कोटा में दीपोत्सव की शुरुआत धनतेरस के पावन पर्व के साथ हो चुकी है और इस पांच दिवसीय त्योहार के चलते शहर की गलियों तथा बाजारों में जबरदस्त रौनक देखने को मिल रही है। शहर के तमाम प्रमुख बाजारों में रंग-बिरंगी झालरों की जगमगाहट और देसी मिट्टी के दीयों की सोंधी खुशबू पूरे माहौल को पूरी तरह त्योहारमय बना रही है। कोटा के स्टेशन क्षेत्र, छावनी, नयापुरा, घंटाघर, रामपुरा, तलवंडी और महावीर नगर जैसे मुख्य इलाकों में लोग मां लक्ष्मी के स्वागत की तैयारियों में जुटे हुए हैं। कुम्हारों की दुकानों पर सजे मिट्टी के दीये, मटकी, कलश और धान की बालियों से बनी समृद्धि की झालरें ग्राहकों का मन मोह रही हैं, जिससे पारंपरिक कला का आकर्षण बाजार में साफ नजर आ रहा है।
दीपावली के मौके पर मिट्टी के दीपकों की सदियों पुरानी परंपरा को जीवंत रखने के लिए कोटा और आसपास के ग्रामीण इलाकों से कुम्हार परिवार अपनी कला के साथ बाजारों में पहुंचे हैं। इन मिट्टी के दीपकों से न केवल आम लोगों के घरों को रोशन किया जाएगा, बल्कि मंदिरों में भी इनसे उजाला किया जाएगा। इसके साथ ही दीपदान की परंपरा का निर्वहन करते हुए अधिक से अधिक घरों को रोशन करने का संकल्प कोटा के निवासी निभा रहे हैं। पारंपरिक संस्कृति और आधुनिकता के इस मेल से इस बार का दीपोत्सव काफी खास बनता नजर आ रहा है।
बाजार की इस चहल-पहल के बीच कोटा में एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है, जो कुम्हारों की लुप्त होती पारंपरिक कला को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहा है। डॉ. दुर्गाशंकर सैनी इस बार अनूठा तिरंगा दीपक अभियान संचालित कर रहे हैं। उन्होंने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि इस पूरे अभियान की रूपरेखा तैयार करने और उसकी तैयारी में 10 दिन से ज्यादा का समय लगा है। इसके तहत विशेष रूप से तीन रंगों के दीपक तैयार करवाए गए हैं, जिनमें भगवा दीपक को भारतीय संस्कृति का प्रतीक, सफेद दीपक को शांति का प्रतीक और हरा दीपक को समृद्धि तथा किसानों के विकास का प्रतीक बताया गया है।
डॉ. सैनी के अनुसार ये विशेष दीपक इस दीपावली पर कोटा के प्रमुख संगठनों और घरों में बिल्कुल निशुल्क वितरित किए जा रहे हैं। इन दीपकों की एक और खासियत यह है कि इनमें पहले से ही मोम भरवाया गया है ताकि लोगों को इन्हें जलाने में किसी प्रकार की कठिनाई न हो। उन्होंने देशवासियों से यह अपील भी की है कि वे किसी भी स्थानीय कुम्हार के घर जाकर मिट्टी के दीपक खरीदें, जिससे कुम्हार परिवारों के घरों तक भी दीपावली की असली रोशनी पहुंच सके और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके।
डॉ. सैनी पिछले करीब 12 साल से लगातार इस अनूठे अभियान को चला रहे हैं। वे खुद चलकर कुम्हारों के घरों तक पहुंचते हैं और उनके चाक पर बैठकर उनका हौसला बढ़ाते हैं। उन्होंने बताया कि आधुनिक दौर में लोग फैशन और नई चीजों को ज्यादा पसंद करते हैं, इसलिए दीपकों में आधुनिकता का पुट देते हुए विशेष रूप से छोटे और रंगीन दीपक तैयार करवाए गए हैं। इस अभियान से पहले मल्टी कलर, भगवा और सादा दीपक अभियान भी सफलतापूलर्वक चलाए जा चुके हैं, जिनका उद्देश्य पारंपरिक पेशों को बढ़ावा देना रहा है।
दीपक बनाने की पूरी प्रक्रिया काफी लंबी और बेहद मेहनत भरी होती है। कुम्हारों को सबसे पहले बाहर से मिट्टी मंगवानी पड़ती है, जो वर्तमान समय में एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। इस मिट्टी को अच्छी तरह गलाकर आटे की तरह गूंथा जाता है, जिसके बाद चाक पर रखकर दीपक, मटकी और अन्य बर्तन ढाले जाते हैं। इन कच्चे बर्तनों को धूप में सुखाया जाता है और फिर भट्टी में पकाया जाता है। अंत में इन पर सुंदर रंग-रोगन किया जाता है, जिसके बाद ये बिक्री के लिए बाजार में उतारे जाते हैं।
डॉ. सैनी ने अपनी बातचीत में बताया कि उन्होंने कुल 5,100 दीपकों का ऑर्डर दिया था, जिनमें से फिलहाल 2,100 दीपक कुम्हारों द्वारा तैयार करके दिए जा चुके हैं। सामान्य तौर पर एक कुम्हार दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद करीब 1,000 दीपक बना पाता है, लेकिन उन्हें पूरी तरह तैयार होने में पांच दिन का समय लग जाता है। यदि बीच में बारिश हो जाए तो उन्हें सूखने में दो दिन का अतिरिक्त समय और लग जाता है। इसके बाद भट्टी में पकाने और रंगाई की लंबी प्रक्रिया शुरू होती है। इतनी अधिक मेहनत करने के बावजूद इन कारीगरों को उनकी मेहनत के हिसाब से पूरा मेहनताना नहीं मिल पाता है, और यही मुख्य वजह है कि अब नई पीढ़ी इस काम से दूर होती जा रही है।
डॉ. सैनी का कहना है कि पिछले 12 साल के लगातार प्रयासों की वजह से अब आम लोगों का रुझान फिर से कुम्हारों की तरफ बढ़ने लगा है, लेकिन काम के मुकाबले मेहनताना अब भी बहुत कम है। उन्होंने सरकार से यह जोरदार आग्रह किया है कि देश के पारंपरिक भारतीय कारीगरों और कुम्हारों की कला को प्रोत्साहित करने के लिए समय-समय पर विशेष अभियान और योजनाएं चलाई जानी चाहिए ताकि इस प्राचीन कला को संरक्षित किया जा सके।














