राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित चिड़ावा कस्बे के व्यस्त मुख्य बाजार में बेसहारा मवेशियों के उपद्रव ने भारी अफरा-तफरी मचा दी। आम दिनों की तरह बाजार ग्राहकों की चहल-पहल से भरा हुआ था, तभी अचानक दो भारी-भरकम सांड आपस में भिड़ गए। दोनों पशु लड़ते-लड़ते इतने उग्र और बेकाबू हो गए कि सीधे सड़क किनारे स्थित एक मिठाई की दुकान के भीतर जा घुसे। इस अप्रत्याशित हमले से दुकान संचालक और उनके बेटे की जान पर बन आई, लेकिन वे दोनों बाल-बाल बचने में सफल रहे। हालांकि, दुकान के मुहाने पर रखा कड़ाही स्टैंड भीषण टक्कर से पलट गया, जिससे खौलता हुआ तेल और उसमें पक रही जलेबियां सड़क पर बिखर गईं।
दुकानों के भीतर मची अफरा-तफरी और जान बचाने की जद्दोजहद
मिठाई की दुकान में मचे कोहराम के तुरंत बाद भी सांडों का आक्रोश शांत नहीं हुआ। वहां से निकलते ही एक सांड पास में स्थित मोबाइल की दुकान में जबरन घुस गया। अचानक दुकान के भीतर विशालकाय पशु को आता देख मोबाइल व्यापारी और वहां मौजूद ग्राहक दहशत में आ गए और अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। बाजार में भगदड़ जैसी स्थिति बन गई। इसके बाद आसपास के व्यापारियों और स्थानीय नागरिकों ने हिम्मत जुटाकर लाठियों और रस्सियों की मदद से काफी देर तक मोर्चा संभाला। भारी मशक्कत के बाद सांड को सुरक्षित तरीके से दुकान से बाहर खदेड़ा जा सका। दुकान में लगे सीसीटीवी कैमरे में यह पूरा घटनाक्रम रिकॉर्ड हो गया, जिसका वीडियो अब इंटरनेट पर भी तेजी से साझा किया जा रहा है।
कान पर लगे टैग ने खोली गौशाला और प्रशासनिक दावों की पोल
इस पूरे हंगामे के शांत होने के बाद जब स्थानीय लोगों और व्यापारियों ने सांड की जांच की, तो उसके कान पर एक आधिकारिक सरकारी टैग लगा हुआ पाया गया। कान में इस टैग के दिखते ही बाजार के कारोबारियों का गुस्सा भड़क उठा। व्यापारियों का स्पष्ट कहना है कि इस प्रकार का टैग तभी लगाया जाता है जब नगरपालिका बेसहारा पशुओं को अभियान चलाकर पकड़ती है और उन्हें श्रीकृष्ण गौशाला भेजती है। ऐसे में यह गंभीर सवाल खड़ा होता है कि यदि इस सांड को पहले ही पकड़कर गौशाला में दाखिल करवा दिया गया था, तो वह दोबारा शहर की घनी आबादी और भीड़भाड़ वाले मुख्य बाजार में कैसे पहुंच गया। इस खुलासे ने नगरपालिका प्रशासन और संबंधित गौशाला प्रबंधन के आपसी समन्वय व निगरानी तंत्र की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है।
व्यापार मंडल की कड़ी चेतावनी और स्थायी समाधान की गुहार
कस्बे के मुख्य बाजार में लगातार मंडराते बेसहारा पशुओं के आतंक से आम नागरिकों और कारोबारियों में गहरा असंतोष है। दुकानदारों का कहना है कि बाजारों में हर समय सांडों के झुंड डेरा जमाए रहते हैं, जिससे खरीदारी करने आने वाले ग्राहकों और व्यापारियों के मन में निरंतर भय बना रहता है। दुकानदारों को हर पल यह आशंका सताती है कि कोई बेकाबू जानवर अचानक उनकी दुकान में घुसकर संपत्ति को नुकसान न पहुंचा दे या किसी मासूम राहगीर को अपने सींगों से गंभीर रूप से चोटिल न कर दे। व्यापार मंडल ने साफ शब्दों में कहा कि प्रशासन द्वारा केवल कागजी औपचारिकता पूरी करने के लिए पशुओं को पकड़ना और फिर लावारिस छोड़ देना कोई स्थायी समाधान नहीं है।
व्यापारियों ने नगरपालिका और गौशाला प्रबंधन से मांग की है कि पकड़े गए सभी मवेशियों की कड़ी निगरानी सुनिश्चित की जाए और ऐसी सख्त व्यवस्था बने जिससे वे दोबारा मुख्य मार्गों पर न लौट सकें। इसके अलावा यह उत्तरदायित्व भी तय किया जाए कि गौशाला से पशुओं के बाहर आने की स्थिति में किसकी जवाबदेही होगी। स्थानीय कारोबारियों ने दो-टूक चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने इस खतरे के खिलाफ जल्द कोई ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाया, तो वे व्यापक स्तर पर उग्र आंदोलन शुरू करने को बाध्य होंगे।




















