झुंझुनूं जिले के बिसाऊ कस्बे में आस्था और व्यापार का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है, जो सदियों से स्थानीय संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा बना हुआ है। यहां के तमाम व्यापारी अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठान या दुकानें खोलने से पहले बुढ़िया महादेव मंदिर में माथा टेकना कभी नहीं भूलते हैं। भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद ही वे अपने दिनभर के कारोबार की शुरुआत करते हैं। कस्बे के बिल्कुल मध्य में स्थित यह करीब 300 साल पुराना प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी श्रद्धा का मुख्य केंद्र है और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इसका इतिहास इस पूरे कस्बे की बसावट से भी अधिक पुराना माना जाता है।
अनूठी वास्तुकला और भूमिगत गर्भगृह की बनावट
इस मंदिर की सबसे खास विशेषता इसकी अद्भुत स्थापत्य कला है जो देखने वालों को आश्चर्यचकित कर देती है। इस पावन स्थल पर देवाधिदेव महादेव के दर्शन करने के लिए भक्तों को मुख्य प्रवेश द्वार पर पहुंचते ही सबसे पहले पांच सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। इसके बाद जब श्रद्धालु अंदर प्रवेश करते हैं, तो गर्भगृह में विराजमान शिवलिंग तक पहुंचने के लिए उन्हें दस सीढ़ियां नीचे उतरना पड़ता है। धरातल के तल से काफी गहराई में स्थित इस भूमिगत गर्भगृह की अनोखी संरचना ही इस शिवालय को आसपास के अन्य सभी मंदिरों से बिल्कुल अलग और विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।
जोहड़ के बीच स्थित था प्राचीन दक्षिणमुखी शिवालय
क्षेत्र के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. उदयवीर शर्मा और शिक्षाविद अमोलक चंद जांगिड़ द्वारा रचित पुस्तक ‘बिसाऊ दिग्दर्शन’ में इस मंदिर के इतिहास का विस्तृत वर्णन मिलता है। इस पुस्तक के अनुसार इस ऐतिहासिक मंदिर के शुरुआती निर्माण को लेकर कोई पक्का लिखित दस्तावेज आज उपलब्ध नहीं है। आज से करीब तीन सौ वर्ष पूर्व जब इस पूरे क्षेत्र को विशाले की ढाणी के नाम से पहचाना जाता था, तब यहां पर एक बहुत बड़ा जोहड़ हुआ करता था। उसी विशाल जोहड़ के ठीक मध्य में एक छोटा दक्षिणमुखी शिवालय स्थापित था। उस समय राजठिकाने की तरफ से ही यहां नियमित रूप से पूजा-पाठ और अनुष्ठान संपन्न कराए जाते थे। आगे चलकर इसी राजठिकाने द्वारा इस पुराने छोटे शिवालय का जीर्णोद्धार कराया गया और एक नए व भव्य मंदिर का स्वरूप दिया गया, जिसका मुख्य द्वार उत्तर दिशा की ओर रखा गया।
सावन मास के विशेष अनुष्ठान और भक्तों का तांता
बीते वर्षों के दौरान इस मंदिर के परिसर का लगातार विस्तार किया गया और इसकी सुंदरता को भी बढ़ाया गया। वर्ष 1982 में पंडित नेतराम मिश्र की याद में उनके सुपुत्र मोतीलाल मिश्र ने मंदिर के सामने एक बहुत बड़े चौक का निर्माण करवाया। इसके बाद साल 2019 में सीताराम मिश्र की स्मृति में उनकी धर्मपत्नी गिन्नीदेवी मिश्र ने मंदिर का बहुत ही भव्य जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के पुजारी पंडित सुनील शास्त्री के मुताबिक यहां साल भर के दौरान हर सोमवार को भजन संध्या का आयोजन किया जाता है। सावन के पवित्र महीने में प्रत्येक रात्रि को करीब 45 मिनट तक शिवमहिम्न स्तोत्र का पाठ किया जाता है और महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर चारों प्रहर की विशेष पूजा तथा रुद्राभिषेक का विधान होता है। सावन के इस पूरे महीने में हरिद्वार, गंगोत्री और लोहार्गल से कांवड़ उठाकर लाने वाले श्रद्धालुओं का भारी जनसैलाब यहां जल चढ़ाने के लिए उमड़ता है।













