राजस्थान का भरतपुर जिला कभी अपनी बंपर चने की पैदावार और दलहन उत्पादन के लिए पूरे क्षेत्र में अपनी एक खास पहचान रखता था। सर्दियों के मौसम में यहां के दूर-दूर तक फैले खेत चने की लहलहाती फसल से गुलजार नजर आते थे और जिले की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में इसकी बहुत बड़ी हिस्सेदारी हुआ करती थी। हालांकि, समय बीतने के साथ किसानों की प्राथमिकताएं बदलीं और उन्होंने खेती के तौर-तरीकों में बदलाव कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप चने का रकबा लगातार कम होता चला गया। स्थिति यह आ चुकी है कि करीब 40 साल पहले जिस भरतपुर में लगभग 85 हजार हेक्टेयर भूमि पर चने की खेती की जाती थी, वहां अब यह दायरा घटकर मात्र 4 से 5 हजार हेक्टेयर के आसपास ही सिमट गया है।
दाल मिलों पर गहराया संकट
कृषि क्षेत्र में आए इस भारी बदलाव का गंभीर असर केवल किसानों के खेतों तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि स्थानीय दाल उद्योग भी इसकी भारी मार झेल रहा है। अतीत में भरतपुर के भीतर चने और अन्य दलहनों की प्रोसेसिंग का काम करने वाली करीब 30 दाल मिलें पूरी क्षमता के साथ संचालित हुआ करती थीं। इन कारखानों में स्थानीय किसानों की ओर से लाई जाने वाली फसल की सफाई, प्रोसेसिंग और बेहतरीन दाल तैयार करने का काम किया जाता था। परंतु, चने की खेती में दर्ज की गई इस भारी गिरावट के कारण अब इन मिलों को अपनी जरूरत के मुताबिक पर्याप्त कच्चा माल मिलना लगभग असंभव हो गया है। यही वजह है कि आज जिले में सिर्फ 2 से 3 दाल मिलें ही किसी तरह बंद होने के मुहाने पर बची हुई हैं।
क्यों कम हुई चने की खेती
कृषि जानकारों के अनुसार, चने के रकबे में आई इस भारी गिरावट के पीछे कई प्रमुख और व्यावहारिक कारण जिम्मेदार हैं। इनमें खेती की बढ़ती हुई लागत, पानी की लगातार बदलती गुणवत्ता और किसानों को फसल बेचने पर मिलने वाला मुनाफा मुख्य रूप से शामिल हैं। भरतपुर के कई क्षेत्रों में भूजल की खारेपन की समस्या भी कृषि के सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी रही है। इसके अलावा, किसानों ने उन फसलों की तरफ रुख करना ज्यादा सुरक्षित समझा जिनमें कम समय लगता हो, जोखिम कम हो और तुलनात्मक रूप से बेहतर आमदनी हासिल हो सके।
सरसों ने ली चने की जगह
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि चने के मुकाबले सरसों की खेती ने किसानों को ज्यादा मुनाफा और स्थिरता दी है। भरतपुर और उसके आसपास के इलाकों में सरसों की मांग बढ़ने और बाजार में बेहतर भाव मिलने के कारण किसानों ने बड़े पैमाने पर चने की जगह सरसों उगाना शुरू कर दिया। इसका सीधा और गहरा असर चने के रकबे पर पड़ा और पिछले चार दशकों के दौरान खेती का पूरा समीकरण ही पूरी तरह से बदल गया। कभी चने की बंपर पैदावार से रौनक पाने वाले भरतपुर के खेत अब सरसों की फसल के पीले रंग से सजे नजर आते हैं, जबकि चने के सिमटते दायरे ने स्थानीय दाल उद्योग को उसका पुराना स्वर्णिम दौर छीन लिया है।


















