो फसल को नुकसान झेलना पड़ता है. फार्म पॉण्ड इसी समस्या का हल निकालने की कोशिश है. खेत की सतह से बहने वाला बारिश का पानी अब बर्बाद होने के बजाय एक छोटे जलाशय जैसी संरचना में जमा होगा, जिसे किसान बाद में जरूरत पड़ने पर सिंचाई के लिए इस्तेमाल कर सकेंगे. इससे पानी की उपलब्धता तो बढ़ेगी ही, साथ ही बारिश के दो दौर के बीच फसल को जीवनरक्षक सिंचाई देने का विकल्प भी किसानों के पास रहेगा.
फार्म पॉण्ड आखिर है क्या
फार्म पॉण्ड असल में खेत के भीतर ही तैयार किया गया एक जल संग्रहण ढांचा है. बारिश के दौरान खेत की सतह से जो पानी बहकर निकलता है, उसे इसी गड्ढेनुमा संरचना में इकट्ठा कर लिया जाता है. बाद में जब फसल को पानी की जरूरत पड़ती है, तो किसान इसी जमा पानी का उपयोग सिंचाई के लिए करते हैं. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि पानी को खेत से दूर किसी बड़े तालाब या बांध तक ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर खेत के स्तर पर ही खड़ा हो जाता है. इससे बारिश के पानी के प्रबंधन में किसान की भागीदारी भी सीधे तौर पर बढ़ जाती है.
185 करोड़ के बजट से 18 हजार नए ढांचे
सरकार ने चालू वित्तीय वर्ष में फार्म पॉण्ड बनाने के लिए 185 करोड़ रुपए से अधिक की राशि तय की है. इसी बजट से प्रदेश भर में करीब 18 हजार नए फार्म पॉण्ड तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है. योजना के तहत पात्र किसानों को निर्माण कार्य के लिए अनुदान दिया जाता है, यानी किसान को अपनी जेब से पूरी लागत नहीं उठानी पड़ती. कम और अनियमित बारिश वाले इलाकों में इस तरह के छोटे जल ढांचे खासतौर पर मददगार साबित हो सकते हैं, क्योंकि वहां सिंचाई के परंपरागत साधन सीमित होते हैं.
ढाई साल में बन चुके हैं 35,893 फार्म पॉण्ड
कृषि विभाग के आंकड़े बताते हैं कि यह कोई नई शुरुआत नहीं, बल्कि पहले से चल रहे काम का अगला चरण है. पिछले ढाई वर्षों में राजस्थान में 35,893 फार्म पॉण्ड बनाए जा चुके हैं. इनके निर्माण के लिए किसानों को अब तक कुल 328 करोड़ रुपए का अनुदान बांटा जा चुका है. योजना के नियमों के मुताबिक एक फार्म पॉण्ड बनाने पर किसान को 63 हजार रुपए से लेकर 1 लाख 35 हजार रुपए तक की अनुदान राशि मिलती है. यह रकम फार्म पॉण्ड के आकार और तय मानकों के आधार पर तय होती है. साफ है कि सरकार अनुदान आधारित मॉडल के जरिए खेतों में जल संग्रहण क्षमता बढ़ाने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रही है, और नया लक्ष्य पूरा होने के बाद प्रदेश में ऐसे ढांचों की कुल संख्या और भी बढ़ जाएगी.
खरीफ और रबी, दोनों सीजन को राहत
फार्म पॉण्ड में जमा पानी का फायदा किसी एक फसल सीजन तक सीमित नहीं रहता. बारिश थमने के बाद अगर खेत में नमी घटने लगे, तो किसान इसी जमा पानी से जीवनरक्षक सिंचाई कर सकते हैं. इसका सीधा लाभ खरीफ फसलों के साथ-साथ रबी सीजन की फसलों को भी मिलता है. इसके अलावा बारिश का पानी खेत में रुकने से उसका तेज बहाव भी थमता है, जिससे मिट्टी के कटाव जैसी समस्या पर भी कुछ हद तक लगाम लगती है. साथ ही किसान सिंचाई के लिए सिर्फ बोरवेल या नहर जैसे बाहरी स्रोतों पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहता.
ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर की नई कड़ी
राजस्थान में ग्रामीण विकास की दिशा काफी हद तक पानी की उपलब्धता और खेती की स्थिरता से तय होती है. ऐसे में फार्म पॉण्ड जैसे छोटे-छोटे जल ढांचे गांव के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की सबसे छोटी लेकिन असरदार इकाई के तौर पर काम करते हैं. सरकार का ताजा लक्ष्य इसी सोच को आगे बढ़ाने की कोशिश है, जहां हर खेत में पानी रोकने की अपनी व्यवस्था हो. करीब 18 हजार नए फार्म पॉण्ड बनने के बाद बड़ी संख्या में खेतों में यह सुविधा उपलब्ध होगी, जिससे जल संरक्षण, सिंचाई प्रबंधन और खेती की उत्पादकता, तीनों मोर्चों पर स्थानीय स्तर पर मजबूती मिलने की उम्मीद है.



















