बरसात के दिनों में उमस और गर्मी जैसे ही बढ़ती है, दूध देने वाली गाय-भैंसों में थनैला रोग का खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है। यह बीमारी सीधे पशु के थनों पर असर डालती है और अगर समय रहते इलाज न हो तो दूध उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है, जिसका सीधा असर पशुपालकों की जेब पर पड़ता है।
कैसे पहचानें थनैला रोग के लक्षण
पशु चिकित्सकों के मुताबिक अगर गाय या भैंस के एक या इससे ज्यादा थनों में सूजन दिखे, छूने पर गर्माहट महसूस हो, दर्द हो या थन कठोर हो जाएं तो यह थनैला रोग के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। कई बार दूध का रंग भी बदल जाता है, यह पतला और पानी जैसा हो सकता है या फिर उसमें खून की मिलावट भी नजर आ सकती है। ऐसे लक्षण दिखते ही पशुपालकों को बिना देरी किए तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए, क्योंकि जितनी जल्दी इलाज शुरू होगा, पशु को उतना ही कम नुकसान होगा।
बरसात में ही क्यों बढ़ता है संक्रमण का खतरा
पशु चिकित्सकों का कहना है कि बरसात के मौसम में लगातार बनी रहने वाली गर्मी और नमी पशुओं की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देती है। ऐसे नम और उमस भरे माहौल में बैक्टीरिया बहुत तेजी से पनपते हैं और यही बैक्टीरिया दूध बनाने वाली ग्रंथियों तक पहुंचकर संक्रमण फैला देते हैं, जो आगे चलकर थनैला रोग का रूप ले लेता है। यही वजह है कि इस मौसम में पशुओं की सामान्य से ज्यादा देखभाल जरूरी हो जाती है।
घर पर अपनाए जा सकने वाले बचाव के तरीके
थनैला रोग से बचाव के लिए सबसे पहले पशुओं को संतुलित और पौष्टिक आहार देना चाहिए। पशु चिकित्सक की सलाह पर रोजाना करीब 50 ग्राम मीठा सोडा और 50 ग्राम नींबू का रस पिलाना फायदेमंद माना जाता है। इसके अलावा दूध निकालने से पहले थनों को हल्के गुनगुने पानी और एंटीसेप्टिक घोल से अच्छी तरह साफ करना चाहिए, ताकि बाहरी संक्रमण थनों तक न पहुंच पाए। अगर जरूरत महसूस हो तो हल्के गर्म पानी से थनों की सिकाई करने और हल्दी व सरसों के तेल का लेप लगाने से भी पशु को काफी राहत मिलती है।
गीली और कीचड़ भरी जगह पर बांधना सबसे बड़ी लापरवाही
बरसात के मौसम में पशुपालक जो सबसे बड़ी गलती करते हैं, वह है गाय-भैंस को गीली या कीचड़ वाली जगह पर बांधकर रखना। ऐसा करने से संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए पशुओं के लिए हमेशा सूखा, साफ और हवादार शेड ही तैयार रखना चाहिए। अगर किसी वजह से पशु बारिश में भीग जाए, तो उसे तुरंत सूखी जगह पर लाकर अच्छी तरह से साफ करना चाहिए। इसके साथ ही गर्मी से बचाने के लिए छायादार जगह, ठंडे पानी की पर्याप्त व्यवस्था और साफ-सुथरी पशुशाला का इंतजाम भी जरूरी है।
टीकाकरण और नियमित जांच से मिलेगी राहत
पशु चिकित्सकों की सलाह है कि पशुओं का समय-समय पर टीकाकरण कराते रहना चाहिए और उनकी नियमित स्वास्थ्य जांच भी करानी चाहिए। अगर शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर दिया जाए तो थन पूरी तरह खराब हो सकते हैं, यहां तक कि पशु हमेशा के लिए दूध देना बंद भी कर सकता है। ऐसे में थोड़ी सी सतर्कता, साफ-सफाई का ध्यान और सही समय पर इलाज कराकर थनैला रोग से काफी हद तक बचा जा सकता है।



















