दीपावली के त्योहार की तैयारियों के बीच झुंझुनूं जिले के बाजारों में स्वदेशी वस्तुओं की खरीदारी को लेकर जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है। विदेशी और कृत्रिम सजावटी सामान की चकाचौंध को दरकिनार करते हुए लोग इस बार अपनी संस्कृति से जुड़ी पारंपरिक मिट्टी की वस्तुओं को पहली प्राथमिकता दे रहे हैं। पूजा अनुष्ठान और घरों की सजावट के लिए मिट्टी के पारंपरिक दीयों और कलश की बिक्री में अप्रत्याशित तेजी दर्ज की गई है। मांग में आए इस सकारात्मक बदलाव ने लंबे समय से पुश्तैनी चाक चला रहे कुम्हारों के चेहरों पर सुकून और मुस्कान बिखेर दी है।
कुम्हार मोहल्लों में दिन-रात घूम रहे चाक
बाजार में बढ़ती खरीदारी के कारण झुंझुनूं के कुम्हार मोहल्लों में इन दिनों त्योहार से पहले की हलचल अपने चरम पर पहुंच चुकी है। स्थानीय कुंभकार परिवार मिट्टी तैयार करने, उसे चाक पर चढ़ाने और धूप में सुखाने के काम में दिन-रात जुटे हुए हैं। परिवार के सभी सदस्य मिलकर चाक की गति को थामे हुए हैं ताकि समय रहते बाजार की मांग पूरी की जा सके। मांग इतनी अधिक है कि कारीगरों को अपनी नियमित उत्पादन क्षमता से कहीं अधिक संख्या में मिट्टी के दीये, मटकियां और विभिन्न प्रकार के बर्तन तैयार करने पड़ रहे हैं।
परंपरा के साथ आधुनिक डिजाइनर दीयों की धूम
इस बार के त्योहारी सीजन में सिर्फ पारंपरिक मिट्टी के दीये ही नहीं, बल्कि नए दौर के आकर्षक और रंगीन डिजाइनर दीयों की भी भारी मांग है। कारीगरों ने अपनी कलात्मक प्रतिभा का इस्तेमाल करते हुए विभिन्न आकृतियों और जीवंत रंगों में रंगे दीये पेश किए हैं, जो ग्राहकों को खूब पसंद आ रहे हैं। इसके अलावा दीपावली के मुख्य लक्ष्मी पूजन के लिए मिट्टी के कलशों की मांग भी काफी बढ़ गई है। बाजार में छोटे और बड़े दोनों आकारों के मिट्टी के कलश हाथों-हाथ बिक रहे हैं।
स्थानीय कारीगरों को मिला मजबूत आर्थिक सहारा
बाजारों में खरीदारी करने पहुंचे स्थानीय लोगों का मानना है कि घर में मिट्टी का दीया जलाना धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके साथ ही यह कदम अपने आसपास के मेहनतकश कारीगरों को प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक संबल भी पहुंचाता है। ग्राहकों के इस बदले नजरिए से वोकल फॉर लोकल के विचार को जमीनी स्तर पर मजबूती मिल रही है। मिट्टी के उत्पादों की इस तरह जोरदार बिक्री होने से कुम्हार परिवारों को इस साल बेहतर आमदनी मिलने की उम्मीद बंधी है। सदियों पुरानी यह मिट्टी कला न केवल हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग बनी हुई है, बल्कि इस दीपोत्सव पर सैकड़ों ग्रामीण परिवारों के घरों में आर्थिक रोशनी भी लेकर आई है।



















