राजस्थान के नागौर जिले में स्थित मेड़ता उपखंड से मातृत्व, अटूट विश्वास और भावनात्मक संयोग की एक बेहद मार्मिक दास्तान सामने आई है। मोकलपुर और सातलावास गांव के दो घरों ने सवा साल पहले अपने इकलौते कुलदीपक खो दिए थे। नियति ने जिस क्रूरता के साथ दोनों परिवारों के घरों के चिराग एक ही दिन बुझाए थे, करीब पंद्रह महीने बाद कुदरत ने उतनी ही संवेदनशीलता के साथ उन आंगनों में नई जिंदगी की सौगात दी है। दोनों परिवारों के नवजात शिशुओं के आगमन ने न सिर्फ पुराने जख्मों पर मरहम लगाया है, बल्कि परिवारों को अपने बिछड़े लाडलों की यादों को दोबारा जीने का हौसला भी दिया है।
बचपन की अटूट दोस्ती और चित्तौड़गढ़ का दर्दनाक हादसा
यह भावुक घटनाक्रम सातलावास निवासी सीताराम मुवाल और मोकलपुर निवासी बाबूलाल बेड़ा के परिवारों से ताल्लुक रखता है। दोनों ही परिवारों में इकलौते पुत्र थे और दोनों का नाम नरेंद्र था। नरेंद्र मुवाल और नरेंद्र बेड़ा के बीच सिर्फ एक ही नाम का संयोग नहीं था, बल्कि उनकी आत्मीयता भी मिसाल थी। कक्षा पांच की शुरुआती पढ़ाई से लेकर नर्सिंग की उच्च शिक्षा हासिल करने तक दोनों ने हर मोड़ पर एक-दूसरे का साथ निभाया। गांव की गलियों से लेकर कॉलेज के कमरों तक दोनों हमेशा एक साथ देखे जाते थे।
लेकिन 14 जुलाई 2025 का दिन दोनों परिवारों के लिए काल बनकर आया। दोनों दोस्त भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने के उद्देश्य से चित्तौड़गढ़ के निकट स्थित निलिया महादेव झरने की ओर रवाना हुए थे। पवित्र स्थल पर पहुंचकर दोनों दोस्त झरने के बहते पानी में स्नान करने लगे। इसी दौरान अचानक पानी का तेज बहाव आया और देखते ही देखते दोनों युवक जलधारा के प्रचंड वेग में समा गए। बचाव दल ने उसी दिन मोकलपुर निवासी नरेंद्र बेड़ा के पार्थिव शरीर को पानी से निकाल लिया, जबकि सातलावास के नरेंद्र मुवाल का शव खोजने में करीब चौदह घंटे का वक्त लग गया। बहनों के इकलौते भाइयों की इस दर्दनाक मौत ने पूरे इलाके को गहरे शोक में डुबो दिया था।
सत्रह साल पुरानी नसबंदी खुलवाने का कठिन निर्णय
दोनों ही घरों में कई बहनों के बीच नरेंद्र ही इकलौते भाई थे। उनके असमय चले जाने से दोनों परिवारों को ऐसा प्रतीत हुआ मानो उनका कुल, वंश और भविष्य का सारा सहारा एक झटके में समाप्त हो गया हो। दोनों ही माताओं ने कई साल पहले नरेंद्र के जन्म के बाद परिवार नियोजन के तहत नसबंदी करा ली थी। ऐसे में दोबारा संतान की प्राप्ति की कोई सामान्य उम्मीद शेष नहीं बची थी।
बेटों के वियोग में बिलखती माताओं के हृदय में ममता और नई उम्मीद की लौ अब भी जल रही थी। दोनों माताएं भगवान शिव की निरंतर उपासना करती रहीं और पुत्र की कामना को लेकर सोमवार के नियमित व्रत रखने लगीं। गहन विचार और चिकित्सीय परामर्श के उपरांत दोनों परिवारों ने करीब सत्रह वर्ष पूर्व कराई गई नसबंदी को ऑपरेशन के जरिए खुलवाने का अत्यधिक साहसिक फैसला लिया। इस चिकित्सीय प्रक्रिया के सफल होने के बाद दोनों माताओं ने फिर से गर्भधारण किया और मातृत्व के संकल्प ने निराशा के घने बादलों को छांट दिया।
जन्म के समय का अद्भुत 14 घंटे का अंतर
इस पूरी दास्तान का सबसे विस्मयकारी और भावुक पहलू दोनों नवजात शिशुओं के जन्म का समय और दिन रहा। मोकलपुर निवासी बाबूलाल बेड़ा के आंगन में चार अक्टूबर के दिन, रविवार की शाम तकरीबन सात बजे बालक का जन्म हुआ। इसके ठीक अगले दिन, पांच अक्टूबर को सोमवार की सुबह करीब नौ बजे सातलावास निवासी सीताराम मुवाल के घर भी नन्हे बालक की किलकारी गूंज उठी।
दिलचस्प और हैरान कर देने वाली बात यह रही कि पंद्रह महीने पहले जब चित्तौड़गढ़ के झरने में हादसा हुआ था, तब भी दोनों दोस्तों के शव मिलने के समय में करीब चौदह घंटे का ही फासला था। अब कुदरत के इस नए घटनाक्रम में दोनों घरों में बच्चों के जन्म के बीच भी ठीक चौदह घंटे का ही अंतर दर्ज किया गया। दोनों परिवारों के परिजन इस समय चक्र और अद्भुत साम्यता को संयोग से बढ़कर भगवान शिव की असीम अनुकंपा मान रहे हैं।
नवजात शिशुओं का फिर रखा गया वही नाम
अपने खोए हुए लाडलों की स्मृतियों को सदैव जीवित रखने और ईश्वर के इस वरदान को नमन करते हुए दोनों परिवारों ने अपने नवजात बेटों का नामकरण फिर से नरेंद्र के रूप में ही किया है। परिजनों का कहना है कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है मानो उनके पुराने नरेंद्र ही पुनर्जन्म लेकर अपनी माताओं की गोद में लौट आए हों।
सातलावास में दादा भगवान राम मुवाल और पिता सीताराम मुवाल के आंगन में जश्न का माहौल है, तो वहीं मोकलपुर में बाबूलाल बेड़ा और उनके स्वजन भी असीम प्रसन्नता से भरे हुए हैं। सबसे अधिक भावुक वे बहनें हैं, जिन्होंने सवा साल पहले अपने इकलौते भाइयों को खोया था और अब वे अपने नन्हे भाइयों को स्नेह से दुलार रही हैं। पंद्रह महीने के लंबे मातम के बाद इन दोनों गांवों के आंगनों में लौटी इस खुशी ने यह सिद्ध कर दिया है कि असीम वेदना के बाद भी विश्वास और जिजीविषा जीवन को नई दिशा दे सकती है।


















