राजस्थान में जल प्रबंधन को सुदृढ़ बनाने और भविष्य में पेयजल की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए देवास परियोजना के तीसरे और चौथे चरण पर काम तेज गति से आगे बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में क्रियान्वित की जा रही इस महत्वाकांक्षी जल परियोजना के तहत दुर्गम इलाकों में बड़े बांधों और विशाल सुरंगों का निर्माण किया जा रहा है। समूचा प्रोजेक्ट धरातल पर उतरने के बाद उदयपुर को प्रतिवर्ष लगभग 1000 एमसीएफटी अतिरिक्त जल प्राप्त हो सकेगा। इस अतिरिक्त जल आवक से शहर की घरेलू पेयजल व्यवस्था मजबूत होगी और विश्व प्रसिद्ध पिछोला तथा फतहसागर झीलों में सालभर पानी का स्तर बनाए रखने में सीधी सहायता मिलेगी।
वाटर इंफ्रास्ट्रक्चर के दृष्टिकोण से यह परियोजना राज्य में प्राकृतिक जल स्रोतों के वैज्ञानिक प्रबंधन और जल संचयन क्षमता के विस्तार में मील का पत्थर साबित हो रही है। पहाड़ी और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बीच एक जलाशय से दूसरे जलाशय तक पानी स्थानांतरित करने के लिए एक एकीकृत नेटवर्क तैयार किया जा रहा है, जिससे व्यर्थ बह जाने वाले पानी को रोककर आवश्यकता वाले क्षेत्रों की ओर मोड़ा जा सके। इसका सीधा सकारात्मक असर स्थानीय जलापूर्ति व्यवस्था और पर्यटन पर निर्भर आजीविका दोनों पर पड़ेगा।
देवास चतुर्थ चरण में अंबावा बांध और टनल का नेटवर्क
योजना के चौथे चरण, यानी देवास-4 के अंतर्गत अंबावा के निकट 390 एमसीएफटी की कुल जल भराव क्षमता वाले एक नए बांध का निर्माण किया जा रहा है। इस बांध में एकत्रित पानी को आगे भेजने के लिए 4.15 किलोमीटर लंबी टनल खोदी जा रही है, जिसके जरिए पानी सीधे देवास-तृतीय परियोजना के तंत्र तक पहुंचेगा।
इंजीनियरिंग के इस स्वरूप का मुख्य लक्ष्य जल संग्रहण और उसके अंतर-घाटी हस्तांतरण को अत्यधिक दक्ष बनाना है। सीमित प्राकृतिक वर्षा और बरसाती नालों के पानी को इस तरह सुरक्षित सहेजकर परियोजना के एक चरण से दूसरे चरण में निर्बाध रूप से पहुंचाया जा सकेगा, जिससे पानी की बर्बादी रुकेगी और उपलब्ध जल का अधिकतम सदुपयोग सुनिश्चित होगा।
देवास तृतीय चरण में नाथियाथल बांध और 10.50 किमी लंबी सुरंग
परियोजना के तीसरे चरण, यानी देवास-3 के तहत नाथियाथल के समीप 703 एमसीएफटी की विशाल क्षमता वाला बांध निर्मित किया जा रहा है। इस जलाशय में संचित होने वाले भारी जल प्रवाह को आगे बढ़ाने के लिए 10.50 किलोमीटर लंबी विशाल टनल तैयार की जा रही है, जो इस पानी को देवास-द्वितीय के नेटवर्क से जोड़ेगी।
इस प्रकार देवास-4 की 4.15 किलोमीटर और देवास-3 की 10.50 किलोमीटर लंबी सुरंगों को मिलाकर कुल 14.65 किलोमीटर भूमिगत टनल तंत्र तैयार हो रहा है। अलग-अलग चरणों के बांधों और सुरंगों को एक साझा श्रृंखला में पिरोकर एक व्यापक जल ग्रिड की रचना की जा रही है, जो उदयपुर संभाग में जल सुरक्षा का एक सुदृढ़ सुरक्षा कवच बनकर उभरेगा।
पिछोला और फतहसागर झीलों के संरक्षण से पर्यटन को सहारा
देवास परियोजना के दोनों चरणों के पूरी तरह चालू होने पर मिलने वाला 1000 एमसीएफटी अतिरिक्त पानी उदयपुर की शहरी पेयजल व्यवस्था की जीवनरेखा बनेगा। इसके साथ ही, शहर की प्राकृतिक पहचान मानी जाने वाली पिछोला और फतहसागर झीलों का जलस्तर निरंतर सुरक्षित रखा जा सकेगा।
ये दोनों ऐतिहासिक झीलें न केवल स्थानीय पर्यावरण और भूजल स्तर को पोषित करती हैं, बल्कि उदयपुर के पर्यटन उद्योग का मुख्य केंद्र बिंदु भी हैं। झीलों में पर्याप्त पानी रहने से नौकायन, होटल व्यवसाय और झीलों के किनारे संचालित होने वाली सभी व्यावसायिक गतिविधियां बिना किसी रुकावट के चल सकेंगी, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को निरंतर संबल मिलेगा।
शहरीकरण और भविष्य की जल सुरक्षा के लिए रणनीतिक ढांचा
राजस्थान में तेज गति से बढ़ती जनसंख्या, अनियंत्रित शहरीकरण और पेयजल की निरंतर बढ़ती मांग के कारण जल संचयन और वितरण से जुड़ा मजबूत ढांचा अपरिहार्य हो गया है। देवास प्रोजेक्ट के तीसरे और चौथे चरण के तहत बन रहे बांध और सुरंगे इसी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा हैं।
निर्माण कार्य संपन्न होने पर उदयपुर क्षेत्र को दशकों तक पानी की कमी से सुरक्षा मिलने की पूरी संभावना है। हालांकि, विशेषज्ञों और योजनाकारों का मानना है कि परियोजना के पूर्ण लाभ समयबद्ध निर्माण, भौगोलिक जल उपलब्धता और संचालन तंत्र की कार्यकुशलता पर निर्भर करेंगे।




















